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अपने सम्मान और अधिकारों से वंचित ट्रांसजेंडर

राजस्थान की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस कांस्टेबल गंगा कुमारी

राजस्थान की पहली ट्रांसजेंडर पुलिस कांस्टेबल गंगा कुमारी को जोधपुर हाईकोर्ट से नियुक्ति के आदेश मिलने के बाद भी नियुक्ति नहीं मिल पाना हमारे सभ्य समाज में ट्रांसजेंडर की यथार्थ स्थिति रेखांकित करती है। बचपन से खुद को लड़की मानकर आम जनता की सेवा करने के उद्देश्य से पुलिस कांस्टेबल बनने के लिए कड़ी मेहनत करने वाली राजस्थान के जालोर के रानीवाड़ा के जाखड़ी गांव की रहने वाली गंगा कुमारी ने 2013 में कांस्टेबल की भर्ती में आवेदन किया था और इसके बाद लिखित परीक्षा और फिजिकल टेस्ट में उत्तीर्ण हुई थी। बाद में जब मेडिकल टेस्ट की बारी आती है तो ट्रांसजेंडर का प्रमाण पत्र देख टेस्ट लेने वाले चौंक जाते है और यहीं से गंगा की नौकरी पर संकट के बादल मंडराने लग जाते है। तकरीबन दो साल तक अपने हक़ के लिए सरकारी दफ्तरों के गंगा चक्कर काटती है। लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल पाती है। आखिरकार उसे विवश होकर जोधपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटना पड़ता है। यहां पर उसकी फ़रियाद सुन ली जाती है और याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस दिनेश मेहता 13 नवंबर 2017 को नियुक्ति के आदेश पारित करते है। लेकिन इन सबके उपरांत कोर्ट के आदेशों की अवहेलना जारी है और स्थिति ढाक की तीन पात जैसी ही बनी हुई है। गंगा कुमारी को नियुक्ति का अब भी इंतजार है। गौरतलब है कि यह देश में तीसरा और प्रदेश में यह पहला मामला सामने आया है जिसमें ट्रांसजेंडर को अपने हक की लडाई लडनी पड़ी है।
दरअसल आजादी के सात दशक बाद भी विसंगतियों में फंसा हुआ हमारा समाज आज भी दो ही लिंग को मानता है – एक स्त्री लिंग और एक पुरुष लिंग। पर उन लोगों का क्या जो कि इंसानियत की इन दोनों परिभाषाओं में खरे नही उतरते है या ये कहें कि जो ना तो स्त्री है और ना ही पुरुष है। आखिर उन लोगों के अस्तित्व का क्या जो आज भी अपना अस्तित्व खोजने के लिए दर बदर भटक रहे है। कभी उन्हें ट्रांसजेंडर और हिजरे के नाम से जाना जाता है तो कभी नपुंसक के नाम से। समाज की एक ऐसी कौम जिसे आज तक सरकार भी कोई नाम नही दे पाई है और हमारे समाज का तो कहना ही क्या वो तो इस काम को नाम क्या जीने का भी अधिकार नही देती है। ट्रांसजेंडर भी आम स्त्री और पुरुष की ही तरह पैदा होते है। समय के साथ जिस तरह से सामान्य लड़की और लड़के के शरीर मे बदलाव आता है, मात्र वही बदलाव इन के शरीर मे नही आ पाता है और ये बन जाते है किसी तीसरी दुनिया के हकदार।

साल 2016 में भारत सरकार ट्रांसजेंडर के लिए एक बिल लेकर आई और उसे लागू भी कर दिया। इस बिल के हिसाब से अब सरकारी नौकरियों में ट्रांसजेंडर को भी जगह दी जाएगी, उन्हें भी सम्मान से जीने का अधिकार होगा और वो भी सामाजिक जीवन जी सकेंगे। पर सरकार बिल पास करते वक्त शायद ये भूल गई थी कि जिन ट्रांसजेंडर को समाज जीने का भी अधिकार नही दे रहा है। क्या वो समाज ये बर्दाश्त कर पायेगा की एक ट्रांसजेंडर उन के साथ बैठ कर काम करे। ट्रांसजेंडर आज भी समाज मे गुमनामी का और भयावह जीवन जी रहे है और इन की सुध लेने वाला कोई भी नही है। इनका जीवनयापन कैसे होता है, ये कैसे रहते है, क्या खाते है और कैसे अपनी जिंदगी जी रहे है इस तरफ अभी भी किसी का ध्यान नहीं हैं। सिर्फ कानून बना देने से ये मान लेना कि इस कानून के बन जाने के बाद ट्रांसजेंडरों की जिंदगी बदल गई है एक बचकानी सी बात है। जब तक पूरा समाज मिल कर सभी ट्रांसजेंडर को मुख्यधारा में जोड़ने का काम नही करेगा, इन्हें सम्मान देना शुरु नही करेगा, इन्हें इंसान मानना शुरु नही करेगा, तब तक तमाम दावे और तमाम कानून खोखले हैं।

देवेंद्रराज सुथार
सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन।
संपर्क – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025
मोबाइल – 8107177196

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