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राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की याद दिलाने का दिन

इसमें कोई दोराय नहीं है कि हम एक लोकतांत्रिक देश के स्वतंत्र नागरिक है। लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत जितने अधिकार नागरिकों को मिलते हैं, उनमें सबसे बड़ा अधिकार है वोट देने का अधिकार। इस अधिकार को पाकर हम मतदाता कहलाता हैं। वही मतदाता जिसके पास यह ताकत है कि वो सरकार बना सकता है, सरकार गिरा सकता है और तो और स्वयं सरकार बन भी सकता हैं। जब 26 जनवरी, 1950 को हमारा देश गणतांत्रिक बन रहा था। अलबत्ता हमारा देश का संविधान लागू हो रहा था। उसी के एक दिन पहले 25 जनवरी, 1950 को देशभर के सभी चुनावों को निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ कराने के लिए ‘भारत निर्वाचन आयोग’ का गठन हुआ। वहीं 2011 में भारत सरकार ने चुनावों में लोगों की भागीदारी बढ़ाने व जागरूकता लाने के उद्देश्य से भारत निर्वाचन आयोग के गठन दिवस को ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ घोषित करने का निर्णय लेते हुए इस दिवस को प्रतिवर्ष मनाने का ऐलान किया। इस दिन मतदाता को उसके मत की शक्ति से वाक़िफ़ कराने के लिए देशभर में कई सामाजिक संस्थाएं और सरकार द्वारा कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। भारत जैसा युवा देश जिसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम है। उस देश के युवाओं की जिम्मेदारी बनती है कि वो अशिक्षित लोगों को वोट का महत्व बताकर उनको वोट देने के लिए बाध्य करे। लेकिन यह विडंबना है कि हमारे देश में वोट देने के दिन लोगों को जरूरी काम याद आने लग जाते हैं। कई लोग तो वोट देने के दिन अवकाश का फायदा उठाकर परिवार के साथ पिकनिक मनाने चले जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी है जो घर पर होने के बावजूद भी अपना वोट देने के लिए वोटिंग बूथ तक जाने में आलस करते हैं। इस तरह अजागरूक, उदासीन व आलसी मतदाताओं के भरोसे हमारे देश के चुनावों में कैसे सबकी भागीदारी सुनिश्चित हो सकेंगी ? साथ ही एक तबका ऐसा भी है जो प्रत्याक्षी के गुण न देखकर धर्म, मजहब व जाति देखकर अपने वोट का प्रयोग करता हैं। यह कहते हुए बड़ी ग्लानि होती है कि वोटिंग के दिन लोग अपना वोट संकीर्ण स्वार्थ के चक्कर में बेच देते हैं। यही सब कारण है कि हमारे देश के चुनावों में से चुनकर आने वाले अधिकत्तर नेता दागी और अपराधी किस्म के होते हैं। जिन्हें सही से बोलना और लिखना भी नहीं आता, ऐसे लोग जो अयोग्य है, वे गलत तरीकों से जीतकर योग्य लोगों पर राज करते हैं। यह हमारे लोकतंत्र की कमी है कि सही और योग्य लोग जो व्यवस्था परिवर्तन करने का जज़्बा रखते है और वे चुनाव लडते है लेकिन मतदाताओं की ऐसी मिलीभगत के चलते वे हार जाते हैं। हमारे देश के लोग अपनी बेटी को किसी को देने से पहले पूरी तहकीकात हैं। लेकिन इसके विपरीत वोट ऐसे ही किसी को भी उठाकर दे देते है। वोट भी तो बेटी ही है ना ? हम तब तक अच्छी व्यवस्था खड़ी नहीं कर पाएंगे जब तक हम वोट का महत्व और अपने मतदाता होने के फर्ज को पूरी जिम्मेदारी के साथ निभा नहीं देते हैं। सवाल तो यह भी है कि क्या हमारे देश में राईट टु रिजेक्ट यानि नोटा के बटन के बाद वोट देने का अधिकार अनिवार्य नहीं करना चाहिए ? विश्व के कई देशों में वोट देने का अधिकार अनिवार्य है। क्या भारत जैसे सर्वाधिक युवा मतदाता वाले देश को इस पहल का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं आना चाहिए ? अंततः हमें ‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ पर यह शपथ लेनी चाहिए कि हम किसी भी प्रलोभन में नहीं फंसते हुए अपने वोट का प्रयोग स्वविवेक के आधार पर पूर्ण निष्पक्षता एवं निष्ठा के साथ करेंगे। चलते-चलते, कवि अजातशत्रु की ये पंक्तियां –
ये गठबंधन की राजनीति है,
ये ठगबंधन की राजनीति है,
दीया कहीं का कहीं की बाती है,
अरे ! ऐसे थोड़ी ज्योत जलाई जाती है !
दिनकर ने गाया कलम वहीं दोहराती है,
सिंहासन खाली करो कि अब जनता आती है !
देवेंद्रराज सुथार  
सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन।
संपर्क – गांधी चौक,  आतमणावास,  बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान।  343025
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