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वायु प्रदूषण भी बना महिलाओं के लिए बड़ा खतरा

बड़े बुजुर्गों का कहना है कि महिला जन्म से लेकर मृत्यु तक लगातार खतरों के बीच झूलती आई है। पहले भ्रूण हत्या फिर दहेज हत्या का सामना करती है। इस मध्य परिवार में उसे दोयम दर्जे का सामना करना पड़ता है। पग पग पर बाधाओं का सामना करते वह बड़ी होती है। फिर अपनी अस्मत बचाने के लिए जूझती है। और तो और अब वायु प्रदूषण ने भी महिलाओं का जीना हराम कर रखा है। भारत में हर साल 12 लाख लोग वायु प्रदूषण से अकाल मौत का शिकार होते है जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों से पता चला है की वायु प्रदूषण महिलाओं के स्वास्थ्य पर कहर बन कर टूटा है जिससे न केवल उनका स्वास्थ्य खतरे में पड़ा है अपितु गर्भस्त शिशु के भी जान के लाले पड़ गए है। वैज्ञानिकों ने भी इस बारे में कई बार चेताया है।
एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि प्रदूषित हवा की वजह से महिलाओं में मासिक-धर्म अनियमित हो जाता है। प्रदूषित हवा का महिलाओं के स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है और उनको बांझपन, मेटाबोलिक सिंड्रोम और पॉलिसिस्टक ओवरी सिंड्रोम जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ह्यूमन रिप्रोडक्शन जैसे जर्नल में यह शोध पब्लिश हुआ है। इस शोध में बताया गया है कि प्रदूषित हवा का सबसे ज्यादा कुप्रभाव 14-18 वर्ष की लड़कियों पर होता है और इनमें मासिक धर्म अनिमियतता की शिकायत बढ़ जाती है।
शोध में बताया गया है कि प्रदूषित हवा की वजह से महिलाओं की प्रजजन क्षमता भी प्रभावित होती है। यूएस के बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल की श्रुति महालिंग्याह ने बताया कि महिलाओं में मासिक-धर्म उनके हॉर्मोनल चेंजेज पर निर्भर करता है और प्रदुषित हवा महिलाओं के हॉर्मोन को नुकसान पहुंचाती है। शोधकर्ताओं ने इस रिसर्च के लिए एक ऐसा स्थान चुना जहां हवा में प्रदूषण अन्य जगह की अपेक्षा ज्यादा था। शोधकर्ताओं ने दो स्थानों से महिलाओं का हेल्थ सैंपल भी लिया। पहला सैंपल कम वायु प्रदूषण वाले स्थान में रहने वाली महिलाओं का और दूसरा सैंपल ज्यादा वायु प्रदूषण वाले स्थान में रहने वाली महिलाओं का। शोधकर्ताओं को पता चला कि ज्यादा वायु प्रदूषण वाले स्थान पर रहने वाली महिलाओं में मासिकधर्म की अनियमितता कम वायु प्रदूषण में रहने वाली महिलाओं की तुलना में बहुत अधिक है। ज्यादा वायु प्रदूषण में रहने वाली महिलाओं में मेटाबोलिक सिंड्रोम और पॉलिसिस्टक ओवरी सिंड्रोम जैसी समस्याएं भी कम वायु प्रदूषण वाले स्थान पर रहने वाली महिलाओं की तुलना में काफी ज्यादा थीं।
राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है, जिससे लोग कई बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। जिन इलाकों में उच्च स्तर का वायु प्रदूषण हो, वहां की महिलाओं के स्तनों के ऊतकों का घनत्व ज्यादा हो सकता है, और उसमें कैंसर पनपने की आशंका बढ़ जाती है। यह निष्कर्ष अमेरिका की करीब 2,80,000 महिलाओं पर अध्ययन करने के बाद निकाला गया है। कहा गया है कि स्तनों का आकार ऊतकों का घनत्व बढ़ने से बड़ा हो जाता है और वसा की अधिकता से भी आकार बढ़ता जाता है।
शोध की रिपोर्ट पत्रिका ब्रेस्ट कैंसर रिसर्च में प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि फाइन पार्टिकल कन्सेंट्रेशन (पीएम 2.5) में एक इकाई की बढ़ोतरी से महिलाओं के स्तनों के ऊतकों का घनत्व बढ़ने की संभावना 4 फीसदी बढ़ जाती है। जिन महिलाओं के ज्यादा घनत्व वाले स्तन थे और ऊतकों की 20 फीसदी तक उच्च सांद्रता थी, उन्होंने पीएम 2.5 से भी अधिक वायु प्रदूषण का सामना किया था। इसके विपरीत जिन महिलाओं के कम घनत्व वाले स्तन थे, उन्होंने पीएम 2.5 की उच्च सांद्रता का 12 फीसदी कम सामना किया।
एक शोध रिपोर्ट के निष्कर्षो से पता चलता है कि पहले की रिपोर्टों में स्तन घनत्व की भौगोलिक विविधता की जो बात कही गई थी, वह शहरी और ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण की अलग-अलग स्थितियों पर आधारित थी। नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक जिन गर्भवती महिलाओं को दमे की बीमारी है, उन्हें वायु प्रदूषण के कारण समय से पहले प्रसव (बच्चा पैदा होने में परेशानी उत्पन्न होना) का खतरा बढ़ सकता है।
दमा पीड़ित गर्भवती महिलाओं के लिए आखिरी छह सप्ताह का समय भी काफी गंभीर होता है। अत्यधिक प्रदूषण वाले कणों जैसे एसिड, मेटल और हवा में मौजूद धूल के संपर्क में आना भी समयपूर्व प्रसव के खतरे को बढ़ावा देता है। यह जानकारी जरनल ऑफ एलर्जी एंड क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी में ऑनलाइन प्रकाशित हुई है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार दमा से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को वायु प्रदूषण से बचने के लिए अत्यधिक प्रदूषण के समय घर से बाहर जाने से परहेज करना चाहिए। वहीं, उन्हें घर में भी वायु प्रदूषण को कम करने के उपाय खोजने चाहिए।
अध्ययनों में साबित हुआ है कि जब मां बनने जा रही कोई महिला इन रसायनों और वायु प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आती है तो उसकी कोख में पल रहे शिशु के स्वस्थ मस्तिष्क के विकास में अवरोध पैदा होता है। इसके नतीजतन भविष्य में बच्चों के स्वभाव और व्यवहार में असर दिखाई देता है। अध्ययनों में साबित हुआ है कि जब मां बनने जा रही कोई महिला इन रसायनों और वायु प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आती है तो उसकी कोख में पल रहे शिशु के स्वस्थ मस्तिष्क के विकास में अवरोध पैदा होता है। इसके नतीजतन भविष्य में बच्चों के स्वभाव और व्यवहार में असर दिखाई देता है। नेचर आईवीएफ सेंटर के अनुसार गर्भवती महिलाओं को पहले तीन महीने में अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए।
चैंकाने वाली बात है कि उनके पास सांस लेने में समस्या की शिकायत लेकर आने वाले अधिकतर रोगी ऐसे हैं जिन्हें कभी बचपन में अस्थमा की शिकायत नहीं रही लेकिन बड़े होकर वे सांस लेने में परेशानी महसूस करने लगे। यह चिंताजनक है। प्रदूषण के इस माहौल में डॉक्टर महिलाओं को पूरी तरह बचने की, बाहर निकलना जरूरी हो तो मास्क पहनने की और किसी भी परेशानी की स्थिति में चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेने की सलाह देते हैं।
कोलंबिया एशिया अस्पताल (पटियाला) के अनुसार 2016 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के महानगरों में प्रत्येक 11 में से एक महिला को पूरे जीवनकाल में कभी भी स्तन कैंसर होने का खतरा होता है। 2002 में भारत में महिलाओं की मौत के लिए स्तन कैंसर 246वां कारण था जो 10 साल बाद यानी 2012 में महिलाओं की मृत्यु के तीन प्रमुख कारणों में शुमार हो गया है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2020 तक कैंसर के 17.30 लाख से अधिक नये मामले सामने आ सकते हैं और इस बीमारी से 8.7 लाख लोगों की मौत की आशंका है। इनमें सर्वाधिक जिम्मेदार कैंसर में ब्रेस्ट कैंसर, उसके बाद लंग कैंसर और फिर सर्विक्स कैंसर होंगे।

– बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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