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वायु प्रदूषण का बच्चों पर हानिकारक प्रभाव

वायु प्रदूषण बड़ों के साथ बच्चों के सवास्थ्य के लिए भी खतरा बन गया है। वर्तमान समय में लोग प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, जिसका बुरा असर उनके स्वास्थ्य पर पडता है। यह तो हम सभी जानते हैं कि बच्चों का इम्युन सिस्टम बडों की अपेक्षा कमजोर होता है। जिसके कारण वे बहुत जल्द बीमार पड जाते हैं। अब इस प्रदूषित वायु का विपरीत असर भी उनके स्वास्थ्य पर पडने लगा है। जहरीली हवा का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के इम्युन सिस्टम पर पडता है। जब बच्चे प्रदूषित वायु में सांस लेते हैं तो वह हवा उनके फेफडों में जाकर उनके प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करती है। फलत बच्चा जल्दी बीमार होजाता है।
ग्रीनपीस ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के 4.70 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां हवा में पीएम10 का स्तर मानक से अधिक है । इसमें अधिकतर बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली के हैं। इस 4.70 करोड़ के आंकड़ें में, 1.70 करोड़ वे बच्चे हैं जो कि मानक से दोगुने पीएम10 स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते हैं । वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली राज्यों में लगभग 1.29 करोड़ बच्चे रह रहे हैं जो पांच साल से कम उम्र के हैं और प्रदूषित हवा की चपेट में हैं। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना । हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है । लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है ।
ग्रीनपीस इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट एयरपोक्लिपस में 280 शहरों का विश्लेषण किया है । इन शहरों में देश की करीब 53 फीसदी जनसंख्या रहती है । बाकी 47 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्र में रहती है जहां की वायु गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 63 करोड़ में से 55 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से कहीं अधिक है । भारत में कुल जनसंख्या के सिर्फ 16 प्रतिशत लोगों को वायु गुणवत्ता का रियल टाइम आंकड़ा उपलब्ध है । यह दिखाता है कि हम वायु प्रदूषण जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिये कितने असंवेदनशील हैं । यहां तक कि जिन 300 शहरों में वायु गुणवत्ता के आंकड़े मैन्यूअल रूप से एकत्र किए जाते हैं वहां भी आम जनता को वह आसानी से उपलब्ध नहीं है ।
भारत सहित पूरे विश्व के लोग वायु प्रदूषण से होने वाली गंभीर बीमारियों से खासा परेशान है। वायु प्रदूषण सिर्फ आपको शारीरिक रूप से ही नहीं दिमागी रूप से बीमार कर रही है और तो और यह आपके बच्चे के दिमाग पर गहरा असर कर रही है। वायु प्रदूषण भारत समेत दक्षिण एशिया में 1.22 करोड़ से अधिक बच्चों के दिमाग के विकास को प्रभावित कर सकता है । इस बात का खुलासा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में हुआ है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत सहित दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण से 1.22 करोड़ बच्चों के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि वायु प्रदूषण श्वास संबंधी कई रोगों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, जिनमें निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा प्रमुख हैं। यह बच्चों की रोगों से लड़ने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है।वायु प्रदूषण फेफड़े और मस्तिष्क के विकास और संज्ञानात्मक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। अगर इलाज नहीं करवाया जाए तो वायु प्रदूषण से संबंधित कुछ स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पूरी जिंदगी बनी रह सकती हैं। यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण बच्चों के दिमाग को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकता है। दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अधिकांश शहर गंभीर रूप से प्रदूषण से जूझ रहे हैं। प्रदूषित और जहरीली हवा का बच्चों के मस्तिष्क पर पड़ता है असर बच्चे का इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरक्षा तंत्र और फेफड़े विकसित होने की प्रक्रिया में होते हैं। ऐसे में हर बार सांस लेते वक्त अपने शरीर के वजन के मुताबिक बच्चे, बड़ों की तुलना में ज्यादा हवा अंदर लेते हैं। ऐसे में अगर हवा जहरीली है तो बच्चे बड़ों की तुलना में ज्यादा प्रदूषित हवा अपने शरीर के अंदर लेते हैं। प्रूदषण के कण इतने छोटे और बारीक होते हैं कि वे हवा के जरिए बच्चों के शरीर के अंदर पहुंचते हैं और फिर खून से होते हुए ब्रेन तक पहुंच जाते हैं और ब्लड ब्रेन बैरियर को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे न्यूरो-इन्फ्लेमेशन की समस्या हो सकती है।वायु प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालता है । प्रदूषित कण सिर्फ बाहर ही नहीं घर के अंदर उपस्थित रहते हैं ।
ब्लूएयर के पश्चिम और दक्षिण एशिया क्षेत्र के निदेशक गिरीश बापट ने कहा, बड़ों की तुलना में बच्चे वायु प्रदूषण के आसानी से शिकार बन रहे हैं । वो अपने विकासशील फेफड़ों और इम्यून सिस्टम के चलते हवा में मौजूद विषैले तत्वों को सांस से अपने अंदर ले रहे हैं । कुछ बच्चे दूसरों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं । बच्चों पर प्रदूषण का असर तेजी से होता है और उनके शरीर पर दीर्घकालिक प्रभाव के चलते कई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं। आजकल बच्चे बहुत कम उम्र में कई तरह की एलर्जी से ग्रस्त हो रहे हैं । उन्हें अपने जीवन के बाकी हिस्सों में भी इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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