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‘एक देश, एक चुनाव’ : चुनौतियां एवं समाधान

बजट सत्र के प्रथम दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात कही है। राष्ट्रपति ने कहा कि बार-बार चुनाव होने से मानव संसाधन पर बोझ तो बढ़ता ही है, आचार संहिता लागू होने से देश की विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है। इसलिए एक साथ चुनाव कराने के विषय पर चर्चा और संवाद बढ़ना चाहिए तथा सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाई जानी चाहिए। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं भी कई बार कह चुके है। इस संबंध में नीति आयोग पहले से अपने सुझाव दे चुका है, जिसका मानना है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ का विचार अत्यंत ही उत्तम विचार है। नीति आयोग ने कहा है कि वर्ष 2024 से लोकसभा और विधानसभा, दोनों चुनाव एक साथ कराना राष्ट्रीय हित में होगा।

क्यों आवश्यक है ‘एक देश, एक चुनाव’ ?

‘एक देश, एक चुनाव’ इसलिए आवश्यक है कि बार-बार चुनाव की तारीखें तय होते ही लागू आदर्श आचार संहिता के कारण सरकारें नए विकास कार्यक्रमों की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाती हैं। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण राजनीतिक दलों द्वारा एक के बाद एक लोक-लुभावन वादे किये जाते हैं, जिससे अस्थिरता तो बढ़ती ही है, साथ में देश का आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है। एक के बाद एक होने वाले चुनावों से आवश्यक सेवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लगातार जारी चुनावी रैलियों के कारण यातायात से संबंधित समस्याएँ पैदा होती हैं साथ ही साथ मानव संसाधन की उत्पादकता में भी कमी आती है। व्यापक शासन संरचना और कई स्तरों पर सरकार की उपस्थिति के कारण देश में लगभग प्रत्येक वर्ष चुनाव कराए जाते हैं। देश में एक या एक से अधिक राज्यों में होने वाले चुनावों में यदि स्थानीय निकायों के चुनावों को भी शामिल कर दिया जाए तो ऐसा कोई भी साल नहीं होगा जिसमें कोई चुनाव न हुआ हो। बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों को भी चुनाव कार्य में लगाना पड़ता है, जबकि देश की सीमाएँ संवेदनशील बनी हुई हैं और आतंकवाद का खतरा बढ़ गया है। विदित हो कि वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव पर 1,100 करोड़ रुपए खर्च हुए और वर्ष 2014 में यह खर्च बढ़कर 4,000 करोड़ रुपए हो गया। पूरे पाँच साल में एक बार चुनाव के आयोजन से सरकारी खज़ाने पर आरोपित बेवज़ह का दबाव कम होगा। कर्मचारियों के प्राथमिक दायित्वों का निर्वहन बार-बार चुनाव कराने से शिक्षा क्षेत्र के साथ-साथ अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों के काम-काज प्रभावित होते हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि बड़ी संख्या में शिक्षकों सहित एक करोड़ से अधिक सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया में शामिल होते हैं। ‘एक देश, एक चुनाव’ के कारण चुनावों में होने वाले काले धन के प्रवाह पर अंकुश लगेगा। सांसदों और विधायकों का कार्यकाल एक ही होने के कारण उनके बीच समंवय बढ़ेगा।

संघीय ढाँचे के विरुद्ध

संविधान में कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। भारत में वर्ष 1967-68 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते अवश्य थे। लेकिन इसका कारण कोई सांविधिक प्रावधान नहीं, बल्कि लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं का एक ही समय पर विघटित होना था। चुनाव आयोग के मुताबिक एक साथ चुनाव करने के लिये संविधान संशोधन की भी आवश्यकता होगी। भारत में संघीय ढाँचे और एक बहु-पक्षीय लोकतंत्र है जहाँ राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के लिये चुनाव अलग-अलग होते हैं। विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है, जहाँ जनता पार्टियों और नेताओं को राज्य में किये गए उनके कार्यों के आधार पर उन्हें वोट करती है। लोकसभा और विधानसभा दोनों के ही चुनाव यदि एक साथ संपन्न कराए जाते हैं तो जनता के बीच एक द्वंद्व कायम रहेगा जो स्थानीय मुद्दों से उसका ध्यान भटका सकता है और यह संघीय ढाँचे के अनुरूप नहीं होगा। चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को वैकल्पिक रोज़गार प्राप्त होता है एक साथ चुनाव न कराए जाने से बेरोज़गारी में वृद्धि होगी। यदि किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो इन परिस्थितियों में भी चुनाव आवश्यक हो जाता है।‘एक देश, एक चुनाव’ के लिये राजनीतिक पार्टियों में मतैक्यता का अभाव है, जिससे पार पाना काफी मुश्किल कार्य है। देश भर में एक साथ चुनाव कराने के लिये पर्याप्त संख्या में अधिकारियों व कर्मचारियों की आवश्यकता होगी एकीकृत चुनावों में राष्ट्रीय पार्टियों के मुकाबले क्षेत्रीय दलों को नुकसान हो सकता है।

समाधान की राह

एक साथ चुनाव सम्पन्न कराना पदाधिकारियों की नियुक्ति, ई.वी.एम. की आवश्यकताओं व अन्य सामग्रियों की उपलब्धता के दृष्टिकोण से एक कठिन कार्य है। इस सन्दर्भ में स्थायी संसदीय समिति की अनुशंसा कि चुनाव दो चरणों में आयोजित किये जाने चाहिये, काफी उचित नज़र आती है। पहले चरण में आधी विधानसभाओं के लिये लोकसभा के मध्यावधि में और शेष का लोकसभा के साथ। यहाँ विधि आयोग की उस अनुशंसा को भी महत्त्व दिया जाना चाहिये, जिसके अनुसार जिस विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के आम चुनावों के 6 माह पश्चात् खत्म होना हो, उन विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ करा दिये जाएँ। लेकिन, 6 माह पश्चात् विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा हो जाए तब परिणाम जारी किये जाएँ। इससे संसाधनों का अपव्यय भी नहीं होगा और लोकतांत्रिक गतिशीलता भी बनी रहेगी। नीति आयोग ने एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिये विशेषज्ञों का एक समूह गठित किये जाने का सुझाव दिया है जो इस संबंध में सिफारिशें देगा। वर्ष 2024 में एक साथ चुनाव कराने के लिये पहले कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती करनी होगी या कुछ के कार्यकाल में विस्तार करना होगा। नीति आयोग का कहना है कि इसे लागू करने के लिये संविधान विशेषज्ञों, थिंक टैंक, सरकारी अधिकारियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों का एक विशेष समूह गठित किया जाए।

देवेंद्रराज सुथार
संपर्क – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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