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व्यंग्य : बजट का आगमन

महंगाई की मारी और भ्रष्टाचार की बीमारी से त्रस्त जनता को बजट का बेसब्री से इंतजार है। कुपोषण के शिकार और इलाज को लाचार चूसे आम की तरह गुठलियों के मानिंद खड़े गरीबों की आंखों में बजट की रोशनी स्पष्ट तौर पर दृष्टिपात हो रही हैं। बजट के स्वागत में ढोल बज रहे हैं और आतिशबाजी की जा रही है। नेताओं की मुख मुद्रा में काफी उछाल देखने को मिल रहा हैं। बजट चीज ही ऐसी है। जिसके नाम से ही आलस खाएं गधे भी एकबारगी खड़े होकर दौड़ने लग जाते हैं। एक सूटकेस में बंद बजट सूटकेस से बाहर निकलते ही फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर तक इसके गुणगान में रंग जाते हैं। विपक्ष बजट की आड़ में सरकार को गाली देने के लिए तैयार ही रहता है। बजट की एंट्री भी बिलकुल साउथ फिल्म के हीरो की तरह होती है। यह बात ओर है कि इसके कारनामे साउथ फिल्म के हीरो जैसे बिलकुल नहीं होते है। बाबूमोशाय ! बजट तो वो विकास की संतान है जिस पर उसके बुढ़ापे की जिम्मेदारी होती है। यदि यह संतान शिष्टाचारी निकले तो विकास का बुढ़ापा आराम से गुजर जाता है। और यदि नालायक निकले और बुरी संगत की भेंट चढ़ जाए तो ये विकास को घर से बाहर करते जरा भी देर नहीें करती है। जनाब ! बजट तो उस नवयुवती की तरह है जिसकी इज्जत को हर पल खतरा रहता है। और तो और इस बजट नामक नवयुवती को गैरों से नहीं अपने से ही खतरा रहता है। हमारे जनसेवकों की नजर और नीयत कब खराब हो जाएं और बजट का काम कब तमाम हो जाएं ! इसके बारे में बड़े से बड़ा पंडित और ज्योतिषी भी पूर्वानुमान नहीे लगा सकता है। बजट बनने से पहले ही उसकी मलाई का लेखा-जोखा कर लिया जाता है। जनता तक तो सिर्फ बिना मलाई वाला दूध ही पहुंचता है। उस दूध को भी बड़े ही आकर्षक ढंग से दिखाया और बताया जाता है। सच्चाई तो यह भी है कि बजट के जन्म लेने से पहले ही बिचौलिये समाज में पनपने लग जाते हैं।  इन बिचौलिये के जीवित रहते हुए बजट से किसे का भला भी हो सकता है क्या ? इस बात में कोई दोराय नहीं है कि बजट जनता के लिए जनता के द्वारा ही बनाया जाता है। लेकिन यह जनता तक सही मयाने में पहुंच ही नहीं पाता है। यह बीच में ही इतना आवरा हो जाता है कि अपना रास्ता ही भूल जाता है। यह भी हो सकता है कि इसकी दिशा को परिवर्तित करने का षड्यंत्र बुना जाता हो ? बजट के बवाल का कमाल है कि जिस दिन बजट घोषित होने वाला होता है उस दिन हर आदमी अपने को बड़े से बड़ा नीतिकार घोषित करने में कोई गुरेज नहीं करता है। बजट के भूकंप से टी.वी. चैनल पूरा दिन हिलते रहते हैं। बजट को बजट के दिन इतना परेशान किया जाता है कि बेसहारा एक दिन में स्वर्ग सुधार जाता है। वैसे भी बजट की उम्र तो एक दिन ही होती है। यह सुबह-सुबह शेरों-शायरियों के साथ पैदा होता है और दोपहर तक हांफकर दम तोड़ देता है। फिर पूरे साल जनता त्राही-त्राही करती है।
देवेंद्रराज सुथार  
संपर्क – गांधी चौक,  आतमणावास,  बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान।  343025
mob 8107177196
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