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सरकार के ‘गलत’ फैसले ‘जन-धन’ की बरबादी का कारण

यदि आप देश के किसी भी राज्य के शहरी अथवा ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण करें तो निश्चित रूप से यह दिखाई देगा कि कहीं न कहीं किसी न किसी क्षेत्र में कोई न कोई विकास कार्य चल रहा है। गत् दो दशकों से यही स्थिति बनी हुई है। विकास की इसी यात्रा पर चलते हुए देश ने आज हज़ारों $फ्लाईओवर हासिल कर लिए हैं,बड़े-बड़े पुल बन चुके हैं, लाखों किलोमीटर सडक़ों व राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो चुका है। अनेक बड़े-छोटे बांध बन चुके हैं। कई विद्युत उत्पादन केंद्र स्थापित हो चुके हैं।हम मैट्रो युग में प्रवेश कर चुके हैं। गोया मानव जीवन का शायद कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें हमारे देश ने विकास की यात्रा गत् दो दशकों से तेज़ी से तय न की हो। ज़ाहिर है इन विकास कार्यों पर होने वाले $खर्च का भुगतान देर-सवेर हमारे देश की जनता को ही करना पड़ता है और कई बार इस भुगतान की $कीमत कई गुणा अधिक भी चुकानी पड़ती है। कभी ब्याज के रूप में तो कभी $फुज़ूल$खर्ची की शक्ल में। परंतु हमारे देश की सरकारें छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा विकास कार्य करवाने के बाद अपनी पीठ थपथपाने का कुछ इस हद तक ढोंग करती है गोया इन नेताओं ने यह विकास कार्य जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के फ़ंड से कराए हों या अपनी पुश्तैनी संपत्ति या धन से जनता के हितों में कोई कार्य कराया है।
ऐसे में इस बात की $िफक्र करनी ज़रूरी है कि भारत जैसे देश में जहां आज भी $गरीबी,मु$फलिसी तथा $कजऱ् के बोझ से तंग आकर देश के किसान आत्महत्याएं कर रहे हों,भूख की सहनशक्ति गंवाकर बच्चे मौत की आग़ोश में समा रहे हों,बेरोज़गारी और महंगाई से जनता बदहाल हो,जहां के अस्पतालों में सही समय पर सही इलाज न हो पाने के कारण आए दिन बच्चों की मौतें हो रही हों ऐसे देश में यदि विकास के नाम पर होने वाले जायज़ या नाजायज़ $खर्चो्रं को अनियंत्रित तरी$के से किया जाए या बिना किसी सटीक योजना के पैसे बरबाद किए जाएं या फिर इसी जनधन में लूट-खसोट और हिस्सेदारी की जाने लगे और साथ-साथ विकास कार्यों पर होने वाले $खर्च भी ईमानदारी व पारदर्शिता से करने के बजाए केवल $फजऱ् अदायगी और लीपापोती के रूप में किए जाएं तो यह स्थिति हमारे देश के करदाताओं के लिए कितनी चिंतनीय है? परंतु प्राय: देश के अधिकांश हिस्सों में हो रहे विकास संबंधी कार्यों में $खासतौर पर निर्माण या मुरम्मत के क्षेत्र में यही होता आ रहा है। आज देश में जो भी विकास संबंधी कार्य हुए हैं उनमें कई बड़ी योजनाएं ऐसी भी हैं जहां विदेशी कंपनियां काम कर रही हैं। $खासतौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग व पुृल तथा $फ्लाईओवर आदि के निर्माण क्षेत्र में। दूसरी ओर शहर के भीतरी क्षेत्र में हो रहे कार्य जो नगरपालिका या नगरमहापालिकाओं अथवा जि़ला परिषदों के अंतर्गत् आते हैं उन्हें स्थानीय संबंधित प्रशासन द्वारा स्थानीय पंजीकृत ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता है। यदि इन दोनों ही कामों की गुणवत्ता की जांच की जाए या इनकी परस्पर तुलना की जाए तो अपने-आप सरकारी व्यवस्था की पोल खुल जाती है।
गुणवत्ता के अतिरिक्त योजनाएं बनाने में भी सरकार कई बार ऐसे ढुलमुल $फैसले लेती रहती है जो जनता के पैसों की बरबादी का बड़ा कारण बनते हैं। उदाहरण के तौर पर हरियाणा में अंबाला शहर स्थित नौरंगराय तालाब के जीर्णोद्धार के विषय को ही ले लीजिए। सैकड़ों वर्ष प्राचीन यह तालाब अंबाला शहर के बीचोबीच शहर के नौरंगराय नामक किसी अमीर व्यक्ति ने आम लोगों की सुविधा के लिए तथा लोगों की पानी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनवाया था। इस तालाब के इर्द-गिर्द कई मंदिर व मठ हैं। यहां वर्ष में एक बार वामन द्वादशी के मेले का समापन भी होता है। इस मेले के कारण यह तालाब यहां के लोगों की जनभावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। आज इस तालाब का चूंकि कोई वारिस नहीं लिहाज़ा अंबाला प्रशासन मेले के समय इस तालाब की स$फाई आदि कराता रहता है। गत् चार दशकों से जर्जर होते जा रहे इस तालाब के जीर्णोद्धार के प्रयास होते आ रहे हैं। इसकी शुरुआत स्वयं चौधरी भजनलाल ने तालाब में कारसेवा के द्वारा की थी जिसमें पदमभूषण स्वामी कल्याणदेव जी जैसे महान संत भी शामिल हुए थे। यह शुरुआत बड़ा ठाकुरद्वारा अंबाला शहर के तत्कालीन गद्दीनशीन महंत रामनारायण दास जी की पहल पर की गई थी। उस समय से लेकर अब तक इस तालाब के विकास को लेकर दर्जनों योजनाएं बन चुकी हैं। कई बार इसके लिए सरकार बजट आबंटित कर चुकी है। और कई बार काम भी शुरु कराए जा चुके हैं।
परंतु प्रत्येक बार काम शुरु हुआ,लाखों-करोड़ों रुपये सरकार द्वारा तालाब के संबंध में बनाई गई योजनाओं पर $खर्च किए गए और कुछ ही समय बाद आधा-अधूरा निर्माण कार्य बीच में ही लटका रह गया। लगभग दस वर्ष पूर्व अंबाला में आईएएस अधिकारी मोहम्मद शाहीन उपायुक्त अंबाला के रूप में अंबाला आए तथा उन्होंने इस तालाब के जीर्णोद्धार में गहरी दिलचस्पी दिखाई। उनकी पहल पर नगरपालिका ने एक नक़्शा तैयार कर उसपर बा$कायदा काम भी शुरु करवाया। उस सरकारी न$क्शे के अनुसार सर्वप्रथम तालाब का क्षेत्रफल कम कर दिया गया और चारों ओर गहरी चहारदीवारी भी खोदी जाने लगी। दो दिशाओं में ऊंची व मज़बूत चहारदीवारी भी बना दी गई। इनमें लोहे के गेट व ग्रिल लगाई गई। जनता के करोड़ों रुपये $खर्च कर देने के बाद अचानक यह काम भी रुक गया। अब लगभग दस वर्ष बीत जाने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गीता महोत्सव के अवसर पर इसका जीर्णोद्धार किए जाने की पुन: घोषणा की। भजनलाल से लेकर मनोहरलाल के मध्य तीस-पैंतीस वर्षों की समयावधि गुज़र चुकी है। आज की तिथि में पिछली सरकार द्वारा तथा प्रशासन द्वारा तैयार किए गए पिछले तालाब जीर्णोद्धार संबंधी नक़्शे को रद्द करते हुए करोड़ों रुपये $खर्च करने के बाद पिछली सरकार द्वारा तैयार की गई मज़बूत चारदीवारी बुनियाद सहित खोदी जा चुकी है और वर्तमान सरकार किसी नए नक़्शे के साथ तालाब का सौंदर्यीकरण कर रही है।
संभव है कि सांैदर्यीकरण व जीर्णोद्धार के संबंध में उठाया गया वर्तमान सरकार का यह $कदम भविष्य में नौरंगराय तालाब की सूरत बदल दे तथा शहर को एक सुंदर,आकर्षक व रमणीक स्थान मिल सके। परंतु इतना तो ज़रूर है कि इसके पुनर्निर्माण की $कवायद में अब तक जो करोड़ों रुपये बरबाद किए गए हैं और अभी बरबाद होते जा रहे हैं इसके लिए आ$िखर कौन जि़म्मेदार है? क्यों सरकारी अधिकारियों व प्रशासन के लोगों द्वारा एक ही बार में ऐसा नक़्शा तैयार नहीं किया गया जिसपर आगे भी जीर्णोद्धार संबंधी काम जारी रह सकता? बार-बार इसके निर्माण में करोड़ों रुपये $खर्च कर होने वाली तोड़-फोड़ के लिए कौन जि़म्मेदार है? इसके अलावा भी आज देश में शहरों व $कस्बों में $खासतौर पर होने वाले अनेक सडक़,गली-कूचे व नाली-नाले संबंधी निर्माण कार्य या मुरम्मत संबंधी कार्य ऐसे हैं जो बिना किसी योजना के अथवा बिना किसी अध्ययन के शुरु कर दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप कभी जेसीबी से सडक़ व गली की खुदाई होने के परिणामस्वरूप टेली$फोन के तार कट जाते हैं,कभी विद्युत सेवाएं बाधित हो जाती हैं। कभी सीवर की पाईप लाईन क्षतिग्रस्त हो जाती है तो कभी गली-कूचों का स्तर ऊंचा-नीचा हो जाता है जिसकी वजह से लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। और साथ-साथ एक ही जगह पर बार-बार मुरम्मत का कार्य होने के कारण जनता के पैसों का भी बार-बार दुरुपयोग होता रहता है। लिहाज़ा यह परिस्थितियां इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि हो न हो सरकार के $गलत $फैसले ही जन-धन की बरबादी का कारण बनते हैं।

निर्मल रानी

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