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भीमा से भंसाली वाया कासगंज  ? 

इतिहास पर बनी फिल्‍मों का विवाद और विरोध से काफी पुराना सम्बन्ध है । क्योंकि फिल्में अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम और समाज का दस्तावेज हैं। भारत जाति और धर्म समूहों में बँटा है । फिल्मों का निर्माण भी व्यवसायिक हित को ध्यान में रख कर किया जाता है । लिहाजा फिल्मों में यथार्थ से अधिक  फंतासियों का पुट ज़रूरत से अधिक रहता है । हमें याद रखना होगा कि फिल्मों का किरदार सिर्फ इतिहास और कहानी के मध्य नहीँ घूमता है । किसी भी फिल्म में मजबूत कहानी , किरदार , संवाद , फिल्मांकन और मनोरंजन का होना ज़रूरी है । क्योंकि फिल्मों का मूल उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना भी होता है । इतिहास के किरदार को लेकर बनी संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत का भी यहीं हाल है । लेकिन फिल्म प्रदर्शन को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है,  वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीँ है । पद्मावत एक फिल्म है लेकिन इसके पीछे हमारा संविधान और कानून कटघरे में खड़ा है । यहाँ फिल्म से अधिक महत्वपूर्ण सवाल संवैधानिक व्यवस्था का खड़ा होना  है । भारत का समाजिक ढाँचा विभिन्न जाति , धर्म , भाषा समूहों को मिला कर बना है । हमारा संविधान अपनी सीमा में सभी के अधिकारों का पूरा संरक्षण करता है और आजादी देता है । लेकिन जब किसी मसले को जातीय अस्मिता से जोड़ लिया जाय और संविधान को पीछे छोड़ दिया जाय। फ़िर : सवाल  उठता है कि इन संस्थाओं का क्या  होगा। देश में जाति , भाषा , धर्म , सम्प्रदाय राजनीति का प्रिय विषय है । आये दिन कोई न कोई नया मसला सामने आता रहता है । कल भीमा कोरेगाँव की हिंसा थी फ़िर भंसाली और उनकी पद्मावत आयी । अब कासगंज सुर्ख़ियों में है । इस पर कब विराम लगेगा कहना मुश्कील है ।
फिल्‍मों के साथ विवाद और विरोध का सिलसिला भी लंबा रहा है। इतिहास से जुड़े किरदारों या किसी घटना पर आधारित फिल्‍में समय-समय पर बनती रही हैं। लेकिन पद्मावत को लेकर जिस तरह एक समूह विशेष के लोग और करणी सेना सड़क पर उतरी है , वह कई सवाल खड़े करती है । हालांकि इस फिल्म पर शूटिंग के दौरान से विवाद चल रहा है ।
जयपुर  में  पद्मावती की शूटिंग के दौरान भी  करणी सेना की तरफ़ से हमले किये गए थे। उस दौरान भी करणी सेना का आरोप था कि संजय लीला भंसाली की इस फिल्‍म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच फिल्माए जा रहे लव सीन पर उन्‍हें आपत्ति थी। कहा यह गया था की यह  सीन एक ड्रीम सीक्‍वेंस के रूप में फिल्‍माए जाने की बात आयी थी।  जबकि देश भर में 3200 सिनेमा हाल में प्रदर्शित हुईं पद्मावत को देखने के बाद मीडिया में जिस तरह की समीक्षा आ रही है,  उससे यह साफ हो गया है कि फिल्म में खिलजी और रानी के बीच ऐसा कोई दृश्य नहीँ हैं जो राजपूत समाज के मान मर्यादा के खिलाफ हो , फ़िर यह बवाल क्यों । भंसाली की भाषा में जवाब देने के लिए अब करणी सेना भी भंसाली की माँ पर फिल्म बनाने का एलान किया है । फिल्म समीक्षकों का दावा है कि फिल्म में राजपूत समाज की गरिमा को बेहद अच्छे तरीके से प्रदर्शित किया गया है। फ़िर विवाद क्यों ?
साल 2015 में आयी भंसाली की फिल्‍म ‘बाजीराव मस्‍तानी’ पर भी इतिहास से छेड़छाड़ और भावनाओं को आहत करने का आरोप लग चुका है। बाजीराव मस्‍तानी के रिलीज के समय इस फिल्‍म का पुणे में जमकर विरोध हुआ था। वहीं इससे पहले भंसाली की फिल्‍म रामलीला के नाम को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। आशुतोष गवोरिकर की फिल्‍म जोधा अकबर का भी राजस्‍थान की इसी राजपूत करणी सेना ने विरोध किया था। इस फिल्‍म पर भी इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप था। सिर्फ फिल्‍म ही नहीं, इसी तर्ज पर बने एकता कपूर के टीवी सीरियल जोधा अकबर का भी जोरदार विरोध हुआ था।
पद्मावत से उठे विवाद से एक बात साबित हो चली है कि देश में संवैधानिक संस्थाओं का कोई मतलब नहीँ रह गया है । यहाँ अभिव्यक्ति की आजादी की अपनी – अपनी अलग – अलग परिभाषा है । एक आजादी भंसाली की है जो 200 करोड़ खर्च कराने के बाद भी रुपहले पर्दे पर संगीनों के साए में उतारी
गयी। दूसरी तरफ़ करनी सेना की अपनी आजादी है जो उसे उतरने देना नहीँ चाहती है। तीसरी सबसे बड़ी बात है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के कानूनी हितों की संरक्षण करने वाली संस्था सेंसर बोर्ड और सुप्रीमकोर्ट का । यह तो एक तरह की समाजिक अराजकता है । हिंसक प्रदर्शन के बाद यह बात और साफ हो गई है कि लोकतंत्र में संविधान का कोई मतलब नहीँ , सिर्फ लाठीतंत्र सभी विधानों में श्रेष्ठ है । फिल्मों के लिए देश में सेंसर बोर्ड का गठन किया गया है । जब बोर्ड ने फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दे दिया फ़िर विरोध क्यों  ? इसके अलावा सबसे अहम बात जब देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी पूरे देश में फिल्म के एक साथ प्रसारण की अनुमति दे दिया । बावजूद इसके वबाल क्यों नहीँ थमा रहा। फ़िर देश में सुप्रीम कोर्ट और सेंसर बोर्ड जैसी संस्था का क्या मतलब क्या । फ़िर इनके अस्तित्व को क्यों न
समाप्त कर देना चाहिए। फिल्म के विरोध दूसरे भी लोकतंत्रीय तरीके हो सकते हैं । करनी सेना हिंसक प्रदर्शनों के ज़रिए क्या संदेश देना चाहती है । सेना ने तो इस विवाद को हवा देकर फिल्म के बाजार और माँग को और बढ़ा दिया है। अब तो भंसाली की पद्मावत उनकी झोली भर देगी। 25 जनवरी यानी पहले ही दिन वह हिट गई है । भंसाली तो अपनी झोली भर लेंगे और करनी सेना भी आज़ नहीँ कल चुप हो जाएगी। पदमावत फ़िर से इतिहास बन जाएगी। लेकिन विरोध और बंद की हिंसा में देश , समाज , संविधान और कानून के साथ लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुँची है ,  आर्थिक नुकसान हुआ है । उसकी भरपाई कैसे होगी। महाराष्ट्र के भीमा गाँव से जातीय अस्मिता और सम्मान की उठी आग पद्मावत पर आ गिरी । क्या आगे वह बुझ पाएगी ? ऐसी उम्मीद पालना मूर्खता होगी। क्योंकि पद्मावत के इतिहास में खोया बैंडिट क्वीन का व्यतीत अब व्यवस्था के नुमाइंदो से सवाल करने लगा है। सोशल मीडिया पर यह सवाल खूब वायरल हो रहा है। लोग हासिए के साथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हैं। वहाँ भी गम्भीर बहस जारी है, और इसका जवाब भी हमारे पास नहीँ है। कानून व्यवस्था राज्यों का सवाल है लेकिन राजस्थान , हरियाणा , मध्य प्रदेश और गुजरात ने फिल्म के प्रदर्शन को लेकर जिस तरह हाथ खड़े किये यह भी बड़ा सवाल है । यानी इन राज्यों ने ख़ुद को करनी सेना के हवाले कर दिया है । सीधे – सीधे वोट बैंक कि राजनीति की जा रही है । इससे यह साफ हो जाता है कि पद्मावत विरोध के पीछे एक राजनीतिक साजिश है। पद्मावत ने न्यायपालिका , कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की पोल खोल कर रख दिया। यह साबित हो गया है कि कानून और व्यवस्था नाम की यहाँ कोई चीज़ नहीँ है । सांविधानिक संस्थाएँ गौड़ हैं । कुछ बचा है तो राजनीति और अपनी मर्जी ।
प्रभुनाथ शुक्ल 
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