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बजट ने आम आदमी को किया निराश,  वेतनभोगी कर्मचारियों को फिर किया दरकिनार

मोदी सरकार के आम बजट से बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांधे आम लोगों के हाथ निराशा लगी है. सरकार के वित्तमंत्री ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपालों की सेलरी में भरपूर इजाफा करने के अलावा सांसदों की सेलरी बढ़ाने की स्थायी व्यवस्था कर दी है जबकि आम आदमी की जरूरत की चीजें जैसे मोबाइल,कम्प्यूटर और विदेश से आने वाली हर छोटी-बड़ी चीज मंहगी कर दी हैं. एक्साइज टैक्स बढ़ने से विदेश से आने वाली हर चीज मंहगी हो जायेगी, जिसका आम जनता पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ेगा. सैलरी क्लास को बजट से बेहद निराशा हुई है. वित्तमंत्री अरूण जेटली ने ट्रेवल और मेडिकल छूट जो क्रमश: 18 हजार और 15 हजार यानि कुल 33 हजार थी, उसे समाप्त करते हुए केवल 40 हजार स्टैंडर्ड डिडक्शन दिया है, जिसमें वेतनभोगियों को केवल 7 हजार का लाभ हुआ है लेकिन उसे सेस 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत बढ़ाकर वापिस ले लिया गया है. केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आज संसद में सरकार का पांचवां और अंतिम पूर्ण बजट पेश किया. आम बजट से खास तौर पर मध्यम वर्ग ने काफी उम्मीदें लगा रखी थीं कि इनकम टैक्स स्लैब में बड़ा बदलाव करते हुए नौकरीपेशा लोगों को बड़ी राहत दी जाएगी, लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं करके मध्यम वर्ग को निराश किया है. हालांकि सीनियर सिटीजन के लिए डिपोजिट पर छूट 10 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है. कुल मिलाकर मोदी सरकार ने वेतनभोगी कर्मचारियों को ठेंगा दिखा दिया है जबकि कार्पोरेट सेक्टर को बड़ी छूट देते हुए कम्पनियों को टैक्स से बड़ी राहत दी है. किसानों को फसलों के उचित दाम देने के लिए लागत का डेढ गुणा मूल्य देने का ऐलान किया है लेकिन जमीन पर ऐसा कभी नहीं हो पाया है. 50 लाख लोगों को कैशलेस मैडिकल सुविधा देने की बात की गई है लेकिन यह जमीन पर कैसे होगा, इसकी कोई कार्य योजना कहीं नहीं है. सीनियर सिटीज़न को बैंकों में जमा ब्याज से होने वाली 50 हजार रूपए को करमुक्त घोषित किया गया है जबकि पहले यह सीमा केवल 10 हजार थी. बजट की आलोचना शुरू होते ही सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज टैक्स दो रूपए घटा दिये गये हैं जबकि पिछले एक साल में सरकार ने एक्साइज टैक्स में करीब 10 रूपए की बढ़ोतरी की है. आम करदाता और विशेषकर वेतनभोगी करदाताओं का कहना है कि यह भाजपा सरकार का “जुमला बजट” है. आम करदाताओं का कहना है कि मोदी सरकार भी वाजपेयी सरकार के “शाइनिंग इंडिया” नारे की तरह  “डिजीटल इंडिया” के नाम पर जनता को गुमराह कर रही है.

देश की करीब 70 से 75 फीसदी जनता मध्यम वर्ग से आती है. इस वर्ग के लोगों ने आम बजट से उम्मीद लगा रखी थी कि इस बार आयकर स्लैब में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा, लेकिन आम बजट में इसे यथावत रखा गया है. वहीं, कस्टम ड्यूटी में इजाफा कर दिया, जिससे मोबाइल, टीवी, फ्रीज जैसे मध्यम वर्गीय घरों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं महंगी हो जाएगी.  इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य पर सेस बढ़ाकर तीन से चार फीसदी कर दिया है. इसका भी मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा. देश में पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं काफी महंगी हैं और बजट के बाद यह काफी महंगी हो जाएंगी और इसका सीधा असर मध्यम वर्ग पर ही पड़ेगा.

एक कम्पनी में कर्मचारी सुरजीत शर्मा का बजट को लेकर कहना है कि सरकार से उम्मीद थी कि बजट में आम लोगों का ध्यान रखा जाएगा, खासकर इनकम टैक्स स्लैब को बढ़ाया जाएगा, ताकि नौकरीपेशा लोगों को राहत मिल सके, लेकिन बजट में आयकर सीमा को यथावत रखा गया है. हमारे जैसे नौकरी करने वाले लोगों के वेतन का ज्यादातर पैसा आयकर चुकाने में चला जाता है, जिससे परिवार के महत्वपूर्ण कार्य छूट जाते हैं. अगर आयकर स्लैब बढ़ता, तो लोगों को राहत मिलती, लेकिन सरकार ने इस बार भी निराश कर दिया है.

सोनिया चोपड़ा ने भी बजट को मध्यमवर्ग को निराश करने वाला बताया.  उनका कहना है कि सरकार ने बजट में कई चीजों पर टैक्स बढ़ाया है, जिससे महंगाई बढ़ेगा. जबकि आगामी चुनावों से पहले यह सरकार का अंतिम पूर्ण बजट था, इसलिए लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उन्हें बजट में कुछ भी नहीं मिला. स्वास्थ्य और शिक्षा पर सेस बढ़ा दिया गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा, दोनों ही महंगी हो जाएंगी और इसका सबसे ज्यादा असर मध्यमवर्ग पर ही पड़ेगा.

गृहणी रितु वर्मा का कहना है कि बजट को लेकर मध्यम वर्ग को काफी उम्मीदें होती हैं. कौन-सी चीजें सस्ती होंगी, आयकर सीमा में कितना इजाफा होगा, मध्यमवर्गीय परिवारों की नजर इस पर रहती हैं, लेकिन इस बार वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा पेश किए गए बजट से सबसे ज्यादा निराशा मध्यम वर्ग के हाथ लगी है. नौकरी-पेशा ईमानदार करदाताओं को दंडित किया गया है जबकि कार्पोरेट सेक्टर पर छूट की बरसात की गई है. इनकम टैक्स सीमा में कोई बदलाव तो किया ही नहीं है, वहीं कई वस्तुओं की कस्टम और एक्साइज डयूटी में इजाफा कर दिया है.

वहीं, गृहिणी एकता मेहरा का कहना है कि इस सरकार में महंगाई चरम पर है और रसोई का बजट काफी बढ़ गया है. ऐसे में बजट में सरकार से उम्मीद थी कि दैनिक जरूरतों की चीजों पर टैक्स में कमी होगी, लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया.  यह बजट  से महंगाई और बढ़ेगी, जो मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़ देगी, इसलिए “आईवाश” के लिए बजट के तुरंत बाद पैट्रोल और डीजल पर एक्साइज डयूटी दो रूपए कम कर दी गई है जबकि पिछले एक साल में यह करीब 10 से 12 रूपए बढ़ाई जा चुकी है. इसी प्रकार गृहिणी रश्मि वोहरा का कहना है कि मध्यमवर्गीय परिवारों में आमदनी इतनी नहीं बढ़ी है, जितनी रफ्तार से महंगाई बढ़ रही है, ऊपर से केंद्र और राज्य सरकार के टैक्स लगातार बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में आम लोगों का जीवन मुश्किल होता जा रहा है.  बजट से उम्मीद थी कि इनकम टैक्स स्लैब को बढ़ाया जाएगा, वहीं दैनिक उपभोक्ता वस्तुओं पर लगने वाले टैक्स में कमी होगी, लेकिन सरकार ने इन दोनों मोर्चों पर निराश किया है. महंगाई नियंत्रण को लेकर वित्त मंत्री ने बजट में कोई उपाय नहीं किया है. मोदी सरकार के दावे व वादे सब खोखले हैं.

कैशलेस योजना के बारे में बात करने पर कर सरकार की नीतियों पर कड़ी नजर रखने वाले चौधरी जिले सिंह का कहना है कि यह योजना किसानों की फसल बीमा जैसी होने का अनुमान है जिसका फायदा अस्पतालों को होगा. उदाहरण समझाते हुए उन्होंने कहा कि फसल बीमा योजना में सरकार 24 हजार करोड़ प्रीमियम भरने का दावा करती है जबकि किसानों के 8 हजार करोड़ का दावों की भरपाई की गई है और 14 हजार करोड़ रूपए की कमाई बीमा कम्पनियों को हुई है. सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना का भी यही होने वाला है.

विजय शर्मा

 

 

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