ब्रेकिंग न्यूज़

पुस्तक  समीक्षा : जीवन के हर पल से जुड़े रहने का साहित्यिक प्रयास है ‘जीवन गीत’

सम्बन्धों  के छीजते काल में जब कवि  या रचानाकार की वैसी कृति सामने आती है जिसके एक एक शब्द रिस्तों के महत्व को व्याख्यायित  हैं तो  हृदय को बड़ा ही सुकुन मिलता है। लगता है,कुछ तो है जिसके जीवन के मार्धुय को बचाए रखा है।  हरेन्द्र सिन्हा, जिन्हें साहित्य का जहाँ पारिवारिक संस्कार प्राप्त है और नौकरी में भी साहित्य सेवा का सुअवसर मिलता रहा है उनके द्वारा रचित ‘जीवन-गीत’ उनकी काव्य शक्ति और गद्य-क्षमता दोनों को उपस्थित करने में सक्षम है।
प्रत्येक रचना उनकी सकारात्मक विचारधारा को उकेरती हुई लगती है।  पुस्तक में जहाँ 38 कविताएँ हैं वहीं चार कहानियाँ भी हैं।  ये सब रचनाकार की  साहित्य साधाना के प्रतिफल हैं जो वे जीवन पर्यन्त करते रहे।  एक कवि के रूप में हरेन्द्र सिन्हा ने जीवन के विविध पक्षों को बड़े ही सुंदर भावों के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी रचनाओं में पारिवारिक रिस्तों की पवित्रता के साथ गाँव, खेत-खलिहान, नदी, झरने, किसान, सुख-दुःख, जीवन का संघर्ष, यायावरी का आनंद और प्रमुख रूप से नारी विमर्श उपस्थित है।

‘बचपन के दिन’ शीर्षक कविता में कवि अपने बाल्य काल के विभिन्न पक्षों को बड़ी सहजता से रखता है।  वह समय जब बचपन के सामने न छल कपट होती है, न जातिभाव का विभेद, न कोई चिंता- फ्रिक होती है न मनमुटाव का रोग। तभी  तो कवि लिखता है –

गाँव के सभी बिरादरी के लोगों का,
मिलना जुलना आज भी
हमारे दिल में बसा हुआ है।
……………………………………….
मुहल्ले के बच्चों के साथ
गुल्ली-डंडा, कबड्डी खेलना
पतंग उड़ाने का मजा लेना
बचपन की यादों को खुशनुमा कर देती हैं।

माँ, मात्र जन्मदायिनी नहीं, अपनी ममता और स्नेह से सिंचित करनेवाली वह अजस्त्र  धारा है जिसका कलकल- छलछल नसों  में रक्त बनकर उमड़ता है।  माँ के प्रति कृतज्ञता को कवि सिन्हा ने बड़े ही आदर से उधृत किया है  –

माँ! तुमने कितने मशक्कत की है / परिवार को पालने, पोसने,/पढ़ाने-लिखाने और संस्कार देने में।
बेटियों और बेटों का शादी-विवाह / करके उन्हें एक नया आयाम दिया तूने/
मैं, आज भी तुम्हारी, उन पक्तियों को /भूला नहीं पाता हूँ –/जब तुम  गाय के गोबर से,/घर को लीपते हुए अपने लहजे में
सुबह-सुबह भजन गाती थीं-/‘ना जानी रामजी कवन गति होइहें हो’

पिता के प्रति भी कवि का वही आदर भाव है जिसकीअपेक्षा एक संस्कारी और विनम्र पुत्र से की भी जाती है – जब कवि ‘बाबूजी’ कविता में कहता है –‘आपके दिए हुए वे ही संस्कार / आपके सिखाए हुए वही सब व्यवहार/ पुरे परिवार को सुखमय, बनाये हुए हैं।’

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन एक स्वप्न होता है, गृह निर्माण,ऐसा घर जो मानवीय मूल्यों से सजाया गया हो। कवि सिन्हा ने अपनी घर शीर्षक रचना में घर को मात्र एक आवास नहीं माना है।  माना है इसे ऐसी जगह जहाँ सबके लिए बिना भेदभाव मानवीय प्रेम और स्नेह की वर्षा हो। टूटे रिस्तों को बचाने का यत्न हो तभी तो कवि कहता है –

“चलो, एक घर बनाएँ/एक छोटा-सा घर-/जो मिटटी, पानी और धूप/से बना हो/ स्नेह, प्यार और शांति
में सना हो.”

कवि सामाजिक सौहार्द से परिपूर्ण घर को ही सार्थक मानता है यह उसके सामाजिक विचारों की पवित्रता और मानवीय गुणों की सुगंध को प्रदर्शित करता है-

“घर के पास ही / एक नीम का पेड़ हो –/जिसकी छाया में बैठकर/ देश, दुनिया की चकाचौंध से हटकर,/भाई रामदीन के साथ/ भाई जफर के साथ/ भाई बलविंदर के साथ,/भाई अलेक्जेंडर के साथ,/ढेर सारी गुफ्तगू हो .”

भौतिकवाद और बाज़ारवाद के बीच समाप्त हो रहे देश भक्ति के भाव और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का अवरोहण देख रचनाकार को लगता है आज से फिर से एक भगत सिंह की आवश्यकता है जिसके त्याग और बलिदान का अनुभव आज के युवा पीढ़ी को हो जो अपने नैतिक दायित्व से विमुख होती जा रही है।  कवि का आग्रह है –

“तुम क्यों नहीं लौट आते /भगत सिंह /फिर एक बार भगत सिंह ?/मेरी विनती है / एक बार
अवश्य यहाँ पधारो /दूर करने के लिए अत्याचार बेबसी/भूख मरी और भ्रष्टाचार. ( कविता- ‘लौट आओ एक बार’)

कवि सिन्हा समकालीन चिंतन से इतर नहीं है बल्कि स्त्री विमर्श के समर्थन  में उन्होंने एक ज्वलंत प्रश्न खडा कर दिया है। कवि कहता है –

“सुहागरात-/ की आधी रातमें /पति ने /पत्नी से पूछा –/तुम पवित्र हो न ?/कुछ क्षण सन्नाटा छा गया /पत्नी ने कहा
प्राण प्रिये!/मैं जानती थी /आप उन्हीं के वंशज है /जिन्होनें प्रिय पत्नी की /अग्निपरीक्षा ली /यही प्रश्न मैं करूँ तो /
एक बार फिर सन्नाटा छा गया।

भ्रष्टाचार पुरे देश को खोखला करता जा रहा है यह एक ऐसा रोग है जिसके शिकंजे में पूरी राजनीति कसी हुयी लगती है।  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने अपना पंजा फैला रखा है कवि ने इस भाव को व्यंग्यात्मक रूप से व्यक्त करते हुए लिखा है –

“भ्रष्टाचार भजो भाई रे !/रक्षक ही सब बन गये भक्षक /ऐ नौबत कैसी आई रे !/शर्म हया को पे रख के /मुफ्त की करे कमाई रे !” (कविता- भ्रष्टाचार)

सच कहा जाए तो रचनाकार सिन्हा अपनी प्रत्येक रचना के साथ एक संवेदनशील और सहज प्रहरी की तरह दिखाई देते हैं. इस पुस्तक में उनकी कहानियाँ ‘शर्मा जी’, ‘मिर्जा साहब’, ‘घर घर देखा एके लेखा’ तथा ‘तो चलिए बात करते हैं’, सब में हरेन्द्र सिन्हा ने अपनी कलम से सामाजिक सदभावना और प्रेम के लिए चिंतन व्यक्त किया है . वस्तुत: सभी रचनाएँ अपने कथ्य और शिल्प में पुष्ट लगती है जिसका साहित्यिक समाज निश्चित ही आदर करेगा.

समीक्षा- संतोष कुमार
समीक्ष्य पुस्तक का नाम – जीवन गीत
रचनाकार – हरेंद्र सिन्हा
प्रकाशक-वनांचल प्रकाशक, तेनुघाट प्रकाशन
वर्ष –2017
मूल्य-175

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar