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अंकित का खून- जो करते हैं लहू के रंग में फर्क

पिछले एक फ़रवरी की शाम अंकित सक्सेना का राजधानी दिल्ली के रघुवीर नगर में सरेआम कत्ल हो गया। घिनौना, हृदय विदारक और बर्बरतापूर्ण I जैसे बकरे को जिबह (गला रेतकर) करके मारा जाता है वैसे ही, बीच सड़क पर 23 साल के नौजवान पेशेवर फोटोग्राफर को महज इसलिए जान से हाथ धोना पड़ा, क्योंकि; उसने एक बीस बरस की बालिग मुसलमान कन्या से प्रेम करने का दुस्साहस किया था। दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती ही जा रही थी। उस दिन शाम भी वह बेचारी अंकित से मिलने निकली ही थी कि उस 20 वर्षीय प्रेमिका के अपने बाप, मामा, चाचा और भाईयों ने उसी की माँ के साथ मिलकर भरी बाज़ार में बीच सड़क पर अंकित को उसके घर के बाहर ही पकड़ लिया और एक तेज खुखरी की धार से उसके गले को रेत-रेत कर कत्लेआम कर दिया I पर उस बदनसीब अंकित के कत्ल पर देशभर की सेक्युलर बिरादरी ने जैसी कि उनसे पहले से ही उम्मीद की जा रही थी, कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी। उन्हें गो-कशी करने और गोमांस रखने के आरोपी अखलाख की हत्या के वक्त देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट आता भी नजर नहीं आया। इसीलिये वे शांत हैं, मस्त हैं और सेक्युलरवाद की जाम टकराने में व्यस्त हैंI उन्हें अपनी मस्ती भरे ठहाकों के बीच अंकीय के माँ की चीख सुनाई तक नहीं देती I उन्हें यही करना भी चाहिए था।

क्या हो गया इस देश में? जहाँ यह गाया जाता रहा है कि ‘’मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना, हिंदी हैं, हमवतन हैं, हिंदोस्ता हमारा I’’ किसने बिगाड़ा इस माहौल को? किसने सिर चढ़ाया इन धर्मांध उन्मादियों को?

अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य अंकित के सरे बाज़ार गला रेतकर मारे जाने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी उसके घर जाकर उसके माता-पिता से संवेदना व्यक्त करना जरूरी नहीं माना। अंकित के कत्ल को तमाम सेक्युलरवादी एक सामान्य घटना मान रहे हैं। इसीलिए राहुल गांधी या फिर केजरीवाल जी अंकित के परिजनों से क्यों मिलें? अंकित जैसे न जाने कितने नौजवानों का रोज ही कत्ल होता रहता है इस देश में I उनके मारे जाने से देश की धर्मनिरपेक्षता पर कोई असर थोडे ही पड़ता है? वह तो अक्षुण्य रहती है। ये मोटी चमड़ी वाले बेहया हैं I इंसान कहना भी गलत ही होगा इन्हें I आखिर, इन सेक्युलरवादिओं को बाकी तमाम काम भी तो करने होते हैं। केजरीवाल जी को सुबह से शाम तक एफ एम रेडियों पर बच्चों को ज्ञान भी देना होता है। इसलिए ये अंकित के मारे जाने पर क्यों शोकाकुल हो? राहुल बाबा अपनी ढलती जवानी में मोदी की लोकप्रियता से परेशान हैं I जाने यह योगीराज उनको कब चांस देगा? चांस देगा भी भला या नहीं?

अब अंकित, पहले डा. नारंग

याद रहे ये वही केजरीवाल हैं, जिन्हें सितंबर,2016 में राजधानी के विकासपुरी में कट्टरपंथी बांग्लादेशियों के हाथों मारे गए डाक्टर पकंज नारंग के परिवार से मिलने की कभी फुर्सत ही नहीं मिली थी। जनकपुरी की घटना से सारी दिल्ली सहम गई थी। लेकिन, केजरीवाल को डाक्टर के परिजनों से मिलना जरूरी नहीं लगा था। डा. पंकज नारंग की बांग्लादेशियों ने बिना वजह ही एक मामूली से रोड रेज में हत्या कर दी थी। ये वही सेक्युलरवादी हैं जो कासगंज में तिरंगा यात्रा निकल रहे चन्दन गुप्ता को गोली मारकर हत्या किए जाने पर भी चुप रहते हैं I अंकित सक्सेना के कत्ल पर सेक्युलर बिरादरी की चुप्पी तो अब आम लोगों को समझ में आने लगी है। अगर ये अंकित के मारे जाने पर शोक जताएँगे, तो देश की धर्मनिरपेक्षता पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। इसलिए ये तटस्थ भाव से सारी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। ये प्रेस क्लब पर कोई बैठक भी नहीं कर रहे । ये कोई कैंडिल मार्च निकालने के बारे में भी नहीं सोच रहे। इनको न तो .नारंग की हत्या में सांप्रदायिकता दिखाई दी थी न कासगंज के चन्दन को गोली मारे जाने में। इन सरेआम हत्याओं पर खामोश हैं ये तमाम छद्म धर्मनिरपेक्षवादी ।

करते हैं ये कत्ल में भी फर्क

डा. नारंग की हत्या को बिसाहाड़ा कांड वाले अखलाख से अलग बताने वाले सद्बुद्धिजीवियों नेअब अंकित के कत्ल के बाद भी मौन धारण कर लिया हैं। दादरी के बिसहाड़ा गांव में एक अखलाख नाम के उस शख्स को अपने घर में गौं-मांस रखने के आरोप में उग्र भीड़ ने मार डाला था। उस समय तो सभी कहने लगे थे कि बकरे का मांस था I लेकिन, जब उत्तर प्रदेश की तत्कालीन अखिलेश यादव की सरकार के फोरेंसिक लैब ने ही उसे गौ-मांस ही सिद्ध कर दिया था, तब तो इनकी बोलती ही बंद हो गई थी I श्मशान वाली चुप्पी साध ली थी उन सभी सेक्युलरवादियों ने I निश्चित रूप से अखलाख की हत्या भी बर्बरतापूर्ण थी I वह एक निंदाजनक गलत कृत्य था I लेकिन, घटना के बाद तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता मृतक मोहम्मद अखलाक के घर जुलूस निकालकर पहुंचने लगे थे। राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और असदद्दीन ओवैसी से लेकर माकपा की वृंदा करात तक सब के सब अखलाख के घर गए थे हाजिरी देने। तब इन सबका वहां जाना सही था, क्योंकि तब इनके मुताबिक धर्मनिरपेक्षता का खून हुआ था। अब अंकित जैसे एक छोटे-मोटे फोटोग्राफर का कत्ल हुआ है। इससे तो धर्मनिरपेक्षता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा न? इसलिए ये धर्मनिरपेक्षता और उससे मिलने वाले एकमुश्त वोटों के लालच में अंकित के घर जाकर अपना वक्त क्यों बर्बाद करेंगे भला?भाकपा के महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी भी अखलाख की हत्या के लिए मोदी पर गरजते-बरसते रहे थे। हालांकि रेड्डी जी अब चुप है क्योंकि एक अनाम नौजवान अंकित मारा गया है। वे अंकित की मौत की हत्या पर कठोर बयान देकर अपना वक्त थोड़े ही बर्बाद करना चाहेंगे। उनकी जुबान तब भी सिल जाती है जब केरल और पश्चिम बंगाल में संघ के निहत्थे कार्यकर्ताओं को सरेराह निर्ममता से घेरकर मार दिया जाता है।

प्यार करने का गुनाह

क्या अब हमारे देश में दो बालिग नागरिकों को आपस में स्यार करना भी गुनाह हो गया? क्या कोई हिन्दू लड़का किसी मुसलमान लड़की से प्यार करेगा तो उसकी धर्मके हत्या कर दी जाएगी? मैं तो आमिर खान सहित कई राजनेताओं और पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, जिन्होंने मुसलमान होते हुए भी हिन्दू लड़की से प्यार किया, शादी की बच्चे भी पैदा किए और सुखी जीवन बिता रहे हैं I उनको तो कभी किसी ने नहीं मारा? अंकित एक होनहार हंसमुख नौजवान था Iफोटोग्राफी करता था और बॉडी-बिल्डिंग का शौक भी था। वह आईपीएस बनना चाहता था Iतैयारी भी कर रहा था I लेकिन, उसने एक गुनाह कर दिया था। हिन्दू होकर भी वह पड़ोस की एक मुस्लिम लड़की से प्यार कर बैठा और उसकी सजा के तौर पर लड़की के भाई-बाप, चाचा, मामा और लड़की की माँ ने पकड़कर उसकी गला रेतकर हत्या कर दी। यह हत्या अंकित के भाई और मां के सामने ही हुई। अंकित सक्‍सेना को एक मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाये यह लड़की के परिवार को पसंद नहीं था I घटनाक्रम के अनुसार एक फरवरी की शाम को आठ बजे लड़की के परिवारवाले अंकित के घर के सामने पहुंचे और अंकित को पकड़कर उससे अपनी लड़की से संबंधों के बारे में पूछने लगे। जब अंकित ने उन सबसे थाने पर चलकर मामला सुलझाने को कहा तो लड़की के पिता, चाचा, मामा और भाई सबने मिलकर उसपर लात-घूसे बरसाए। लड़की की मां, भाई और मामा ने अंकित के हाथ-पैर पकड़ लिए और पिता ने धारदार चाकू से उसका गला रेत दिया।

नहीं सभ्य समाज लायक

धिक्कार है ऐसे राक्षसों पर !ऐसे संवेदनहीन समाज पर। अगर इतनी ही नफरत रखनी है तो बांग्लादेश से भागकर क्यों आये थे? वहीं जाकर रहो। क्योंकि, आप जैसे निष्ठुर और धर्मांध लोग सभ्य समाज में रहने लायक हो ही नहीं। हिन्दू लड़की या लड़कों को मुस्लिम लड़के, लड़कियों से दूर रखो। तब तो कोई अंकित नहीं मारा जाएगा!खैर, अंकित के बर्बरतापूर्ण क़त्ल होने पर किसी लेखक ने अपना पुरस्कार वापस करने के बारे में सोचा भी नहीं। दरअसल, ये छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी व्यक्ति धर्म देखकर ही अपना कदम बढ़ाते हैं और लहूलुहान मानवता को कर देते हैं। आप इन सेक्युलरवादियों को इंसान के छद्म रूप में हैवान भी कह सकते हैं। इनके लिए मरने वाले इंसान नहीं होते। इनके लिए तो मरने वाला सिर्फ और सिर्फ एक धर्म के हिस्सा होते है, जोउनकी नफरत की आग में अपनी आहुति देता है और इन्हें थोक भाव में वोट देता है। यह हिन्दुस्तानी है, पाकिस्तानी है या बंगलादेशी यदि उसने तिकड़म से वोटर कार्ड बनवा लिया है तो इनको तो सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है I ये समाज के वैसे ठेकेदार हैं, जो अपनी सुविधा के अनुसार ही निंदा और प्रशंसा भी करते हैं।इसलिए इनको पहचानना जरूरी है, जो धर्म देखकर इंसान पहचानते हैं। इसलिए इनकी अख़लाक़ और अंकित के कत्ल पर प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती।

बिंदास अंकित का कत्ल बहुत सारे सवाल छोड़ कर जा रहा है जैसे । कि अब इस देश में धर्मनिरपेक्षता का झंडा उठाने वाली बिरादरी की लोग किसी हिन्दू के कत्ल पर दो शब्द निंदा के भी नहीं कहेंगे। इन बीमार मानसिकता वाले लोगों को देश गौर से देख रहा है, अच्छी तरह पहचान चुका है। ये लहू के रंग में भी फर्क करने से पीछे नहीं हटते।

आर.के.सिन्हा

(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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