ब्रेकिंग न्यूज़

रोकना ही होगा टीबी की बिमारी को ?

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में 2018-19 का बजट पेश करते हुए कहा कि टीबी रोगियों के पोषण के लिए सरकार ने सहायता स्वरूप 600 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है। उन्होंने कहा कि देश में जिन टीबी रोगियों का इलाज चल रहा है उन्हें 500 रुपए प्रतिमाह सहायता के रूप में दिए जाएंगे। सरकार ने  इस भयंकर बीमारी को 2025 तक जड़ से खत्म करने की घोषणा कर दी है। सरकार द्वारा टीबी के मरीजों को सहायता मुहैया कराने की पहल राष्ट्रीय रणनीतिक योजना का हिस्सा है। जिसके माध्यम से स्वास्थ्य मंत्रालय ने साल 2025 तक तपेदिक के उन्मूलन का लक्ष्य रखा है।

गौरतलब है कि दुनियाभर में बीमरियों से मौत के 10 शीर्ष कारणों में तपेदिक को प्रमुख बताया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2016 के मुताबिक भारत में दुनिया भर के 24 फीसदी टीबी के मामले हैं और इससे हर साल पांच लाख भारतीयों की मौत हो जाती है। यानी देश में हर तीन मिनट में दो भारतीयों की मौत हो जाती है। 2016 में जारी वैश्विक तपेदिक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 28 लाख टीबी के नये मरीज पंजीकृत होते हैं। टीबी भारत की सबसे बड़ी और गंभीर स्वास्थ समस्या है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टीबी उन्मूलन अभियान को राष्ट्रीय प्राथमिकता के तौर पर लिया है। विश्व में भारत पर टीबी का बोझ सबसे अधिक है। देश ने टीबी उन्मूलन को प्राथमिकता के तौर पर लिया गया है। इसका उद्देश्य टीबी के नए मामलों में 95 प्रतिशत की कमी करना और टीबी से मृत्यु में 95 प्रतिशत की कमी लाना है।

भारत में साल 2015 में टीबी (तपेदिक) से मरनेवालों की संख्या 4,80,000 थी, जो साल 2014 में इस रोग से हुई 2,20,000 मौतों से दोगुनी थी। इसका कारण है कि पहले की मौतों के जो अनुमान लगाए गए थे वे गलत थे। यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी की 2016 में जारी रिपोर्ट से सामने आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की 27 फीसदी टीबी के मामले भारत में हैं। देश में यह सबसे घातक संक्रामक रोग है। साल 2015 में देश में 28 लाख टीबी के नए मामले सामने आए, जबकि 2014 में नए मामलों की संख्या 22 लाख थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी के मामले भारत में पाए जाते हैं।

भारत में टीबी की दवा के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता रखनेवाले मरीजों की संख्या 2015 में 79,000 थी, जो 2014 के मुकाबले 11 फीसदी अधिक है। नए टीबी के मामलों में करीब 2.5 फीसदी मामले ऐसे आ रहे हैं, जिन्होंने टीबी की दवा के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर ली है और उन पर दवाइयों का कोई असर नहीं हो रहा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है, भारत में टीबी अनुमान की तुलना में कही अधिक बड़ी महामारी है। यह निगरानी और सर्वेक्षण के नए आंकड़ों से पता चला है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि भारत टीबी से निपटने को लेकर गंभीर नहीं है। अपनी ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2016 में उसने हमारे आंकड़ों पर भी सवाल उठाया है। उसके मुताबिक भारत ने वर्ष2000 से 2015 के बीच टीबी के जितने मामले बताए हैं, वास्तव में मरीज उससे कहीं ज्यादा रहे हैं। भारत के गलत आंकड़ों की वजह से इस रोग का विश्वस्तरीय आकलन ढंग से नहीं हो पाया। भारत ने 2014 में कुल मामलों का 56 प्रतिशत और 2015 में 59 प्रतिशत ही दर्ज कराया।

असल में ये वे आंकड़े हैं जो सरकारी अस्पतालों में दर्ज किए जाते हैं। इनमें निजी स्वास्थ्य केन्द्रों से मिले आंकड़े नाममात्र को ही होते हैं, जिसकी वजह से टीबी के मरीजों की असली संख्या का पता नहीं चल पाता। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग खुद स्वीकार करता है कि देश में टीबी के साठ प्रतिशत मरीज निजी अस्पतालों या डॉक्टरों से अपना इलाज कराते हैं जिनमें से महज 15 प्रतिशत की ही रिपोर्ट सरकार तक पहुंच पाती है। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2016 के मुताबिक टीबी की महामारी उससे कहीं ज्यादा बड़ी हो चुकी है जितनी दिखती है। दुनिया के छह देशों- भारत, इंडोनेशिया, चीन, नाइजीरिया, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में इसके साठ प्रतिशत नए मरीज दर्ज किए गए हैं। टीबी रोग से ग्रसित दस फीसद मरीज दवाइयां बीच में छोड़ देते हैं जिसकी वजह से बीमारी दोबारा जकड़ लेती है।

भारत में सन 1956 में पहली बार टीबी का सर्वेक्षण किया गया था, जिसके बाद अब परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण विभाग टीबी का दूसरा राष्ट्रीय सर्वेक्षण करने जा रहा है। इसके बाद भी देश में टीबी के सभी मरीजों का पता चल ही जाएगा यह कहना मुश्किल है। पिछले कुछ समय से टीबी के कई नए रूप सामने आ गए हैं। कई मानसिक बीमारियां टीबी का बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। इस बीमारी को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत है। सरकार परम्परागत तौर-तरीके से बाहर निकले। इससे निपटने के लिए निजी क्षेत्र के साथ मिलकर व्यापक योजना बनानी होगी।

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। शहरों में तो निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों की वजह से तस्वीर कुछ उजली नजर आती है। लेकिन सवाल यह है कि इन महंगे अस्पतालों में इलाज का खर्च उठाने में कितने लोग सक्षम हैं? छोटे कस्बों व गांवों में तो सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र बदहाली के शिकार हैं। वहां न तो ढंग के अस्पताल हैं और न ही दवाएं।

विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार को इस क्षेत्र में एक ठोस अभियान शुरू करना होगा और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस जानलेवा बीमारी पर काबू पाने की राह में पैसों की कमी आड़े नहीं आए। ऐसा नहीं हुआ तो इससे मरने वालों की तादाद लगातार तेजी से बढ़ेगी। लेकिन क्या सरकार इस पर ध्यान देगी? क्या विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से उसकी कुंभकर्णी नींद टूटेगी? इन और ऐसे कई अन्य सवालों के जवाब ही देश और दुनिया में टीबी पर अंकुश लगाने की लड़ाई की दशा-दिशा तय करेंगे।

अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने टीबी को मिटा फेंकने की जो प्रतिबद्धता दिखाई है उसे हाथों हाथ लिया जाना चाहिए। लेकिन जिस भयंकर रूप में यह बिमारी हमारे देश में फैली है क्या उसे देखना लाजिमी नहीं होगा? क्या यह संभव हो पाएगा कि टीबी सचमुच आने वाले नौ-दस सालों में जड़ से खत्म हो जाए। यदि हां तो इसको जड़ से खत्म करने का रोडमैप क्या होगा? अभी तो इसकी गंभीरता को देखते हुए यह लगता है कि यह बिमारी कम होने की बजाय और अधिक तेजी से बढ़ रही है।

रमेश सर्राफ धमोरा

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar