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जीवन के बहुरंगी पक्ष को उधृत करती काव्यकृति है- ‘जिन्दा रहेगी कविता’

सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ गोरख मस्ताना की एक पंक्ति है – चल तलाशें काव्य में / है नहीं कविता तो क्या है जिन्दगी ? कवि के अनुसार सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, आरोह-अवरोह, उत्थान-पतन, पतझड़-बसंत, धूप-छाँव यही तो पर्याय हैं काव्य के। समकालीन कविता के नवोदित हस्ताक्षर अविनाश कुमार पाण्डेय रचित -‘जिन्दा रहेगी कविता’ जीवन के बहुरंगी पक्ष को उकेरते हुयी पैतीस कविताओं का एक अनूठा संग्रह है। सहज किन्तु अर्थपूर्ण भावों से रचित कविताओं में कवि की दृष्टि मानवीय संवेदनाओं के नये चिंतन की तलास करती हुई लगती है। कवि का काव्य चिंतन, जीवन यात्रा की विसंगतियों और विचारों से आगे बढ़ते हुए सामाजिक संस्कारों के महत्व की ओर संकेत करते हुए प्रतीत होता है। कवि समाज में विरोधाभासी जीवनयापन पर व्यंग्य करते हुए लिखता है –
दो रोटी के लिए/ तड़प कर मरने वालों की /आत्मा की शांति के लिए/ कराया जाता ब्रह्मभोज (कविता -यहाँ शव पर फूल चढ़ाया जाता है।)

आज हमारा समाज सांप्रदायिक सद्भावना के अर्थों से विमुख होता जा रहा है। आपसी प्रेम और भाईचारा कपूर की तरह उड़ते जा रहे हैं। धर्म के नाम पर अधर्म और न्याय के नाम पर अन्याय यही रह गया है वाहक बनकर हमारा समाज। फिर कवि कह उठता है -हम इंसान ना रह के वोट हो गये / हम हिन्दू मुसलमान हो गये/ हम बैकवर्ड-फॉरवर्ड हो गये / हम दारु हो गये/ हम नोट हो गये (कविता- चुनाव)

भौतिकवादी युग में गरीब का जीना इतना मुश्किल हो गया है कि वह पैर ढकता है तो हाथ खुला और सिर ढकता है तो पैर खुले रह जाते हैं। कहाँ कहाँ वह परेशान नहीं है ?पर उसकी परेशानी को देखता कौन है। तब वह केवल यही सोचता है – जिन्दगी में बहुत कुछ है / रोने के लिए / बिजली का रोना/ मंहगाई की मार/ पानी पर रार या उम्मीदों की हार / यही तो ढोना है। (कविता- कविता )

आदमी तभी तक जीवित है जब तक संवेदना है वरना एक पत्थर और उसमें अंतर ही क्या? जब वह मानवता के छंदों को गढ़ता और पढ़ता है, उसका अंत:करण जागृत रहता है अन्यथा वह पाषाण प्रतिमा बन कर रह जाता है। कवि ने इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए लिखा है – भूल गये हैं हम / इंसानियत का धर्म /हमारे चेहरे पर नहीं दिखती अब थोड़ी भी शर्म /(कविता – कहाँ जिन्दा हैं हम?)

वैसे तो कविता की परिभाषा में हजारो छंद या गद्य खंड लिखे रचे जा चुके हैं किन्तु कवि अविनाश पाण्डेय की कविताओं के प्रति जो संवेदना है उससे लगता है कि वह कविता को ही ओढ़ना बिछौना बना कर जीता है। उसकी सांसों में है कविता, उसकी आँखों में है कविता, अत: कवि कह उठता है – मानवता के साथ / खड़ी है मेरी कविता / मानस की मान है कविता / गीता का ज्ञान है कविता / फ़जर की अजान है कविता / मंदिर की घंटियों की सुमधुर तान है कविता ( कविता- मेरी कविता)
कवि को आज का समय मजबूर व्यक्ति की पीड़ाओ का समय लगता है कोई भी उसकी लाचारी या वेदना को समझना नहीं चाहता। वैसे भी किसे फुर्सत है कि वह दूसरे की व्यथा को बांटे। इसी सन्दर्भ में कवि लिखता है –
मेरी जिन्दगी की / सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि / कोई मेरी मज़बूरी समझ नहीं पाता/(कविता -मज़बूरी)

बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ आज का लोकप्रिय नारा है। सच तो यह है कि बेटियाँ हमारे परिवार में संस्कार सिंचित करने वाली वह व्यक्ति है जो माँ, बहू या बहन के रूप में अपने किरदार को जी कर अंतत: मातृशक्ति बन जाती है। जिस घर में बेटी नहीं वहां सुसंस्कारो का सृजन ही नहीं हो सकता है। कवि अविनाश बड़ी संवेदना के साथ लिखता है – सचमुच/ बेटियाँ / केवल गुणों का खान नहीं होती / वे गुड की भी खान होती हैं / जो अपने बाप के जीवन में रसवन्ती बन कर रस घोलती रहती हैं। (कविता -बेटियाँ )

कवि अविनाश की अपनी कविताओं पर बड़ा नाज़ है उसे ज्ञात है कविता की शक्ति। अपनी ‘मेरी कविता’ शीर्षक रचना में कवि ने कविता का मानवीकरण ही कर दिया है और लिखते हैं – मानवता के साथ खड़ी है कविता / जुल्म के सामने अड़ी है कविता / राष्ट्रहित में लड़ी है कविता / यह मत समझ लेना कि यूँ खामोश पड़ी है मेरी कविता।

वस्तुतः अविनाश कुमार की पूरी कविताएँ सहज भावों के सरोवर में खिलते हुए कमल की भांति है जिसमें काव्य तत्व अपनी विशिष्ट पहचान के साथ उपस्थित है। बगहा (पश्चिम चंपारण ) जिसे वाल्मीकि की धरती कहा जाता है वहां के इस युवा कवि की रचनाधर्मिता उसके साहित्य सेवा की परिणति लगती है मुझे पूर्ण विश्वास है कि पाठक वर्ग उनकी रचनाओं को अपना आशीष और स्नेह प्रदान करेगा।

समीक्षक – संतोष कुमार

समीक्षक – संतोष कुमार
समीक्ष्य पुस्तक – जिन्दा रहेगी के कविता
प्रकाशक- सांस्कृतिक विद्यापीठ, बेगुसराय, बिहार
प्रकाशन वर्ष –2017
मूल्य –250(सजिल्द)

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