ब्रेकिंग न्यूज़

हर्षिका गंगवार की 2 कविताएं…

1.प्रेम मुझमें शेष है…

प्रेम खूंटी पर टंगा है,
किसी माला में पिरोया हुआ
जिसके फूल बेजान हो चुके हैं।
प्रेम मेरी डायरी में सूख गया है,
उस फूल के साथ
जिसका वज़ूद मुझे तकलीफ़ देता है।
प्रेम चिठ्ठियों से मिट गया है,
और तुम्हारी ही तरह
स्याही ने भी कागज से अलग होने का
जैसे फरमान जारी कर दिया है।
प्रेम शायद मेरी छत पर छूट गया है,
जहाँ मैं और तुम साथ में
घंटों तारों के बीच
अक्षर बोध किया करते थे।
प्रेम का टुकड़ा
कोई कौआ रोटी समझ कर
मुझसे छीन ले गया है,
या शायद
मैंनें ही डर से
उसके हवाले कर दिया है।
प्रेम मेरे हृदय के गूगल ड्राइव से
डिलीट हो गया है,
पता नहीं…
शायद,
मैं नहीं जानती कि
प्रेम मुझमें शेष है
या प्रेम में मैं!

(2)निद्रा से प्रणय की चाह

सिर्फ मुझे नींद नहीं आती
या फिर…
दुनिया में जो मेरे हमउम्र हैं
वे भी रात को दिन और
दिन को रात समझते हैं।
यूं तो हर करवट के साथ
एक टिस,
उठते ही दब जाती है।
किंतु तुम्हारी सुधि,
हृदय से उठकर
आँखों के भीतर
पुतली के साथ
रातभर यात्रा करती है…
कभी-कभी तो नींद
सूरज की किरणों के साथ
दोनों हाथ फैलाकर
पलकों पर अगड़ाई लेती है।
इसलिए मैं रोपना चाहती हूँ
एक निद्रा के वृक्ष को
चाँदनी की छाँव में
प्रेम की बाहों में
और उन तारों के मध्य
जो इसकी परवरिश करेगें।
मैं प्रणय करना चाहती हूँ
स्वयं अपनी निद्रा से,जो
मेरे कंठ से हृदय तक
साँस से धड़कन तक
देह से रूह तक
प्रेम साधना में लिप्त होकर
मेरे नेत्र खुलने से पहले
मुझे अपने आगोश़ में भरकर
निद्रा के तमस तक ले जायें।

…………………………………..

हर्षिका गंगवार, बीएचयू,वाराणसी

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar