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फांसी हो सेना की जासूसी करने वालों को

एक तरफ शत्रु का भारत पर अमरीकी मिसाईल से आक्रमण हो रहा हो और दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना का एक ग्रुप कैप्टन रैंक का अधिकारी, जासूसी करते हुए पकड़ा जाए, तो आप क्या कहेंगे। यह तो सच में गंभीर ही नहीं भयानक स्थिति है। विगत दिनों पाकिस्तान ने भारत पर सीजफायर का बेशर्मी सेउल्लंघन करते हुए एक मिसाइल दागा जो उसे अमेरिका ने तो अफगानिस्तान में अल-कायदा के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने को दिया था जिसे अब पाकिस्तान हमारे सीमावर्ती गावों को ध्वस्त करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इस मिसाईल से भारतीय सेना के कई योद्धा भी वीर गति को प्राप्त हुए। अनेकों निर्दोष ग्रामीणों को भी हताहत कर दिया । हमने भी पाकिस्तान को करारा जवाब तो दिया। उसे भारी क्षति भी पहुंचाई। लेकिन, प्रतिक्रियात्मक कारवाई तो सीमित ही होती है । घुसकर मारना जैसा कि सर्जिकल स्ट्राइक में हुआ, हमेशा वेहतर होता है । क्योंकि अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत तो सर्वविदित है ही कि, “आफेन्सइजदिबेस्टडिफेंस।’’ (यदिआपआक्रामकहोंगें, तभीआपकीसुरक्षासुनिश्चितहोगी ।)

दरअसल जासूसी करने वाले ग्रुप कैप्टन पर कुछ अति महत्वपूर्ण दस्तावेज पाकिस्तान को सौंपने का आरोप है। ये दस्तावेज भारत के सैन्य ठिकानों से संबंधित बताए जाते हैं। बेशर्म गिरफ्तार अधिकारी वायुसेना मुख्यालय में ही तैनात है। बताया गया कि वायुसेना की काउंटर इंटेलीजेंस विंग ने उनसे करीब 10 दिनों तक गंभीर पूछताछ करने के बाद विशेष प्रकोष्ठ के उत्तरी संभाग को सौंपा गया । Off।c।al Secret Act (ओएसए) के तहत मामला दर्ज किया गया । अदालत ने गिरफ्तार अधिकारी को पूछताछ के लिए पांच दिन के पुलिस हिरासत में भेज दिया गया । वायु सेना अधिकारी को आईएसआई ने दो फेसबुक अकाउंट के जरिये हनी ट्रैप के जाल में फंसाया गया। ग्रुप कैप्टन की गतिविधिया संदिग्ध पाये जाने के बाद 31 जनवरी को उन्हें वायुसेना ने हिरासत में लिया था । इस सारे षडयंत्र में कुछ और लोग भी शामिल हो सकते हैं।

दस्तावेजों की श्रेणियां

एक बात जान ही लीजिए कि सेना के तीनों अँगों में प्रत्येक संवेदनशील दस्तावेज को सुरक्षा की दृष्टि से अलग अलग श्रेणियों में रखा जाता है। इसमें गोपनीय, रहस्य, गुप्त और अति गुप्त की श्रेणियां हैं। इन्हें x के निशान से पहचाना जाता है यानि एक x यदि गोपनीय है तो xxxx अति गोपनीय होगा। सेनाओं में सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए एक सख्त नकारात्मक नीति है। सेना के अधिकारियों को सोशल मीडिया के इस्तेमाल की सीमित इजाजत तो है, परंतु; वे सेना की वर्दी में अपनी फोटो पोस्ट नहीं कर सकते। साथ ही वे कहां तैनात हैं इस संबंध में भी जानकारी साझा नहीं कर सकते। इसके अलावा कोई भी अधिकारिक जानकारी, प्लान और यहां तक की कार्यालय के बुनियादी ढांचे के संबंध में भी कोई जानकारी नहीं दे सकते। इतने कठोर नियमों होने पर भी वायु सेना का यह लालची अफसर दुश्मन के जाल में फंस गया।

गद्दारी देश से

लेकिन यह तो पहला केस नहीं है जबकि सेना के किसी अंग का कोई आला अफसर देश की सुरक्षा से संबंधित जानकारी दुश्मन मुल्क को दे रहा हो। ये कोई तीस-पैंतीस साल पुरानी बात है जब मेजर जनरल फ्रेंक लारकिंस, उनके भाई एयर मार्शल कैनिथ लारकिंस और लेफ्टिनेंट कर्नल जसबीर सिंह को देश के बेहद संवेदनशील रक्षा दस्तावेजों की सप्लाई करते हुए पकड़ा गया था। उस केस को लारकिंस जासूसी कांड का नाम दिया गया था। इन तीनों पर लगे आरोप साबित हुए थे। इन अफसऱों को डूब के मर जाना चाहिए था, देश के साथ गद्दारी करने के लिए। लेकिन, इनकी आत्मा तो मर चुकी थी। इसीलिए ये जेल में सड़ते ऱहे थे। लेकिन, सजा की अवधि खत्म होने के बाद ये भी अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगे। कहते ही है कि एक मछली तो सारे तालाब को ही गंदा कर देती है। वैसे तो भारतीय सेना के तीनों अँगों से जुड़े अधिकारियों और फौजियों में राष्ट्र भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी होती है। ये भारत की सरहदों की रक्षा के लिए अपने प्राणों के बलि देने से कभी पीछे नहीं हटते। इनके शौर्य़ को सारी दुनिया ने विभिन्न युद्धों के दौरान देखा है। पर ये भी सच है कि कुछ सैनिक धन या किसी कारण के चलते शत्रु के जाल में फंसकर देश के साथ धोखा करने लगते हैं।

अक्षम्य अपराध

सेना की जासूसी करना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आताहै। इस अपराध में लिप्त व्यक्ति के साथ नरम व्यहहार तो करने की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। उसे कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिए। इन जयचंदों को देश स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसे मामलों को राष्ट्रद्रोह नहीं मानेंगें तो किसे मानेंगे । जिस देश का अन्न खा रहे हैं, जिस सरकार के वेतनभोगी हैं, उसी की पीठ में छुरा भोंक रहे हैं ।

भारत की रक्षा तैयारियों की ताजा स्थिति को प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान की दुर्दांत खुफिया एजेंसी आईएसआई हमेशा ही सक्रिय रहती है। उसका सारा इतिहास ही भारत में गड़बड़ और अस्थिरता फैलाने के उदाहरणों से अटा पड़ा है। पाकिस्तान को मालूम है कि वह कभी भी सीधे युद्ध में भारत के सामने टिक नहीं सकता। सीधे युद्ध में उसकी पराजय पहले भी होती रही है और भविष्य में भी होनी ही है। इसलिए वह आईएसआई के माध्यम से भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़े हुए है। ‘’खालिस्तान’’ के विफल से लेकर कश्मीर तक में दंगा-फसाद कराने में देश विरोधी ताकतों को आईएसआई ने लगातार खाद-पानी दिया है। आईएसआई का वर्तमान में मुख्यालय पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ही है। आईएसआई को भारत विरोधी एजेंसी के रूप में खड़े करने में पूर्व सैनिक तानाशाह जिया उल हक की विशेष भूमिका रही थी। उन्होंने अपने खासमखास सेना के अफसरों को व्यक्तिगत रूप से चुनकर इसमें नई जान फूंकने की जिम्मेदारी सौंपी थी। मुंबई में साल 2008 में हुए खूनी आतंकवादी हमले और काबुल में भारतीय दूतावास को निशाना बनाकर किए गए विस्फोट के पीछे आईएसआई का ही हाथ था। ये आईएसआई ही भारत में अपने लिए जासूस तलाश करती है और उन्हें प्रलोभन देकर उनसे सेना की अति महत्पपूर्ण जानकारियां निकलावती है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में सांबा जासूसी केस जैसा शर्मनाक मामला अभी तक सामने नहीं आया है। सन 1980 मेंनियंत्रण रेखा के पास तैनात सेना की 168 ब्रिगेड के लगभग 50 जवानों को पकड़ा गया था। उन सभी पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप था। बहरहाल, अब उस बेहद शर्मनाक मामले की यहां पर विस्तार से चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन, यह बता दें कि उस जासूसी कांड से जुड़े सभी लोगों को कठोर सजा हुई थी। लेकिन, ये तो देखने वाली बात है कि आखिर भारतीय सेना के भीतर जासूस कैसे प्रवेश करने लगते हैं? क्यों देशभक्ति पर भारी पड़ जाता है चंद सिक्कों का मोह? इन सवालों के तो जवाब तलाश करने ही होंगे। अगर इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे गए तो ये देशद्रोही सेना को अंदर से दीमक की तरह चाटते ही रहेगें। यह स्थिति देश के लिए किसी भी हालत में बर्दास्त नहीं किया जा सकता है।

यह याद रखना होगा कि भारत के को कमजोर करने में लगे हैं, चीन और पाकिस्तान। पिछले साल भारत को चीन से डोकलम में लगभग तीन माह तक जूझना पड़ा था। युद्ध के जैसे हालात बन चुके थे। भारतीय सेना भी चीन के दांत खट्टे करने के लिए तैयार खड़ी थी। अब पाकिस्तानी सीमा की एलओसी पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।पाकिस्तान भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। वह शायद 1948,1965,1971 और कारगिल की हार को भूल गया है। वह एक बार फिर से धूल में मिलने को बेकरार हो रहा है। उसका कुछ हदतक तो काम आसान हमारे जासूस ही कर देते हैं। इन पर सख्ती से लगाम लगानी होगी। मेरा मत है कि भारत की रक्षा संबंधी तैयारियों से संबंधित दस्तावेज बेचने वाले जयचंदों को मौत की सजा हो। इनके केस पर कोर्ट तुरंत और लगातार सुनवाई करके फैसला ले। ये केस किसी भी हालत में लटकने नहीं चाहिए। अगर किसी पर आरोप सिद्ध होता है तो उसकी सजा सिर्फ फांसी ही होनी चाहिए। देश को बेचने वालों को इससे कम की क्या सजा भला क्या मिलनी चाहिए ।

आर.के.सिन्हा, लेखक राज्य सभा सदस्य हैं

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