ब्रेकिंग न्यूज़

बातचीत : विदाई के करीब है केद्र की गूंगी-बहरी सरकार

12 से 19 फरवरी के बीच किसान नेता पूरे देश में विभिन्न जगहों पर विरोध स्वरूप बजट की प्रतियां जलाकर अपनी नाराजगी सरकार के प्रति दर्ज कराएंगे। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने जेटली द्वारा पेश किए बजट को चुनावी बजट बताते हुए इसे झूठ का पुलंदा बताया है। उनकी मांगे थी कि बजट में किसानों को उनकी लागत का करीब दो गुना दाम दिया जाए, लेकिन किसान नेताओं का आरोप है कि बजट में ऐसा न करके सिर्फ खानापूर्ति की गई। पिछले सप्ताह दिल्ली में दर्जन भर बड़े किसान नेताओं ने एक मंच पर आकर सरकार के खिलाफ विरोध की नई रणनीति तय की, जिसमें नर्मदा आंदोलन की संस्थापक के रूप में पहचानी जाने वाली सामाजिक व समाज सुधारक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी भाग लिया। तभी रमेश ठाकुर ने मेधा पाटकर से उनकी रणनीति को लेकर विस्तृत बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्यअंश।

रमेश ठाकुर: अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने पिछले साल जो पूरे देश में आंदोलन किया था उस दौरान उनकी मांगों पर सरकार ने विचार किया है और मौजूदा बजट में उन मांगों को शामिल भी किया है। फिर विरोध क्यों?
मेधा पाटकर : हमारा विरोध ही इस बात का है कि मांगों को मानने के बाद भी सरकार पलट गई है। पिछले साल 20 नवंबर को जब पूरे देश के लाखों किसान दिल्ली में एकत्र होकर केंद्र सरकार को ललकार था तो उन्होंने दबाव में आकर हमारी सभी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया। लेकिन वह उनकी चाल थी आंदोलन को खत्म करने की। हम तो बजट का इंतजार कर रहे थे लेकिन जब बजट आया तो उसमें सरकार ने झूठ का पुलंदा मात्र पेश किया। मोदी सरकार किसानों के प्रति जरा भी वफादार नहीं हैं। उनको सिर्फ अंबानी-अड़ानी आदि उघोगपतियों की चिंता है। इस वक्त किसान सबसे बूरे दौर से गुजर रहा है। खेती किसानी में लगने वाली पूंजी की लागत भी अन्नदाताओं को नहीं मिल पा रही है। हाड़तोड मेहनत करने के बाद भी किसानों को आलू-टमाटर सड़कों पर फेंकना पड़ रहा है। इसी कारण किसान लगातार आत्महत्याएं करते जा रहे हैं।

रमेश ठाकुर: लेकिन समर्थन मूल्य के डेढ़ गुना लागत पर उचित दाम देने की बात कही तो है इस बजट में?
मेधा पाटकर : किसान संगठन किसानी का समर्थन मूल्य दोगुना करने को लेकर काफी समय से मांग कर रहे हैं। आपको पता होना चाहिए कि पिछले साल 6 जून 2017 को मंदसौर में पुलिस फायरिंग के बाद देश के 190 किसान संगठनों ने 19 राज्यों में 10 हजार किलोमीटर की किसान मुक्ति यात्रा, 500 से अधिक जनसभाएं आयोजित की थी। उस वक्त देश भर में बढ़े उस आंदोनन के दबाव में सरकार को मजबूरी में लागत से डेढ़ गुना दाम देने की बात आम बजट में जोड़नी पड़ी। लेकिन वित मंत्री द्वारा कहा गया कि रवि की फसल में लागत से डेढ़ गुना दिया जा रहा है तथा खरीफ में लागत से डेढ़ गुना दाम समर्थन मूल्य दिया जाएगा। यह एक सफेद झूठ है। सरकार ने षड्यंत्र पूर्वक ढंग से लागत की परिभाषा को बदल कर उसे कम कर दिया है और जो समर्थन मूल्य पहले से घोषित किया था उसी को डेढ़ गुना बता दिया है और उसी को स्वामीनाथन सिफारिशों का नाम दे दिया है। इसका साफ अर्थ यह है कि सरकार की घोषणा से खरीफ की फसल में भी किसानों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।

रमेश ठाकुर: आप लोगों ने सरकार से किसानी में हुए नुकसान की भरपाई के लिए धन आवंटन की भी मांग की थी, जिसपर सरकार ने धन आवंटन भी किया है?
मेधा पाटकर : समर्थन मूल्य के नीचे खरीद होने के चलते केवल खरीफ में ही 32000 करोड़ रूपए का नुकसान किसानों को हुआ है जिसमें सरकार ने मौजूदा बजट में महज 200 करोड़ रूपए आवंटन करने की बात कही है। इतनी राशि तो एक जिले के लिए भी प्रयाप्त नहीं है। सरकार की यह हरकत दर्शाती है कि वह किसानों के साथ कितना भद्दा मजाक कर रही है। सरकार की मंशा तो हम फरवरी 2015 में ही समझ गए थे जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर किसानों से किए वायदे को पूरा न करने को लेकर साफ इंकार कर दिया था। देखिए, खेती के संकट का एक बड़ा कारण लागत का महंगा दाम रहा है। किसानों को उम्मीद थी कि पेट्रोल, डीजल, बीज, खाद, आदि के दाम घटाए जाएंगे। पर सरकार ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की और महंगी लागत एक बड़ी समस्या है। इसमें लागत के आंकलन की राज्य सरकारों द्वारा जो अनुशंसाएं सीएसीपी को भेजी जाती रही है, उसे 30 से 50 प्रतिशत तक घटा दिया जाता रहा है तथा सीएसीपी की अनुशंसाओं में भी कैबिनेट कटौती कर देती है। जाहिर है कि सरकार केवल वाहवाही लूटने के लिए घोषणा कर रही है, वास्तव में वह किसानों और देश के आम नागरिकों की आंखों में धूल झोंक रही है।

रमेश ठाकुर: सरकार को घेरने की अगली रणनीति क्या तय की है ?
मेधा पाटकर : फिर सड़कों पर उतरेंगे। तकरीबन सभी 190 किसान संगठन एक साथ अपनी आवाज बुलंद करेंगे। 12 फरवरी से 19 फरवरी के बीच सभी प्रांतों में हमारे नेता बजट की कॉपियां जलाएंगे। देखिए, सरकार को हम उनकी जिम्मेदारियांे से भागने नहीं देंगे। किसानों का हक उनसे लेकर ही रहेंगे। प्रधानमंत्री मोदी को उनके बोले वाययों को याद दिलवाएंगे। 2014 के आम चुनाव में करीब 90 रैलियों में उन्होंने किसानों से उनकी समस्याओं से छुटकारा दिलवाने के लिए वादा किया था। उनकी जीत में किसानों की सबसे बड़ी भूमिका रही थी। लेकिन समय के साथ वह भूल गए। मैं आपको बता दूं ये जो मौजूदा बजट है वह पूरी तरह से चुनावी बजट है। क्योंकि सरकार समय से पहले चुनाव कराना चाहती है। आगे के रास्ते उनके लिए बहुत कठिन हो होने वाले हैं इसलिए अटल सरकार की तरह मोदी भी समय से पहले चुनाव चाहते हैं। लेकिन उससे पहले ही हम उनकी जनता में पोल-पट्टी खोल देंगे।

रमेश ठाकुर

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar