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पैट्रोल और डीजल की कीमतों से जनता बेहाल, सरकार और तेल कम्पनियां मालामाल

भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद पैट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कमी के बावजूद आम ग्राहकों को तो इसका फायदा नहीं मिला लेकिन सरकार और तेल कम्पनियां खूब मालामाल हो रही हैं। मंहगाई नित नए प्रतिमान गढ़ रही है और पैट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं लेकिन केन्द्र, राज्य सरकारें और तेल कम्पनियां अपना खजाना भरने में जुटी हैं. पिछले चार वर्षों में मोदी सरकार द्वारा करीब नौ बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने से पैट्रोल और डीजल वास्तविक कीमत से दुगना रेट से ज्यादा में बेचा जा रहा है। दिल्ली में 7 फरवरी को पेट्रोल की 73.38 रुपये की प्रति लीटर की रिटेल कीमत में 35.50 रुपये सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, रोड़ एण्ड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस और राज्य सरकार के टैक्स के हैं। मोदी सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार ने पैट्रोल पर 11.77 रूपए और डीजल पर 13.47 रूपए की बढ़ोतरी की है। बजट के दिन पैट्रोल और डीजल पर करीब 8 रूपए प्रति लीटर का अतिरिक्त रोड़ एवं इंफ्रास्ट्रक्चर टैक्स बढ़ा दिया गया है। हालांकि उस दिन टीवी समाचार चैनलों द्वारा सेंट्रल एक्साइज टैक्स में 2 रूपए प्रति लीटर की कटौती की खबर चलाई थी लेकिन उसी दिन शाम को वित्त सचिव अधिया ने स्पष्टीकरण देते हुए बताया था कि एक्साइज में 2 रूपए की कटौती के साथ ही अतिरिक्त 6 रूपए की एक्साइज टैक्स में कटौती इसलिए की गई है ताकि पैट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर करीब 8 रूपए की रोड़ एण्ड इंफ्रास्ट्रक्चर टैक्स बढ़ोतरी को समाहित किया जा सके ताकि ग्राहकों पर इसका सीधा असर न पड़े और फिर पैट्रोल और डीजल के दाम धीरे-धीरे बढ़ाकर पूर्ति की जाए।
2013 के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बहुत कम हैं लेकिन भारत में पेट्रोल-डीजल 2013 के भाव बिक रहा है। सितंबर 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमत 109.45 डॉलर प्रति बैरल थी। तब पेट्रोल के दाम दिल्ली में 76.06 पैसे प्रति लीटर, कोलकाता में 83.63 पैसे प्रति लीटर, मुंबई में 83.62 पैसे हो गए थे और भारतीय जनता पार्टी ने देशभर में धरना-प्रदर्शन करके खूब पुतले फूंके थे और कई बार लोकसभा तथा राज्यसभा की कार्यवाही बाधित की थी। पैट्रोल और डीजल मंहगे दामों पर बेचने और बजट में मध्यम वर्ग को कोई राहत न मिलने से आम जनता में मोदी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है। बजट की प्रतिक्रिया शेयर बाजार में अभी भी दिखाई दे रही है जिसमें शेयर कारोबार करने वालों के लाखों करोड़ रोज डूब रहे हैं और बजट के दिन घोषित राजस्थान के चुनाव परिणामों ने सरकार को आइना दिखाकर यह कहावत चरितार्थ की है कि “थोथा चना बाजे घना”। आम जनता विपक्षी पार्टियों के रवैये से भी नाराज है क्योंकि पूरा विपक्ष इसे मुद्दा बनाने में विफल रहा है।
भारत में पड़ोसी देशों के मुकाबले पेट्रोल और डीजल के दाम सबसे अधिक हैं और इसलिए हैं क्योंकि मोदी सरकार मानती है कि भारत अपने सभी पड़ोसी देशों से अधिक विकसित है इसलिए सरकार को अधिक वसूली का अधिकार है। विपक्ष को चारों खाने चित करने और जनता के रोष से बचने के लिए मोदी सरकार ने पिछले कुछ दिनों से प्रतिदिन पेट्रोल और डीजल के रेट तय करने शुरू किये हैं और इसी दौरान पेट्रोल और डीजल के भाव 15 रूपए प्रति लीटर तक बढ़ गये और किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई। अब जब आम आम जनता पर इसका असर दिखना शुरू हुआ है तब तक तो लाखों करोड़ रूपए से वारे न्यारे हो चुके हैं। सरकार का दावा है कि पेट्रोल-डीजल के दाम पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है और यह सही है लेकिन पैट्रो उत्पादों पर टैक्स के नाम पर जो वसूली हो रही है, वह केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के नियंत्रण में है और तेल की घटी कीमतों का लाभ उपभोक्ताओं को न देकर सरकार उनसे छल कर रही है।
कि “पेट्रोल ख़रीदने वाले भूखे नहीं मर रहे हैं। हम उन्हीं लोगों पर कर लगा रहे हैं जो कर अदा कर सकते हैं। जिनके पास कार है, बाइक है, निश्चित रूप से वह भूखे नहीं मर रहे हैं। जो चुका सकता है उसे चुकाना चाहिए।” ऐसे मंत्रियों को जमीनी जानकारी नहीं है। किसान से लेकर सफाई कर्मचारी तक के पास आज मोटरसाइकिल है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अमीर हो गये हैं। अपने घरों से 20 से 40 किलोमीटर दूर जाकर अपनी रोजी रोटी कमी रहे हैं लेकिन सरकार को वे चुभने लगे हैं। मोदी सरकार रोजगार के मोर्चे पर पूरी तरह विफल रही है और अब मेहनत मजदूरी से रोजी रोटी कमा रहे निम्न एवं मध्यम वर्ग पर सीधे चोट कर रही है। एक्साइज ड्यूटी के नाम पर हजारों करोड़ों के मोदी सरकार वारे न्यारे कर चुकी है लेकिन वह पेट्रोल और डीजल उत्पादों पर टैक्स बढ़ाकर कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर निम्न एवं मध्यम वर्ग से ही वसूली कर रही है।।
सरकार की तर्ज पर ही तेल कम्पनियां भी खूब आम जनता की कीमत पर खूब धन बटोर रही हैं । तेल कम्पनियां दोनों हाथों से आम जनता की गाढ़ी कमाई लूट रही हैं और सरकार ने इन्हें ऐसा करने की छूट दे रखी है। आम जनता मंहगाई से त्रस्त है और पैट्रोल और डीजल के रेट आसमान पर हैं लेकिन सरकार और सरकारी कम्पनियां अपना मुनाफा बढ़ाने में लगी हैं।
सबसे बड़ी सरकारी तेल कम्पनी इंडियन ऑयल (आईओसी) ने गत मंगलवार को जारी अपनी तीसरी तिमाही (अक्तूबर-दिसम्बर 2017) रिपोर्ट में बताया है कि कम्पनी ने दोगुना मुनाफा कमाया है। 2016 की दिसम्बर तिमाही में शुद्ध लाभ 3994.91 करोड़ रुपए था जो अब 97 प्रातिशत बढ़कर 7883.22 करोड़ रुपए हो गया है। इस बड़े मुनाफे की वजह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम कीमतें हैं। कम्पनियों ने तेल सस्ते में खरीदा और जनता को मंहगा दामों पर बेचा और ऊपर से रही-सही कसर सरकार ने पूरी कर दी। सरकारी तेल कम्पनियों का वास्तविक नियंत्रण सरकार के पास है इसलिए यह सारा खेल मिलीभगत से चल रहा है लेकिन जनता कराह भी नहीं पा रही है। काम-धंधे ठप्प हैं और रोजगार के नाम पर केवल पकौड़े बिक रहे हैं । आम जनता को दो जून की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में सरकार केवल आंकड़ों की बाजीगरी से ही जनता को भरमाने का प्रयास कर रही है ।
इंडियन ऑयल कुल पैट्रो पदार्थों का 27.58 प्रातिशत प्राोसेसिंग करती है, जबकि रिलायंस 28.41 प्रातिशत, भारत पेट्रोलियम 14.69 प्रातिशत, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम 10.40 प्रातिशत प्रोसेसिंग करती है। कम्पनियां जनता की जेब काट कर अपना मुनाफा बढ़ा रही हैं और यह सब सरकार के दबाव में हो रहा है क्योंकि इन कम्पनियों पर सरकार को भारी लाभांश देने का दबाव है ताकि चुनावी वर्ष में अधूरी योजनाओं की गति बढ़ाई जा सके। आईओसी का मुनाफा 97 प्रातिशत बढ़ गया है लेकिन रेवेन्यू में केवल 13 प्रातिशत इजाफा हुआ है। पहले यह 1.15 लाख करोड़ था जो अब 1.30 लाख करोड़ हो गया है। पिछले साल की तिमाही की तुलना में घरेलू बाजार में बिक्री केवल 4.1 प्रातिशत बढ़ी है और रिफाइनरी प्राोसेसिंग केवल 11.4 प्रातिशत बढ़ा है। इसलिए न तो पैट्रो पदार्थों की प्रोसेसिंग में कोई खास इजाफा हुआ है और न ही बिक्री में खास वृद्धि हुई है लेकिन मुनाफा दुगना हो गया है। इसलिए सारा मुनाफा केवल मंहगा तेल बेचकर ही हुआ है और दूसरी तरफ केन्द्र और राज्य सरकारें भी पैट्रोल और डीजल से भारी कमाई कर रही है इसीलिए इन्हें जीएसटी में लाने का सरकार का कोई इरादा नहीं है। सरकार चुनावों में यह दुहाई दे सकती है कि यदि भाजपा की पुन: सरकार बनी तो वह पैट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाएगी जबकि वह ऐसा अभी कर सकती है। पैट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से हर कोई परेशान है चाहे वह मजदूर हो, किसान हो, कर्मचारी हो या व्यापारी लेकिन सरकार को इनकी कोई चिंता नहीं है। सरकार को बढ़ती मंहगाई पर नियंत्रण के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नियंत्रण के लिए उसे जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए वरना जनता लुटती रहेगी।

विजय शर्मा

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