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बैंक, आम आदमी और नीरव मोदी

एक आम आदमी भारतीय बैंकों के अनगिनत नखरे झेलता है। आम आदमी जब बैंक में खाता खोलने की सोचता है तो उसके सामने कई सारी परेशानियां मुंह बाये खड़ी हो जाती है। ‘नो योर कस्टमर’ के नाम पर तमाम तरह के कागजात जमा देने के साथ ही खुद की पहचान के लिए उन्हें उसी ब्रांच के किसी खाताधारक की विनती भी करनी पड़ती है। तब जाकर कहीं बैंक अकाउंट खुल पाता है। कागजात में जरा सी भूल चूक हुई कि नहीं कि खाता खुलना नामुमकिन। और खाता खुलने के बाद गरीबों की गाढ़ी कमाई मिनिमम बैलेंस के नाम पर बैंक जब तब लूट कर अपना एनपीए कम करने की कोशिश करती है जिसकी कोई फरियाद सुनने वाला नहीं होता। लेकिन जब बात कर्ज की आती है तो बैंक सबसे पहले आपके रोजगार की जानकारी लेती है। फिर उस क्षेत्र में कार्य करने वाले तमाम बैंकों से ‘नो ड्यूज’ प्रमाण पत्र लाने को कहा जाता है। फिर कर्ज लेने के इच्छुक व्यक्ति को दो गारंटर भी खोजना पड़ता है जो कर्ज न चुकाये जाने की स्थिति में कर्ज चुकाने का झूठा वादा बैंक से कर सके। इसके बाद माॅर्गेज भी रखने की बात आती है। लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद यदि बैंक के दलाल आपके साथ नहीं है तो बैंक किसिम-किसिम के बहाने बना कर आपको कर्ज देने से मना कर देता है। और अंततः दलाल और पर्सेन्टेज तय होने पर ही आपको बैंक से कर्ज मिलना संभव हो पाता है। सामान्यतः हमारे देश के बैंक और आम आदमी के बीच के इस प्रकार के संबंध से हम सभी वाकिफ हैं। हम सभी ये भी जानते हैं कि किस प्रकार बैंक अपने बाउंसरों या तगादाकर्ताओं के द्वारा बारंबार छोटे मोटे कर्जदारों के सीने पर चढ़े रहते हैं।
जिस देश में मिनिमम बैलेंस के नाम पर रोजाना गरीब खाताधारकों के खाते पर बैंक द्वारा एक तरह से डाका डाला जाता है उस देश में नीरव मोदी सरीखा रईसजादा करोड़ों रूपये डकार कर विदेश चला जाता है। देश विदेश में मशहूर हीरा कारोबारी नीरव मोदी पर अपने फर्म के लेटर ऑफ अंडरटेकिंग यानि साख पत्र को बार-बार जारी कर के पंजाब नेशनल बैंक को 11 हजार 400 करोड़ रुपए का चूना लगाने का आरोप लगा है। नीरव मोदी और उनसे जुड़ी गीतांजलि जेम्स सरीखी कुछ आभूषण बनाने वाली कंपनियां इस मामले में आरोपी हैं। बीते वर्ष फोब्र्स की सूची में 84वें सबसे धनी इस भारतीय कारोबारी ने बैंक अधिकारियों की मिलीभगत कर साल 2017 में विदेशों से सामान मंगाने के नाम पर बैंकिंग सिस्टम में जानकारी डाले बिना आठ एलओयू जारी करवा दिया गया, जिससे बैंक को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ जिसके बलबूते इस पूरे फ्रॉड को अंजाम दिया गया है।
तो सवाल बहुतेरे हैं। मसलन जब एक आदमी को 50-60 हजार रूपये के मामूली कर्ज भी बैंक से मयस्सर नहीं होता वैसे में नीरव मोदी जैसे शातिर इतनी बड़ी राशि कर्ज के रूप लेकर में कैसे डकार जाते हैं ? जब देश में कुछेक हजार रूपये के कर्ज न चुकाने की वजह से लाखों किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने उठाने को विवश हो जाते हैं तो नीरव जैसे लोगों से कर्ज वसूलने में बैंक अधिकारियों के हाथ पाँव क्यों फूलने लगते हैं ? सवाल यह भी भारत में ही लगभग 36 हजार करोड़ की परिसंपत्ति से ज्यादा की हैसियत रखने वाले नीरव के इस फ्रॉड की आखिर वास्तविक वजह क्या है ? क्या इसका यह मायने लगाया जाय कि देश में अमीरों व गरीबों के लिए बैंक नीति अलग-अलग है ? हालांकि यह तो तय है कि बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के इतनी बड़े धोखाधड़ी को अंजाम नहीं दिया जा सकता है।
लेकिन सवाल यह नहीं कि नीरव मोदी किस राजनीतिक पार्टी के करीब थे- कांग्रेस के या भाजपा के या किसी और पार्टी के। सवाल इस पर भी नहीं है कि नीरव के विदेश भाग जाने तक समूची व्यवस्था को असहाय व पंगु किसने बनाया। सवाल यह नहीं कि क्या विजय माल्या की तरह नीरव मोदी को भी भारत लाना संभव नहीं हो पायेगा। सवाल यह भी नहीं कि मिनिमम बैलेंस के नाम पर आम खाताधारकों से धोखाधड़ी करने वाले बैंक खुद को धोखाधड़ी से बचाने में इतनी असहज क्यों दिखती है। असली सवाल तो यह है कि क्या बैंकर्स आदमी को आम व खास के नजरिये से देखने व समझने के आदी हो चुके हैं? बैंकों से नीरव को दिये गये कर्ज के बारे में बोलते हुए मीरा सान्याल ने पते की बात कही कि पीएनबी फ्रॉड के मामले में यूपीए और एनडीए में से कोई दूध का धुला नहीं है। यानि कांगे्रस व भाजपा बराबर की दोषी है। स्थिति यह है कि देश का बैंकों के डूबे हुए कर्ज यानि नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स की राशि 8.5 लाख करोड़ रूपये को पार कर चुकी है। और ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे इन डूबे हुए कर्जाें को वसूलने का कोई रास्ता निकल सके। हद यह है कि रिजर्व बैंक को भी यह पता नहीं कि कि बैंकों से कर्ज लेकर वापस न करने वाले कौन हैं, वे व्यक्ति हैं या संस्थाएं। बैंक भी डूबे हुए पैसों का संयुक्त आंकड़ा ही पेश करते हैं। वास्तव में देखा जाय तो नीरव, ललित या माल्या का मामला असली समस्या नहीं है, बल्कि समस्या की झलक भर है। सवाल यह कि सामान्य नागरिक को लोन देने में तमाम तरह की कानूनबाजी दिखाने वाले बैंक उद्योगपतियों के मामले में उदार कैसे और क्यों हो जाते हैं ? देखा जाय तो समय आ गया है जब सरकार ऐसी संस्थाओं के निर्माण करे जो विभिन्न प्रकार के कर्जों की वापसी में तेजी लाएं। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि राजनीतिक रसूख के आध्ाार पर क्या बैंकों ने सार्वजनिक धन की लूट का लाइसेंस तो नहीं दे रखा है। और सबसे जरूरी बात यह कि बैंकिंग व्यवस्था को भविष्य के लिए स्वस्थ बनाया जाए ताकि फिर कोई नीरव मोदी या विजय माल्या इस देश में पैदा ही न हो पाये।

विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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