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विश्वगुरु से घोटालों का महागुरु बन गया है भारत

हम कभी विश्वगुरु थे। दुनिया हमें सोने की चिड़िया कहता था। दुनिया को ज्ञान व अध्यात्म में पाठ सिखाता था। सत्य, अहिंसा, ज्ञान और विज्ञान में सिरमौर भारत ऐसा लगता है जैसे आज विश्वगुरु से घोटालों का महागुरु बन गया है। बैंको को चूना लगाने का यह पहला मामला नहीं है इससे पहले भी अनेक बैंक घोटालों का पर्दाफास हो चुका है। जिस बैंक में गरीब को घुसने की इजाजत नहीं है। हजार रूपये के लोन के लिए महीनों की भागदौड़ होती है। फिर उसकी कई गुना मिलकियत की जमीन जायदाद गिरवी रखकर लोन दिया जाता है। नहीं चुकाने पर जमीन जायदाद सरेआम नीलाम करदी जाती है। वहीँ करोड़ों अरबों के लोन किसी कथित फ्राड को कैसे दे दिए जाते है भगवान ही मालिक है। मगर एक बात बिलकुल साफ है की बिना मिलीभगत के यह संभव नहीं है। बैंक अधिकारी सरकारी राशि का जीमण करने के बाद ही किसी दूसरे को हाथ लगाने देते है। इस प्रकार जनधन लूट लिया जाता है और कानून के रखवाले देखते रह जाते है। हर्षद मेहता का 700 सौ करोड़ रूपये का घोटाला , ललित मोदी का आईपीएल का 275 करोड़ रू और विजय माल्या का 9 हजार करोड़ रू के घोटाले के बाद नीरव मोदी का 11 हजार 360 करोड़ रू का घोटाला जग जाहिर हुआ है। अभी यह फहरिस्त रुकी नहीं है। पेन बनानेवाली रोटोमैक कंपनी का 3000 करोड़ का घोटाला भी सामने आचुका है। अब सब घोटाले एक एक कर सामने आएंगे। सरकार चाहे मोदी की हो या किसी और की इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि घोटालेबाजों के हाथ बहुत लम्बे है। आश्चर्य इस बात का है कि नीरव मोदी, विक्रम कोठरी और विजय माल्या ने साफ तौर पर बैंकों का कजा चुकाने से इंकार कर दिया है।
आजादी के बाद अनेक बड़े घोटाले हुए मगर हमने उनसे कोई सबक नहीं सीखा। जनधन को लूटने दिया। कोई असरदार कार्यवाही नहीं होने से घोटालों की देश में बाढ़ सी आगयी। आजादी से अब तक देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। इनमें जीप खरीदी (1948) ,साइकिल आयात (1951), मूंधड़ा मैस (1958),तेजा ऋण (1960), पटनायक मामला (1965) ,मारुति घोटाला, कुओ ऑयल डील,अंतुले ट्रस्ट , एचडीडब्लू दलाली (1987), बोफोर्स घोटाला (1987 ), इंडियन बैंक (1992), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, नागरवाला कांड (1971),देवराज अर्स (1975),चुरहट लॉटरी कांड (1982),सेंट किट्स घोटाला (1989),जैन हवाला डायरी कांड (1991),बाम्बे स्टाक एक्सचेंज घोटाला (1992), चीनी आयत (1994),जेएमएम सांसद घुसकंड (1995),यूरिया घोटाला (1996), सुखराम ( 1996 ),मैच फिक्सिंग (2000),बराक मिसाइल घोटाला (2001)चारा घोटाला (1996) , तहलका , स्टॉक मार्केट ,स्टांप पेपर स्कैम सत्यम घोटाला और मनी लांडरिंग घोटाला प्रमुख है।

देश में घपलों-घोटालों की ये सूची तो मात्र एक नमूना है। गिनने बैठो तो इतनी बड़ी सूची बन जाएगी कि उसका दूसरा सिरा ही नहीं मिलेगा। ये सभी घोटाले प्रभावशाली लोगों के है। कईयों को सजा भी हो चुकी है। मगर घोटाले बदस्तूर जारी है। घोटालेबाजों को कोई खौफ नहीं है। जेल जाना इन लोगों के लिए तीर्थ जाने के सामान है।
पंजाब नेशनल बैंक में हुए महाघोटाले के बीच एक और चैंकाने वाली बात सामने आई है। यह बात है बैंकों के दिवालिया होने की है। देश में 49 बैंक ऐसे हैं जो दिवालिया हो सकते हैं । इनमें 27 सरकारी बैंक और 22 प्राइवेट बैंक शामिल हैं। लंबे समय से एनपीए से जूझ रहे भारतीय बैंक दिवालिया होने के कगार पर हैं। यह बात आरटीआई में सामने आई है। भारतीय बैंक लगातार दिए गए कर्ज को डूबते खाते में डाल रहे हैं। पिछले 5 साल में बैंकों के 3 लाख 67 हजार 765 करोड़ रुपए राइट ऑफ के जरिए डूब गए हैं। वहीं, इससे कहीं ज्यादा रकम को बैड लोन की कैटेगरी में शामिल किया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रिजर्व बैंक की तरफ से जो जानकारी मिली है उससे साफ है कि बैंक दिवालिया होने की तरफ बढ़ रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, 2012 से सितंबर 2017 तक पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर बैंकों ने आपसी समझौते में कुल 367765 करोड़ की रकम राइट ऑफ की है। यह ज्यादातर रकम समाज के कथित प्रभावी और धनाढ्य लोगों की है। किसान कर्जे की मार से बेहाल है। किसान का कर्जा माफ करने के मार्ग में अनेक रुकावटें है मगर बेईमान लोगों का कर्जा राइट ऑफ किया जा रहा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य दूसरा क्या हो सकता है।
चोरी और सीना जोरी इनका हथियार है। कई घोटालेबाज देश छोड़कर विदेश भाग चुके है। जिन्हें वापस देश लाना महाभारत के सामान है। हम एक दूसरे पर आरोप लगाकर इन प्रकरणों को छोटा बना रहे है। घोटाले किसी भी शासन में हुए हो मगर इन्हें माफ नहीं किया जासकता। हमारी चैकसी और जागरूकता के आभाव में घोटालेबाज शेर हो रहे है। देश का माल खाकर देश को ही आँख दिखा रहे है। ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटने का समय आ गया है। घोटालेबाजों को पकड़ना ही होगा तभी देश की अस्मिता बचेगी और भ्रष्टाचार का समूल खत्म होगा। देशवासियों को इस पर गहन चिंतन और मनन की जरुरत है। बाड़ खेत को खा रही है इससे बचने के उपाय खोजने होंगे नहीं तो आने वाले समय में देश को खाने से कोई नहीं बचा पायेगा।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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