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अब तो घूंघट के पट खोलो सरपंच जी

पंचायती राज व्यवस्था महिलाओं के लिए एक वरदान के रूप में उभरी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में पंचायती राज आने से महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। पंचायती राज सही दिशा में महिलाओं में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने तथा उन्हे नया जीवनदान देने में सफल हुयी हैं। महिलाओं की समाज में एक विशेष स्थिति बन सके इसके लिए महिलाओं को ग्रामीण विकास में सहायक बनाने हेतु अनेक प्रयास किए गए। पंचायती राज की अवधारणा का विकास सामुदायिक विकास कार्यक्रमों को गति प्रदान करने और इच्छित जनसहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से हुआ। पंचायती राज ने ग्रामीण महिलाओं को जागरूक बनाया है।

तमाम प्रयासों और दबाओं के बावजूद संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका है। लेकिन स्थानीय निकायों में महिलाओं को मौका मिला हैं। वर्ष 1956 में बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था लागू हुई थी। लेकिन 1993 में 73 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित होने के बाद ही पंचायतों में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित हो सकी थी। निश्चित रूप से 73 वां संवैधानिक संशोधन महिलाओं के सशक्त भागीदारी की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुआ है।

देश के लगभग 16 राज्यों आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड और पश्चिम बंगाल ने अपने पंचायती राज अधिनियमों में संशोधन करके महिलाओं को 50 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान कर दिया है। गत वर्ष मानसून सत्र में पंचायती राज विभाग के राज्य मंत्री परषोत्तम रूपाला ने लोक सभा में बताया था कि देश में पंचायती और निकायों में महिला भागीदारी के तौर पर 14,39,436 महिला प्रतिनिधि हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 3,71,744 निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में 19,992 महिला सरपंच हैं, उसके बाद महाराष्ट्र में 13,960 महिला सरपंच हैं। इससे पता चलता है कि पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ही गरीब व अनपढ़ महिलाओं को बढ़ावा मिला है। आज महिलाओं में कुछ करने की उम्मीद भी जागृत हुयी है। इस प्रक्रिया में निर्वाचित महिला पंचायत सदस्यों के कार्य और अनुभव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के रहे हैं।

हालांकि अभी भी एक वर्ग द्वारा इस पर सवाल खड़ा करते हुए कहा जा रहा है, कि महिलाएं इस जिम्मेदारी को उठाने में सक्षम नही हैं और उनमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है। जबकि सच्चाई यह है कि हमारे समाज में सदियों से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया था और उनकी सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में भागीदारी को दबाने का ही काम किया जाता रहा है। लेकिन जब कभी भी महिलाओं को आगे आने का मौका मिला है उन्होंने अपने आप को साबित किया है। पंचायतों में महिलाओं की भागेदारी से न सिर्फ उनका निजी, सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण हो रहा है, बल्कि स्वशासन और राजनीति में भी गुणवत्तापरक एवं परिमाणात्मक सुधार आ रहे हैं।

पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से महिलाओं का जीवन बहुत प्रभावित हुआ है। सही मायने में पंचायती राज ने महिलाओं को समाज का एक विशेष सदस्य बना दिया है। भारतीय महिलाऐं भले ही कितनी सशक्त क्यों न हो जाए लेकिन उनकी मर्यादाऐं उनका पीछा नहीं छोड़ सकती हैं। यह तथ्य सही है कि 10 लाख महिलाऐं पहली बार सार्वजनिक जीवन में आयी हैं। अधिकतर निर्वाचित महिलाओं को निर्वाचक सदस्य होने के विषय में पूर्ण जानकारी भी नहीं है। अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाती हैं तथा उन्हे यह भी ज्ञान नहीं होता है कि वह एक कुशल प्रशासक भी हो सकती हैं। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाऐं सशक्त तो होती हैं, परन्तु जागरूक होती महिला को पुरूष प्रधान समाज का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है।

एक सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि नारी सशक्त है। पंचायती राज व्यवस्था में उसका स्वरूप बदल रहा है। आज भले ही औरतें थोड़ा बहुत पढ़ लिख लेती हों लेकिन गांव का माहौल होने की वजह से उन के चेहरे से घूंघट नहीं हटा है। ऐसे में सरपंच होते हुए भी उनकी अपनी कोई पहचान नहीं होती है। वे अपने पति या परिजनो के नाम से ही जानी जाती हैं। ज्यादातर घूंघट में रहने वाली महिला सरपंच को मतदाता उस के पति को देख कर वोट देते हैं। ऐसे में घूंघट में रहने वाली सरपंच अपने मतदाताओं को पहचानती तक नहीं है।

घूंघट में रहना लोकतंत्र और औरत जाति के लिए एक चुनौती है। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है लेकिन औरतो के प्रति लोगों की सोच अभी तक नहीं बदली है। घूंघट में जीना यहां की औरतों की जिंदगीभर की कहानी है। राजनीति घूंघट में रह कर नहीं हो सकती। इसके लिए बेबाक होना पड़ता है, तभी उस का असर पड़ता है। जब औरतें घूंघट में होंगी तथा किसी कार्यक्रम में मंच पर बैठेंगी ही नहीं या घूंघट निकाल कर बैठेंगी, तो वहां के हालात बड़े अजीबोगरीब हो जाते हैं। औरतों को अपने से कमतर मानने की सोच के चलते ही उन के चेहरे से परदा नहीं हट पा रहा है।

लोकतंत्र की सबसे छोटी संसद पंचायती राज में हालांकि महिलाएं 50 फीसदी सीटों पर काबिज हैं, लेकिन इन महिला जनप्रतिनिधियों में से कई पढ़ी-लिखी होने के बाद भी ग्राम पंचायत की मिटिंगों में घूंघट में बैठी रहकर जुबान ही नहीं खोलतीं है। कहने को तो वे सरपंच हैं लेकिन पंचायत का सारा काम उनके घर के पुरुष सदस्य करते हैं। महिलाएं सिर्फ रबर स्टैंप बनकर रह गई हैं। कागजों में दस्तखत भी पुरुष ही कर देते हैं। इन महिला सरपंचों को मोबाइल करो तो घर के पुरुष ही उठाते हैं। हर निर्णय वही करते हैं। कई सरपंचो के पति ने तो फेसबुक आईडी में अपने नाम के आगे सरपंच ही लिख दिया है। कई पंचायत भवन के बोर्ड पर सरपंच के नाम के नीचे सरपंच पति अपना मोबाईल नम्बर लिख देते हैं।

कई महिला सरपंच सरकारी योजनाओं के मामले में कोरी हैं। उनको पंचायत की योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं हैं। सारा काम उनके पति या परिजन ही देखते हैं। पंचायत से जुड़े छोटे से लेकर सभी प्रमुख काम बेखौफ होकर सरपंच पति ही अंजाम दे रहे है । खास बात यह है की कई बार तो पंचायत समितियों में होने वाली मीटिंगों में भी सरपंच पति ही हिस्सा लेते है । ऐसा देश की 80 से 90 फीसदी पंचायतो में हो रहा है । गांवों में अब सरपंच पति जैसा पद भी ईजाद हो गया है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर यह लोकतंत्र के साथ धोखा नहीं तो और क्या है ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस समारोह में सरपंच-पति राज की संस्कृति की ओर इशारा किया था। उनका मतलब स्पष्ट था कि पंचायती राज संस्थाओं, विशेषकर ग्राम पंचायत में निर्वाचित महिला सरपंचों का कार्यभार उनके पति न संभालें। यह समस्या विकराल रूप धारण करती गई है। महिलाओं को यह आरक्षण देने का उद्देश्य उनका राजनीतिक सशक्तीकरण करना था, पर इसके बजाए उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्यों का सशक्तीकरण हो रहा है।

सरपंच पति राज की संस्कृति की रोकथाम के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम महिलाओं के प्रति सोच को बदलना होगा। यह काम बालिका शिक्षा पर जोर देने और समाज सुधार आंदोलन के जरिए संभव है। ऐसा नहीं है कि पंचायतो में चल रहे इस खेल की जानकारी सरकार में बैठे लोगों को नहीं है । सभी को यह हकीकत पता होने के बावजूद कोई भी महिला जनप्रतिनिधियो के अधिकारो पर हो रहे इस कुठाराघात के खिलाफ कार्यवाही नहीं करना चाहते है।

क्या ऐसी स्थिति के लिए ही पंचायतराज को मजबूती देने का निर्णय किया गया था। क्या इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने के बाद भी हमारे देश की महिला जनप्रतिनिधियो को घूंघट की ओट में ही जीने को विवश होना पड़ेगा। यह एक बड़ा सवाल है जिसे ना सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियो को गंभीरता से लेना पड़ेगा बल्कि राजनेताओ व प्रशासनिक अधिकारियों को भी सरपंच पतियो के बढ़ते हस्तक्षेप पर प्रभावी अंकुश लगाना होगा। औरतों के सिर से घूंघट हटाने के लिए लड़कियों के मातापिता को आगे आना होगा। उन्हें अपनी बेटियों की शादी उसी परिवार में करनी चाहिए जहां घूंघट का बंधन नहीं हो। घूंघट में रह कर औरतें अपनी जिंदगी के तानेबाने को कैसे बुन सकती हैं? घूंघट में रह कर राजनीति या समाजसेवा नहीं की जा सकती। गांव की तरक्की न केवल औरतों के पढ़े लिखे होने पर टिकी है बल्कि घूंघट मुक्त समाज पर भी निर्भर करती है।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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