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कविता : हवा हवाई

हवा हवाई

वो हँसती-हँसाती
खिलखिलाती
अपनी अदाओं का
जादू बिखेरती
सिनेमा के नील नभ में
छितराई चाँदनी
असंख्य चाहकों को
संतप्त कर खो गई
हवाओं की सनसनाहट में “हवा हवाई”
दे गई “सदमा” की पगली सदमा
यक़ीनन ! भयभीत करने वाला
ये सच यक़ीन की हद के पार है
कि क्या अब “रूप की रानी”
सिर्फ़ कहानियों में दिखेगी ?
ऐ ! मौत,
कुछ तो तूने अदब किया होता
उन तमाम तारों का
जो इसके रुख़सत में
वियोग की अँधेरी कंदरा में
देदीप्यमान होना भूल गये हैं !

देवेंद्रराज सुथार

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