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क्यों घूस लेने लगीं शिखर पर बैठी महिलाएं?

कुछ दिन पहले के अखबारों में तीन खबरें पढ़कर मन उदास हो गया है।मन- मस्तिष्क पर बचपन के दिनों से बैठी भारतीय नारी की शालीन, सौम्य और सुन्दर छवि ध्वस्त होती सी दिखी। मातृस्वरूपा, वात्सल्यमयी संस्कारों की जननी मॉं जैसी भारतीय नारी को उँचे पदों पर जाकर जहॉं संस्थान में स्वच्छ चरित्र और अनुकरणीय सुगंधि की बयार बहानी चाहिए थी , वे स्वयं भ्रष्टाचार के दलदल में जाकर फँस गई। हाय! कहॉं गया भारतीय नारियों का उत्तम चरित्र और अनुकरणीय संस्कार?

यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन तीनों खबरों के केन्द्र में सूत्रधार नामी गिरामी अपनी उपलब्चधियों के लिए चर्चित और सफल महिलाएं ही थीं। तीनों पर अलग-अलग तरह के आरोप लगे हैं। लेकिन सभी आरोप गंभीर और घिनौने हैं। पहले बात करेंगे यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया की पूर्व चेयरमेन और प्रबंध निदेशक अर्चना भार्गव की। केन्द्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) ने अर्चना भार्गव के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति एकत्र करने के आरोप लगाते हुए केस दर्ज किया है। सीबीआई ने उनके ठिकानों में छापों के दौरान कैश, आभूषण और 10 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के ब्यौरे बरामद किए हैं जो कथित तौर पर भार्गव और उनके परिवार के सदस्यों के नाम हैं। रिटायरमेंट की उम्र आने से पहले ही बैंक की नौकरी को खराब सेहत का बहाना बनाकर छोड़ने वाली अर्चना भार्गव पर यह भी आरोप है कि वर्ष 2011 में केनरा बैंक की कार्यकारी निदेशक रहते हुए और 2013 में यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया की सीएमडी के तौर पर उन्होंने उन कंपनियों को लोन दिलवाने में अतिरिक्त उदारता बरती जो उनके पति-पुत्र के स्वामित्व वाली कंपनियों से डील कर रही थीं। इस केस से पहले कभी इतनी शिखर महिला बैंक अधिकारी पर करप्शन का केस दरिज हुआ हो ऐसा नहीं सुना था।

आमतौर पर निष्ठावान

आम तौर पर यह एक सत्य है कि महिला कर्मी अपने दफ्तर के दायित्वों के प्रति ईमानदार और निष्ठावान रहती हैं। उन पर कभी इतने बड़े पैमाने पर घोटाले करने के आरोप नहीं लगते। तो फिर अर्चना भार्गव कैसे अपने कर्तव्यों का पालन करने के बजाय अनाप-शनाप तरीके से गोलमाल करने लगीं? अभी कुछ माह पहले तक अरुंधति भंट्टाचार्य मुखिया थीं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) थी। वो जब इस पद पर बैठीं थी तब कहा जा रहा था कि ये नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम है। उनसे पहले विजयालक्ष्मी अय्यर बैंक ऑफ इंडिया की चेयरमेन और मैनेजिंग डायरेक्टर रही। इनके अलावा, नैनालाल किदवई एचएसबीसी इंडिया, चंदा कोछड़ आईसीआईसीआई बैंक की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ रहीं। इन सब की साफ-सुथरी छवि बनी रही। पर अर्चना भार्गव ने सब कुछ गड़ बड़ कर दिया। दरअसल शिखर पर पहुंचने से भी ज्यादा खास बात यह होती है कि आपके नेतृत्व में बैंक का कारोबार कितना फैलता है, बैंक कितने नौजवान उद्यमियों को लोन देता है ताकि वे अपने सपनो को साकार कर सकें, कितने आम और निर्धन लोगों को अपनी छत बनाने के लिए लोन देता है और अपने डूबे हुए लोन की रिकवरी कर पाता है। ये सब करने में अर्चना भार्गव असफल रहीं।

लगा होगा झटका

अर्चना भार्गव के आचरण से बैंकिंग और फाइनेंस की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ती महिलाओं को झटका जरूर लगेगा।भारतीय महिला सीईओ के एक क्षेत्रवार विश्लेषण से पता चलता है कि महिला सीईओ में से आधी (54 फीसदी) बैंकिंग व वित्तीय सेवा क्षेत्र में हैं जबकि मीडिया व लाइफ साइंसेज में क्रमश: 11-11 फीसदी।

नोट छापने का धंधा

खैर,जिस दिन अर्चना भार्गव को लेकर समातचार था, उस दिन देश का मीडियानेशनल फिल्म डवलपमेंट कोरपेरशन (एनएफडीसी) की प्रबंध निदेशक नीना लाथ गुप्ता को उनके पद से हटाए जाने संबंधी समाचार भी दे रहा था। राष्ट्रपति ने नीना लाथ गुप्ता की बर्खास्तगी संबंधी फाइल को हरी झंडी दिखाई थी। वो भी दिन-रात घूस खा रही थी। वो अपने विभाग से दिए जाने वाले हर काम के बदले में बेशर्मी से हिस्सा और कमीशन मांगती थी। उन पर सरकार कुछ समय से नजर रख रही थी। जब सरकार को उनके खिलाफ पुख्ता साक्ष्य प्राप्त हो गए तो उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया। वोअप्रैल, 2006 से एनएफडीसी की प्रबंध निदेशक थीं। दरअसल एनएफडीसी का प्राथमिक लक्ष्य सिनेमा में भारतीय फिल्म उद्योग के एक एकीकृत और कुशल विकास की योजना बनाना, उसे बढ़ावा देना और व्यवस्थित करना है। बेशक एनएफडीसी ने बीते लंबे समय से भारतीय सिनेमा के विकास के लिए आवश्यक सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान की है। लेकिन नीना लाथ गुप्ता के रूप में उसे एक इस तरह का अफसर मिला,जो इतने बेहतरीन सरकारी निभाग की इज्जत धूल में मिला रहा था । जाहिर है, उनके काले –कारनामे अब जब मीडिया देश की जनता के सामने रख रहा है तो वो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रही है।

जरा सोचिए कि सरकार ने अर्चना भार्गव और नीला लाथ गुप्ता पर कितना भरोसा करके अहम पद दिए और ये वहां पर नोट छापने का धंधा करने लगीं। इनसे सरकार को तमाम अपेक्षाएं थीं कि ये अपने विभागों को बुलंदियों पर लेकर जाएँगी।कार्यशाली महिलाओं पर देश गर्व करता है। ये महिलाएं उन स्कूल-कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों की आदर्श होती है,जो भविष्य में नौकरी करना चाहती हैं। लेकिन इन दोनों ने देश और समाज को निराश किया।

और उसी दिन एक समाचारअपनी पुत्री का कत्ल करने की आरोपी इंद्राणी मुखर्जी के संबंध में भी छपा था। चूंकि उन पर बहुत कुछ छपा चुका है, इसलिए उनकी अधिक चर्चा करना व्यर्थ है। पर इतना तो कहा ही जाएगा कि मीडिया के संसार में नाम और शोहरत कमाने वाली महिला इतनी गिर गई कि उसने अपनी बेटी को ही मरवा दिया। उस पर कम से कम आरोप तो यही है। अर्चना भार्गव, नीना लाथ गुप्ता और इंद्राणी मुखर्जी समाज के सभ्रांत और कुलीन तबकों से हैं। निश्चित रूप से समाजशास्त्री और नारी मुख्ति आंदोलन से जुड़ी महिलाएं इन सवालों के जवाब तलाश करेंगी कि इतने बड़े और असरदार पदों पर पहुंचने के बाद भी ये भ्रष्टाचार में किसलिए लिफ्त हुईं।

किए होंगे हरचंद प्रयास

दरअसल भारत में महिलाएं कितना ही आगे पहुंच जाएं पर उन्हें घर के काम से मुक्ति नहीं मिलती। यानी उन्हें दफ्तर के साथ-साथ घर का तो काम करना ही पड़ता है। प्रतिभाशाली महिलाओं में से कई मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। मां बनने के बाद दो-तीन साल का समय काफी मुश्किल भरे होते हैं। कैसे अपने बच्चे को घर पर छोड़ने के विचार से उनकी हिम्मत टूट जाती है। इन तीनों ने भी आगे बढ़ने के लिए हर चंद प्रयास किए होंगे। ये निर्विवाद है। इन्होंने दिन-रात मेहनत की होगी। पर अफसोस कि लालच के आगे इन्होंने अपना सब कुछ खो दिया। कहते ही हैं कि कभी-कभी इंसान दुर्बल क्षणों में इतनाबड़ा अपराध कर बैठता है कि उसके बाद उसके लिए बचने का कोई मौका ही ही नहीं बचता।

आर.के.सिन्हा, (लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)

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