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दुर्घटनाओं की रोकथाम के कारगर उपाय क्यों नहीं

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए एक सड़क हादसे में एक साथ पलक झपकते ही नौ मासूम बच्चों की मौत की खबर जिसने भी सुनीउसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। सारा बिहार ही नहीं पूरा देश ही इस दर्दनाक इस हादसे से सन्न है। घटना में 25 बच्चे भी घायल हो गए हैं जो अब तक सदमे से उबर ही नहीं पा रहे हैं। ये सभी बच्चे विद्यालय की छुट्टी होने पर राजमार्ग संख्या-77 पार करके वापस सड़क कि दूसरी ओर बसे गाँव में अपने घर जा रहे थे कि तभी एक तेज रफ्तार अनियंत्रित बोलेरो ने इन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया।

मुजफ्फरपुर हादसे के बाद एक बार से इस बात की फिर पुष्टि हो गई है कि हमारे देश में पैदल यात्री की स्थिति दिन प्रति दिन खराब ही हो होती चली जा रही है। आखिरकार, कबतक देश का आम गरीब पैदालयात्री को सड़कों पर किसी कार, ट्रक, मोटर साइकल वगैरह से कुचला जाता रहेगा। उसे बचाने वाला तो कोई नहीं है। पैदलयात्रियों को रेड लाइट के वक्त भी सड़क पार करने नहीं दे रहे गैर-ज़िम्मेदार वाहन चलाने वाले। पैदलयात्रियों के हितों को आखिरकार कौन देख रहा हैसड़कों पर पैदल यात्रियों को कुचलने वालों पर कब लगाम कसी जाएगीदेश में हर साल करीब डेढ़ लाख लोग अपने देश में सड़क हादसों में जान गंवा रहे हैं।इनमें पैदलयात्री करीब 20 फीसद माने जाते हैं। लगभग इतने ही साइकल सवार होंगे । जो जीवनभर के लिए हादसों के कारण विकलांग हो जाते हैंवे तो असंख्य हैं। हर गाँव में कोई न कोई सड़क दुर्घटना का मारा अपंग मिल जायेगा । साथ ही भेंट हो जाएगी उसके बिखरे हुए परिवार से भी जो एक ओर परिवार के अपंग सदस्य की देखभाल में भी जुटा है और दूसरी ओर परिवार के लिए दाल-रोटी के जुगाड़ में भी संघर्षरत है । अपनी किशोरावस्ता और ज़्यादातर जवानी मैंने खुद भी पैदालयात्रा करते या साइकल पर प्रतिदिन पचासों किलोमीटर अखबार के एक युवा रिपोर्टर के रूप में भागते हुए इस समस्या से जूझा हूँ । उन दिनों तो न सड़क पर इतनी गाड़ियाँ ही होती थीं, न इतनी भीडभाड । पैदलयात्रियों के लिए फुटपाथ भी हुआ करते थे जिनपर अब शतप्रतिशत खोमचेवालों और ठेलोंवालों का ही एकाधिकार है ।

कौन सोचे उस दीन-हीन की

जब बात सड़कों के चौड़ीकरणसौदर्यीकरण और इनके विस्तार पर होती है तो पैदलयात्री के बारे में कोई नहीं सोचता। उसकी एक वजह ये भी है कि वो समाज का अंतिम व्यक्ति है। वो गरीब है। उसकी आर्थिक-सामाजिक हैसियत कमजोर है। तो क्या इसलिए वो सड़क पर तड़प-तड़प कर मरने के लिए अभिशप्त है। क्या अमीरजादे  सड़कों पर पैदलयात्रियों को कुचलते रहेंगेमैं मानता हूं कि पैदलयात्रियों का कुचला जाना और वाहनों की सड़कों पर लगातार बढ़ती भीड़ का सीधा संबंध है।  कारों की बिक्री को तो रोका नहीं जा सकता । लेकिनसरकार कड़े उपाय करके पैदलयात्रिओं को राहत तो दे ही सकती है। फूटपाथों को फिर से कायम तो किया ही जा सकता है । सड़कों के किनारे जहाँ स्कूल, अस्पताल, मंदिर, मस्जिद आदि सार्वजनिक स्थान हों वहां तो अंडरपास या फुट ओवरब्रिज बनाये ही जा सकते हैं । कम से कम स्कूल की छुट्टी के समय एक ट्रैफिक का सिपाही तो तैनात तो हो ही सकता है ।

कैसे पार करें हाईवे

मुजफ्फरपुर सड़क हादसे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि घनी आबादी वाले उत्तरप्रदेश, बंगाल और बिहार से गुजरने वाले हाईवे देश के सबसे खतरनाक बन गए है पैदलयात्रियों के लिए। इन्हें पार करना या इन पर सफर करना लगातार डरावना बनता जा रहा है। इधर भीषण हादसों से लेकर हत्याएं और लूटपाट आम बात है। इन सड़कों पर आये दिनों लाशें मिलती रहती हैं। हत्यारे लाशों को इधर के हाईवे पर फेंक देते हैं ताकि यह प्रतीत हो कि वे दुर्घटना में ही मरे हों । सही मायनों में खून से लथपथ हो चुके हैं देश के हाईवे। इन हाईवे से अपने गतंव्य स्थलों पर जाने वाले मुसाफिर और इनके किनारे रहने वाले लोग लगातार हादसों के शिकार हो रहे हैं। इन पर रोज डकैतीलूटपाट और रेप के केस भी हो ही रहे हैं। कुछ समय पहले नोएडा से शाहजहांपुर जा रहे एक परिवार के साथ गाजियाबाद-कानपुर नेशनल हाईवे-91 पर बदमाशों ने खौफनाक वारदात को अंजाम दिया था। बदमाशों ने तीन घंटे तक परिवार को बंधक बनाए रखा और लूटपाट के बाद मां और बेटी दोनों के साथ गैंगरेप किया।

अगर बात दिल्ली- आगरा एक्सप्रेस हाईवे की हो तो इस पर लगातार आये दिन लाशें मिल रही हैं। इनकी हालत देखकर ही समझ आ जाता है कि इन्हें बड़ी ही बेरहमी से कत्ल करने के बाद हाईवे पर फेंक दिया गया होगा। इसी तरह से राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा राज्य के सोनीपत शहर से गुजरने वाले नेशनल हाई-वे नंबर नंबर -1 पर भी लगातार लाशें मिलने से पुलिस की नींद हराम हो चुकी है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि नेशनल हाई-वे नंबर एक  लाशों को फेंकने का अड्डा बनता जा रहा है। उत्तर प्रदेश के लगभग सभी हाईवे खराब से ही हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो समझ आ जाएगा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के हाईवे कितने असुरक्षित हो चुके हैँ। इनके बाद क्रमश: उड़ीसामहाराष्ट्रमध्य प्रदेश का नंबर आता है। दरअसल उत्तर प्रदेश और बिहार को देश के क्राइम स्टेट’ का दर्जा भी मिल सकता है। उसे इन राज्यों से गुजरने वाले हाईवे पर होने वाली दर्जनों आपराधिक घटनाओं में भी देखा जा सकता है। हाईवे पर होने वाले अपराध पुलिस के लिए नया सिरदर्द बन रहे हैं। पर यह भी सच है कि समूचे हाईवे के चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती मुमकिन भी नहीं है। भारत में करीब एक लाख किलोमीटर लंबा नेशनल हाईवे का जाल बिछा हुआ है। सबसे बड़ा हाईवे का नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है। राज्य में 8,483 किलोमीटर लंबा हाईवे है। बिहार में भी राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई 4,967 किलोमीटर है। बाकी राज्यों में भी हाईवे की लंबाई अच्छी खासी है। तो सवाल यह है कि आखिरकार कैसे थमें इन पर होने वाले अपराध और हादसेइसका यही उपाय समझ आता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ हो। वे अपराध को अंजाम देने से पहले दस बार सोचें। इसी तरह से हाईवे पर तयशुदा रफ्तार से ज्यादा स्पीड से अपने वाहन चलाने वालों पर भी कैमरों की नजर हो। हाईवे पर यातायात के नियमों का पालन न करने वालों पर कठोर दंड हो। उनके लाइसेंस कैंसिल कर दिए जाएं। आपराधिक लापरवाही के जुर्म की सजा भी सख्त की जाये। जब भी संसाधनों का विकास होता है, निश्चित तौर पर नई संभावनाएं बढती हैं । वह शुभ है । होना भी चाहिए । लेकिन, जहाँ संभावनाएं और अवसर पैदा होंगे, वहां नई चुनौतियाँ भी आएँगी । बुद्धिमानी इसी में है कि समझ लें कि कठोर एक्शन लिए बगैर तो हाईवे सुरक्षित नहीं होने वाले। मुजफ्फरपुर के हाईवे पर हुए हादसे के बाद देश के सभी राज्यों की आंखें खुल जानी चाहिए। सरकारी तंत्र को कठोरता उन ड्राइवरों पर करनी होगी जो शराब के नशे में वाहन चलाते हैं। यहां हम उनकी भी बात कर रहे हैं जो नियमों की अनदेखी करके वाहन चलाते हैं। अब सब राज्यों को यह सुनिश्ति करना ही होगा कि किसी भी हालत में इस तरह के केस की पुनरावृत्ति न हो। सभी राज्य हाईवे पेट्रोल पुलिस के नाम से अलग दस्ता बना सकते हैं। इनके पास गाड़ियां अत्याधुनिक उपकरण और हाईवे पर अपराध से निपटने के लिए खास तरह की ट्रेनिंग होनी चाहिए।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिकभारत में साल 2013 में 39,828 लोग हाईवे पर हुए विभिन्न हादसों में मारे गए। अगले बरस यानी 2014 में ये आंकड़ा 40,049 तक पहुंच गया। अब यह मंत्रालय देश के विशाल नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले उन ब्लेक स्पॉट ( जिधर साल में दस या उससे ज्यादा  हादसे होते हैं) की निशानदेही कर रहा है। इसके लिए 11 हजार करोड़ रुपये भी आवंटित किए गए हैं। अभी तक मंत्रालय को देश में 726 ब्लैक स्पॉट मिले हैं। इनमें से तमिलनाडू में 100उत्तर प्रदेश में 99 और कर्नाटक में 86 ब्लैक स्पॉट हैं। ये हादसों के लिहाज से बहुत संवेदनशील हैं।

हर जगह मरता पैदलयात्री

सच बात तो यह है कि पैदलयात्री हर जगह पिस रहा है। अगर बात राजधानी दिल्ली की ही कर लें तो जब भी कोई शख्स किसी भी सड़क या चौराहें पर उसे पार करने के लिए खड़ा होता है तो वो चारों तरफ से सैकड़ों वाहनों के हॉर्न की आवाजें सुन रहा होता है। उसके सामने से सैकड़ों वाहन प्रदूषण फैलाते हुए निकल रहे होते हैं। आप मानेंगे कि अब मुंबई से लेकर इंदौर और ग्वालियर से लेकर गाजियाबाद में सड़कों पर चलने वाले वाहन मौत का धुंआ ही उड़ा रहे हैं।सड़कों पर वाहनों की अंधाधुंध रफ्तार से बढ़ती संख्या के कारण शहरों में बढ़ते वायू प्रदूषण ने बड़ी संख्या में लोगों को सांस का मरीज बना दिया है। एक अनुमान के अनुसारशहरों की हजारों छोटी-बड़ी गाड़ियों में से केवल 5 फीसदी की ही नियमित जांच होती है। 50 फीसदी वाहनों का धुंआ प्रदूषण फैला रहा है और उसमें जहरीले तत्वों की मात्रा सामान्य से ज्यादा है। इन सेंटरों में दुपहिए वाहनों की चेकिंग के लिए 20 रुपएफोर व्हीलर के लिए 50 रुपएट्रक व डंपर जैसे भारी वाहनों के लिए 100 रुपए का शुल्क वसूला जा रहा है। इनके द्वारा जारी प्रमाण-पत्र 6 महीने तक वैध रहता है। इसी जांच का सरकारी शुल्क कम होने के बावजूद भी लोग नहीं आते। उधर वाहन चालक ऐसी किसी जांच को अनिवार्य होने व धुंए के प्रदूषण के खतरे से खुद को अनजान बताते हैं। अगर कोई ये सोच रहा है कि गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से सिर्फ बड़े शहर ही प्रभावित हो रहे हैं तो गुस्ताफी माफ करें और अपनी जानकारी को दुरुस्त कर लें। इससे तो पूरा का पूरा वातावरण और प्रर्यावरण प्रभावित हो रहा है। क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को यही उपहार देना चाहते हैं ?

कुल मिलाकर एक बात साफ है कि देश के छोटे-बड़े शहरों से लेकर हाईवे को पैदलयात्रियों के लिए सुरक्षित बनाना ही होगा। आखिर क्यों हम इस लिहाज से विलंब करते जा रहे है? चेत जाओ ! खतरे की घंटी बज रही है ।

आर.के.सिन्हा, (लेखक राज्य सभा सांसद हैं)

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