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महिला दिवस मनाने के बावजूद नहीं घट रहे महिलाओं के विरुद्ध अपराध

भले ही हम 8 मार्च को अंतरराष्ट्र्ीय महिला दिवस मनाते हो पर महिलाओं के प्रति मानसिकता में अभी कोई आशा जनक बदलाव नहीं आया है। शिक्षित और आधुनिक होने की हामी भरने के बावजूद महिलाओं की प्रताड़ना को लेकर होने वाले अपराधों में कमी होती नहीं दिख रही है। विकसित देश होने का दावा करने वाले फ्रांस से फरवरी 18 में ही जारी एक रिपोर्ट सभ्य समाज को आईना दिखाने के लिए काफी है। फ्रांस की संस्था फाउंडेशन जीन जेरिस द्वारा जारी इस रिपोर्ट के आंकड़े मानवता को शर्मसार करने को काफी है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार फ्रांस की हर आठवीं महिला यौन हिंसा का शिकार है। वहां की 12 फीसदी महिलाओं को कभी ना कभी यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है। मजे की बात यह है कि 50 फीसदी के साथ बचपन या किशोर अवस्था में यौन हिंसा हुई। दर असल पिछले दिनों हॉलिबुड अभिनेता हार्वे विस्टन पर कई अभिनेत्रियों द्वारा यौन उत्पीडन का आरोप लगाए जाने के बाद से सभ्य कहे जाने वाले फ्रांस की महिलाएं अधिक मुखर हुई है। फ्रांस के ही गृह मंत्रालय के आकड़ों के अनुसार 2016 की तुलना में 2017 में 31.5 फीसदी अधिक मामलें दर्ज हुए हैं। फ्रांस तो एक उदाहरण मात्र हैं। कमोबेस यह स्थिति सभी देशों की है। एक और महिलाएं शिक्षित होकर सभी क्षेत्रों में आगे आ रही हैं वहीं दूसरी और महिलाओं के साथ उत्पीडन के मामलें उसी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।
महिलाओं के प्रति अपराध विश्वव्यापी समस्या है। अमेरिका की जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ईव एंसलर ने पिछले वर्षों से अभियान चलाकर महिला अस्मिता के प्रति आवाज बुलंद की। वैजाइन मोनोलॉग्स व गुड बॉडी जैसे नाटकों की लेखिका वीडे नाम से एनजीओ का संचालन करने वाली ईव एंसलर ने बस, अब और नहीं, से अभियान का आगाज किया था। इस अभियान को वन बिलियन राइजिंग नाम दिया गया। करीब 200 देशों में हजारों गैरसरकारी संगठनों के सामूहिक प्रयासों से इस जागरुकता अभियान में भागीदारी निभाई। इस अभियान से जुड़कर सेलिबिट््री, युवक-युवतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और वुद्धिजीवियों द्वारा महिला अस्मिता के लिए संघर्ष किया जा रहा है। हमारे यहां रविशंकर की पुत्री अनुष्का शंकर, नंदिता दास, राहुल बोस, फरहान अख्तर, जावेद अख्तर, मल्लिका साराभाई, शबाना आजमी आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं व सेलिब्रिटिज ने महिलाओं के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। कानून में बदलाव और व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए गए पर यह अभी भी नाकाफी है। पुलिस प्रशासन द्वारा नए नए एप्स बनाने, जीपीएस व सीसीटीवी मोनेटरिंग सिस्टम शुरु किए जाने के बावजूद परिणाम अधिक आशाजनक नहीं हैं।
आज महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकली है, नए नए क्षेत्रों में सफलता के परचम पहरा रही है। अब तो कंपनियों में महिला डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए सख्ती की जा रही हैं पर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इतना सब होने के बाद भी महिलाओं के सम्मान को कदम-कदम पर ठेस भी पहंुचाई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र् संघ के आंकडों के अनुसार दुनिया में हर तीन में से एक महिला का कभी ना कभी शारीरिक-मानसिक शोषण होता है। आंकड़ें वास्तव में चौकाने वाले हैं। दुनिया में 71 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक या यौन शोषण व हिंसा का शिकार होती है। सबसे आधुनिक व मानवतावादी देश अमेरिका मंे प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिचितों द्वारा ही मार दी जाती है। दक्षिण अफ्रिका मंे हर 6 घंटे में एक महिला को उसके साथी द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता। आखिर ऐसा कब तक चलेगा। सभ्य समाज में महिलाओं के साथ छेड़-छाड, अभद्र व्यवहार या रेप जैसी घटनाएं बेहद चिंता का विषय है।चिंतनीय यह है कि रेप या इस तरह की घटनाआंें को राजनीतिक व सांप्रदायिक रुप दिया जाने लगा है और राजनीति व सांप्रदायिकता की आग में महिलाओें की इज्जत तार-तार होने के साथ ही सामाजिक ताने-बाने मे बिखराब आने लगा हैै।
सभ्य समाज के लिए इससे अधिक शर्मनाम बात क्या होगी कि लाख प्रयासों के बावजूद हर दो मिनट में एक महिला अपराध की शिकार हो रही है। यह आंकड़े तो तब है जब देश की राजधानी में शर्मनाक निर्भया जैसा कांड हो चुका है। यह तब है जब निर्भया कांड की प्रतिक्रिया में दिल्ली ही नहीं पूरा देश हिल गया था। नारी अस्मिता की बात को लेकर युवा सड़कों पर आ गए थे। ना जाने कितने प्रदर्शन हुए। दिल्ली ही नहीं देश को कोई कोना इस तरह के प्रदर्शनों से अछूता नहीं रहा। पर ढाक के वहीं पात वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। लाख प्रयासों के बावजूद महिला अपराधों में कमी नहीं आ रही है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में महिला अपराधोें में दो गुना से भी अधिक बढ़ोतरी हुई है। यह सब तब है जब हमारी साक्षरता की दर बढ़ रही है। हम अधिक पढ़े लिखे हो रहे हैं। विकास की राह पर बढ़ रहे हैं। साधन संपन्न हो रहे हैं। सख्त कानून हुए हैं। पुलिस प्रशासन अधिक संवेदनशील हुआ है। पुलिस में महिला पुलिस कर्मियों की संख्या बढ़ी हैं। महिला थाने खुले हैं। सार्वजनिक वाहनों में जीपीएस व अन्य साधनों से निगरानी व्यवस्था की हैं। जगह जगह सीसीटीव कैमरों से निगरानी की जा रही हैं। महिलाएं अधिक सक्रियता से रोजगार के क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं कर रह बल्कि सफलता के परचम पहरा रही है। इतना सबकुछ होने के बाद भी हो यह रहा है कि ज्यों ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के जो आंकड़े सामने आये हैं वे सभ्य समाज के लिए शर्मनाक तो है ही इसके साथ ही बेहद निराशाजनक और लगता है जैसे हमसे तो आदिम समाज ही ठीक था। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार एक दशक में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 22 लाख 40 हजार मामलें दर्ज हुए । इनमंे से पतियों और सगे संबंधियों के हाथों प्रताडित होने के 9 लाख से अधिक मामलें है जो महिलाओं के खिलाफ अपराध के सर्वाधिक मामलें हैं। अपनों से प्रताडित होने के इन मामलों के बाद दूसरा नंबर यौन प्रताड़ना का आता है। इस तरह के चार लाख से अधिक मामलें प्रकाश में आये हैं। 3 लाख से अधिक मामलें अपहरण के हैं। हांलाकि अब दहेज प्रताड़ना के मामलेें देखा जाए तो कम होने लगे हैं। महिलाओं से छेड़छाड़ हो या मर्यादा हनन, अपहरण हो या क्रूरता सभी क्षेत्रों में बढ़ोतरी होना इस बात का संकेत है कि आज भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। हांलाकि महिलाओं के प्रति अपराध में बढ़ोतरी के कई कारण है। यह भी सही है कि देश में कुछ महिलाओें द्वारा महिला सुरक्षा के लिए बने कानून का दुरुपयोग व झूठे आरोप लगाने के मामलें भी तेजी से सामने हा रहे हैं और इससे महिला अस्मिता ही प्रभावित हो रही है। बदलती आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों में लिव इन एक नई समस्या लेकर आ रही है। जरा सा मतभेद हुआ नहीं कि दुराचार के आरोप आम होते जा रहे हैं। कुछ महिलाएं तो कानून को हथियान के रुप में इश्तेमाल करने लगी है। हनी ट्र्ेप के मामले सामने आने लगे हैं। ऐसे में महिलाओं को भी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। वहीं अंतरराष्ट्र्ीय महिला दिवस की औपचारिकता से कोई परिणाम नहीं आने वाले हैं। दुषित मानसिकता में बदलाव से ही कुछ हो पाएगा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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