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नाम के महिला संगठन

आज जबकि,महिलाओ की दुर्दशा चरम पर है,ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना यकीनन ही महिला मुक्ति आन्दोलन को मुहँ चिढ़ाना है।विभिन्न  महिला संगठनों का हर वर्ष महिला दिवस मनाने के पीछे तर्क है की इससे महिला आन्दोलन सही दिशा में संचालित होंगे तथा महिला आरक्षण विधेयक के प्रति सरकार भी अपना ध्यान केन्द्रित कर सकेगी।पर,सीधा प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाओं के शोषण से मुक्ति के लिए चल रहा दशकों का आन्दोलन व्यर्थ ही था?यदि नहीं तो महिला दिवस मनाने की नौबत क्यों आई?साफ़ तौर पर देखा जाय तो महिलाओं की समाज की तथाकथित बेड़ियों से मुक्त करने के लिए बनाये गये महिला संगठन अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक निभा कर रहे हैं।इन संगठनों में शोषित महिलाओं की सहायता की बात सिर्फ कागजों में रह जाती है,जबकि महिला संगठनो में महिला का ही वर्चस्व है और होना भी चाहिए।इससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं की दुर्दशा में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान नज़र आता है।महिलाओं द्वारा  महिलाओं के लिए चल रहे आन्दोलन  पर नजर  डालें,तो स्वाभाविक  है प्रश्न  उठेगा कि यह आन्दोलन  क्यों और कितना है?
एक प्राकृतिक  सुदृढ़  ढाचें को अटूट बनाने के लिए नर और मादा की रचना  हुई।यानि महिलाओं के साथ पुरुषों का और पुरुषों के साथ महिलाओं का तालमेल होना जरुरी ही नहीं मज़बूरी भी है।ये होता आया है और होता रहेगा,भले ही इन सम्बन्धों  के चेहरों में अनावश्यक  बदलाव आ जाय।महिला आन्दोलनकारी कहते हैं कि पुरुष इन्हें दबा कर रखते हैं,इनका शोषण करते हैं,इन्हें आगे बढ़ने से रोकते हैं।समाज की मुख्य  धारा  में आने से रोकते हैं,लेकिन इन नकारात्मक वाक्यों का यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है।ये सिर्फ गुमराह करने वाले तथ्य  हैं।यदि महिलाओं और पुरुषों  के बीच कहीं कोई विवाद सुनाई देता है तो उसके लिए दोनों समान रूप से जिम्मेदार  होते है।सच पूछा जाय,तो पीड़ित महिलाओं शिकायत पुरुषों से कम महिलाओं से ही ज्यादा ही होती है।आज देश में हो रही दहेज़  के लिए हत्याएं देह व्यापार  और पुरुषों द्वारा प्रताड़ित  किये जाने का मामला दिनोंदिन घटने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं।इसके पीछे भी महिलाओं का किसी न किसी रूप में योगदान  रहता है।
महिलाओं को सुखी रखने एवं उनके पारिवारिक जीवन को सुदृढ़ बनाने के बारे में महिला संगठन कभी भी नहीं सोचते।यह भी सही है कि वे महिलाओं के सामाजिक एवं राजनीतिक विकास कराने के नाम पर सिर्फ राजनीती कर रहे हैं।किसी तरह संसद  के गलियारों तक पहुँच जाये उनके संसद में पहुँचने के बाद उन्हें पुराना आन्दोलन भूल जाना है।राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर महिला संस्था संगठन में सिर्फ फरियादी का फरियाद सुनी जाती है,पर कारवाई  के नाम पर सिर्फ ठेंगा।महिला संगठन महिला का ही एकाधिकार  है,तब प्रश्न यह उठता है कि इन महिला संगठन से किस प्रकार की उम्मीद की जाय।महिलाओं के बदहाली के लिए सिर्फ पुरुषों को ही जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।महिलाओं की दोरंगी नीति भी महिलाओं की बदहाली का कारण है।फ़िलहाल ज़रूरत इस बात की है कि शुरु  से ही बेटे और बेटी में बिना फर्क किये हुए उन्हें समुचित शिक्षा दी जाए ताकि वे पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन खुशहाल  बना सके महिलाओं के अन्य विकास छोड़ सिर्फ उन्हें शिक्षित  किया जाए और उनके प्रति समाज को जागरूक किया जाय तो बहुत सी समस्याओं  का समाधान ख़ुद ब ख़ुद हो जायेगा।
विनोद विमल,
शिक्षक
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