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MOVIE REVIEW: फिल्म देखने से पहले जानलें कैसी है ‘मिसिंग’

मनोज बाजपेयी, तब्बू और अन्नू कपूर जैसी दमदार स्टारकास्ट से सजी फिल्म ‘मिसिंग’ में आपको इन कलाकारों की अच्छी अदाकारी देखने को मिलेगी लेकिन फिल्म अपनी कई कमजोरियों के कारण कई बार आपको निराश करती है।
आज से 19 साल पहले प्रदर्शित हुई सायकॉलजिकल थ्रिलर ‘कौन’ दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देनेवाली फिल्म साबित हुई थी। राम गोपाल वर्मा की इस फिल्म में उर्मिला मातोंडकर के साथ मनोज बाजपेयी के अभिनय की शानदार बानगी देखने को मिली थी। मनोज बाजपेयी की हालिया रिलीज ‘मिसिंग’ भी उसी परंपरा का निर्वाह करती नजर आती है, मगर यह फिल्म ‘कौन’ की तुलना में कहीं से भी बीस साबित नहीं होती।
क्या है इस फिल्म की कहानी:
फिल्म बड़े दिलचस्प अंदाज से शुरू होती है, जहां सुशांत दुबे (मनोज बाजपेयी) अपनी पत्नी अपर्णा (तब्बू) और 3 साल की बीमार बच्ची तितली के साथ रात के एक बजे मॉरीशस के एक रिजॉर्ट में चेक इन करता है। सुबह जब पति-पत्नी की आंख खुलती है, तो पता चलता है कि रिजॉर्ट के उनके कमरे से तितली गायब है। काफी खोजबीन के बाद वहां के पुलिस अफसर (अन्नू कपूर) को बुलाया जाता है। पुलिस की पड़ताल में इस दंपति के बारे में अजीबो-गरीब बातें सामने आती हैं। सुशांत पुलिस को बताता है कि तितली का कोई अस्तित्व नहीं है और उसकी पत्नी अपर्णा मानसिक बीमारी की शिकार है। उसी मनोदशा के कारण उसने एक काल्पनिक तितली की कहानी गढ़ ली है। इतना ही नहीं जैसे-जैसे पुलिस की तफ्शीश आगे बढ़ती जाती है, कहानी उलझती जाती है और एक पॉइंट ऐसा आता है जब पुलिस को इस पति-पत्नी के आपसी संबंधों पर भी शक होने लगता है। क्या वाकई तितली नाम की कोई बच्ची है ही नहीं? अगर है, तो वह कहां गायब हो गई? इस दंपति के संबंधों और बातों में ऐसा क्या झमेला है, जो पुलिस इन्हें भी शक की निगाह से देखने लगती है? ये तमाम बातें देखने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
जानिए इस फिल्म का रिव्यू:
टेलिविजन की दुनिया से ताल्लुक रखनेवाले निर्देशक मुकुल अभ्यंकर की फिल्म निर्देशक के रूप में पहली फिल्म है। थ्रिलर फिल्म के लिहाज से उन्होंने अच्छी कोशिश की है, मगर दिक्कत यह है कि फिल्म के शुरू होने के कुछ देर बाद ही दर्शक आगे होनेवाले घटनाक्रम के बारे में जान जाता है। प्रेडिक्टिबल होने के बावजूद निर्देशक ने इसे ग्रिपिंग बनाया है, मगर टुकड़ों में। ज्यादातर जगहों पर यह फिल्म अपनी पकड़ खो देती है। मुकुल के लेखन-निर्देशन में उथलापन है। सस्पेंस-थ्रिलर में कई जगहों पर हंसी आती है, जो फिल्म के हित में नहीं है। स्क्रीनप्ले बहुत कमजोर है। क्लाइमैक्स तक आते-आते आप फिल्म की परिणति जान जाते हैं और रोमांच खो देते हैं। फिल्म में सुदीप चटर्जी का कैमरावर्क कमाल का है। एडिटिंग और शार्प हो सकती थी।
मनोज बाजपेयी ने एक औरतखोर किरदार के चालाकी, डरे, सहमे वाले तमाम भावों को बेहतरीन ढंग से पेश किया है। परिस्थितियों के बीच फंस जाने के बाद कई जगहों पर उनकी बेचारगी पर हंसी भी खूब आती है। खोई हुई बच्ची की मां की भूमिका को तब्बू ने दिल से निभाया है। पुलिस अफसर के रोल में अन्नू कपूर कुछ पल राहत के जरूर देते हैं। सहयोगी कास्ट ठीक-ठाक है। संगीतकार एम एम करीम का संगीत थ्रिलर फिल्म के अनुसार सामान्य ही है। ‘लोरी’ गीत जरूर प्रभावशाली लगा है।
क्यों देखें यह फिल्म :
सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों के शौकीन और मनोज बाजपेयी-तब्बू के फैंस यह फिल्म देख सकते हैं।

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