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पत्थरबाजों की जगह कब्रगाह ही हो

अपने को इस्लाम का सच्चा अनुयायी कहने-बताने वाले आतंकवादी हत्यारे कश्मीर में रमजान के पवित्र महीने में भी खून-खराबा करने से बाज नहीं आए। ये पत्थरबाजी करते ही रहे। इन्होंने सुरक्षाकर्मियों तथा उनके वाहनों पर पथराव करने का कोई भी अवसर जाने नहीं दिया। इस क्रम में पथराव करने वालों का एक नया चेहरा भी देश ने देखा। इनके संगी-साथियों ने बेखौफ पत्रकार शुजात बुखारी का कत्ल भी कर दिया। क्योंकि, वे शांति और अमन की बात कर रहे थे। अब हाथों में पत्थर कॉलेजों में पढ़ने वाली लड़कियों से भी उठवाये जा रहे हैं।इनके चेहरे और सिऱ कॉलेज की यूनिफॉर्म से ढ़के हैं। जिन्हें कॉलेजों में अपनी कक्षाओं में बैठकरलेक्चर सुनने चाहिएं, वे खौफजदा कन्याएं पार्किंग में खड़े केन्द्रीय सुरक्षा बल पुलिस ( सीआरपीएफ) के वाहनों पर मोटे-मोटे पत्थरफेंकने में लगी हुई हैं। ये सुरक्षा बलों के वाहनों पर अंधाधुंध पथराव करती हुई नजर आ रही हैं। उन्हें पता है कि यदि वे यह नहीं करेंगी तो दिन दहाड़े उठा ली जायेंगी और आतंकवादियों के हवस का शिकार बनेंगीं । लेकिन, क्या इन्हें यह सब करते हुए शोभा देता है?

श्रीनगर के गर्वमेंट कॉलेज फॉऱ वूमेन की छात्राएं अपनी हरकत से अपने और अपने कॉलेज को भी शर्मसार कर रही हैं। कभी इस कॉलेज की एक बेहतर शिक्षण संस्थान के रूप में छवि बनी हुई थी। यहां से दर्जनों की संख्या में छात्राओं ने आगे चलकर जीवन की दौड़ में नाम कमाया। शिक्षा का यह मंदिर कभी नकारात्मक रूप से सुर्खियों में नहीं आया था। पर अब यहां की छात्राएं पथराव में लिप्त हैं। पथराव करने के कृत्य को अभी तक भटके हुए लफँगे नौजवान ही अंजाम दे रहे थे। इनकी पुलिस वाहनों पर पथराव की तस्वीरों को देखकर किसी भी भारतीय का खून खौल उठता है। अब इन सड़क छाप लड़कों के साथ लड़कियां भी आ गई हैं। अभी तक कश्मीर में चल रहे आंदोलन से लड़कियां किसी भी रूप में जुड़ी हुई नहीं थीं। वहां पर भारत विरोधी तत्वों ने सारे माहौल को बेहद विषाक्त कर दिया है। परिणाम ये हो रहा है कि घरों से अपने कॉलेजों तक आने-जाने वाली लड़कियों ने भी पत्थरबाजी चालू कर दी है। रमजान के दौरान सुरक्षा बलों ने सीजफायर कर दिया था। तब ये पत्थरबाज ज्यादा सक्रिय हो गए थे। सिर्फ श्रीनगर ही नहीं, बल्कि सूबे के कई अन्य स्थानों पर भी लड़कियां पथराव करने लगी हैं। इनके साथ हर जगह में कुछ टुच्चे लड़के भी साथ रहते हैं।

दरअसल कश्मीर घाटी में जब से हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी की सुरक्षाबलों के हाथों मौत हुई है, वहां तब से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और पत्थरबाजी होने लगे हैं। पत्थरबाजी में सुरक्षाबलों के सैकड़ों जवान भी जख्मी हो चुके हैं। महबूबा सरकार ने अभी तक पत्थरबाजों को लेकर नरम रुख अपनाया । इन पर यह सोचकर ही कसकर कार्रवाई भी नहीं होती थी कि यह आशा की जाती थी कि ये भटके हुए नौजवान लाइन पर आ जाएंगे। पर यह तो देखना ही होगा कि सुरक्षा बलों पर लगातार पथराव करने वालों कोकब तक बख्शा जाए। इनके प्रति नरम रवैया अनिशिचितकाल तक के लिए तो अपनाया नहीं ही जा सकता है। कश्मीर में पत्थरबाजी आतंकियों के बचाव का एक रास्ता बन चुकी है। कश्मीर सरकार और प्रशासन में कई असरदार लोग भी पत्थरबाजों के प्रति नरम रुख अपनाने की वकालत करते रहे हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पहल पर हजारों पत्थरबाजों के ऊपर से मुकदमे वापस ले लिए गए, उन्हें माफी दी गई थी। सरकार की पत्थरबाजों को लेकर जिस तरह की नीति रही है, उसके अपेक्षित परिणाम नहीं आए। इससे उनका मनोबल बढ़ गया है। अब ये बेखौफ हो चुके हैं।

अब अपनों पर करते पथराव

वास्तव में अब ये पत्थर बाज भस्मासुर बन चुके हैं। अब ये स्कूल बसों पर भी पथराव करने से नहीं चूकते। ये शोपियां में स्कूली बस को घेरकर उसमें भी पत्थर बरसा चुके हैं। ये टूरिस्ट बसों पर भी पत्थर फेंकते हैं। इन का सर्वेसर्वा युसुफ बट नाम का आतंकी रहा है। वो उमर अब्दुल्ला सरकार के वक्त भी पत्थरबाजों के संरक्षक के तौर पर सक्रिय था। अगर मीडिया रिपोर्टों को मानें तो कश्मीर में पत्थरबाजों का इस्तेमाल उगाही करने में भी किया जाता है। पत्थरबाजी के चलते सबसे ज्यादा नुकसान कारोबारियों का ही हो रहा है। वे जब पत्थरबाजी रोकने की अपील करते हैं तो इसके एवज में उनसे पैसे मांगे जाते है। पत्थरबाजी में हर साल सैकड़ों सुरक्षाकर्मी निर्दोष नागरिक और पर्यटक गंभीर रूप से घायल होते हैं। अभी हाल में इन पत्थरबाजों ने सुरक्षा बलों की एक बस को निशाना बनाया तो ड्राइवर ने नियंत्रण खो दिया और सीआरपीएफ के दो जवान बस से कुचल कर मारे गए।

कहां गए अमन के पैरोकार ?

कश्मीर में ईद की नमाज के बाद जिस तरह पत्थरबाजी की गयी, जिस तरह ईद के दिन सुरक्षा बलों पर हमला किया गया, इससे एक बात तो शीशे की तरह से साफ हो गई कि उपद्रवियों को इस्लाम की कतई समझ या जानकारी नहीं है। इनका कृत्य इस्लाम विरोधी है । ये तो खून-खराबा करने पर आमादा हैं। इन पत्थर बाजों को कोई भी मुसलमानों का रहनुमा समझाने की चेष्टा भी नहीं करता। किसी के पास इन्हें दो टूक कहने का साहस नहीं है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, वो इस्लाम की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता। यह समझकर कि वे इस्लाम विरोधी कार्य कर रहे हैं उन्हें अपनी हरकतों से बाज आ चाहिए। खैर, अबकेन्द्र सरकार ने इन कश्मीर में बैठे देश के दुश्मनों की कमर तोड़ने का संकल्प ले लिया है। अब इन्हें घेर-घेर कर मारा जाएगा ऐसा देश के आमजन आशा करते हैं । अब इन्हें कोई नहीं बचा सकता ऐसी उम्मीद सभी कर रहे हैं । कश्मीर में हालात खराब भले ही दिख हैं,पर देश को कतई विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय सेना और सुरक्षा बल किसी भी स्थिति से निपटने में पूर्णत सक्षम एवं समर्थ है। आतंकियों के प्रति अब कोई नरमी नहीं होगी। अब कश्मीर की समझदार और कानून प्रेमी जनता को भी राज्य में हालात सामान्य बनाए रखने के लिए सरकार और सेना का साथ देना होगा। क्योंकि, देश विरोधी तत्वों की हरकतों के कारण सामान्य कश्मीरी जनता भी तो त्राहि-त्राहि कर रही है। राज्य में पर्यटन उद्योग पूरी तरह नष्ट हो चुका है। कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प के मशहूर काम-धंधे भी अंतिम सांसें ले रहे हैं। इससे आम कश्मीरी पैसे-पैसे को मोहताज हो चुका है। लेकिन, उन्हें अब इन देश विरोधी ताकतों से दुबक कर रहने की बजाय सामने आकरमुखर विरोध करनाही होगा। इसी में उनकी भलाई है और इसी में उनका और कश्मीर का सुरक्षित और उज्जवल भविष्य भी है। कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद ने तीन पीढियां तो बर्बाद कर ही दीं। आखिर, और कितनी पीढ़ियों का भविष्य कुर्बान होगा। और कश्मीर के उपद्वियों और आतंकियों से लेकर छत्तीसगढ के माओवादियों तक को अब समझ लेना चाहिए कि उनकी जगह कब्रगाह ही है। क्योंकि भारत की 125 करोड़ जनसंख्या देश के एकता और अखंडता के साथ कोई समझौता नहीं करने वाली।

आर.के. सिन्हा, (लेखक राज्य सभा सांसद हैं)

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