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कैसे अपना देश बने मेडिकल टूरिज्म में अव्वल

अपने देश में मेडिकल टूरिज्म यानी विदेशों से इलाज के लिए आने वाले रोगियों और उनके परिवार के लोगों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी और निजी अस्पतालों में लगातार महंगा होता इलाज एक दूसरे से जुड़ी हुई ही बातें हैं। अगर हमारे यहां भी इलाज सस्ता होता रहे तो यकीनन देश मेडिकल टूरिज्म के क्षेत्र में लंबी सफल छलांग लगाने की स्थिति में होगा।
यदि हम इस मोर्चे पर अपने को सुधारने में नाकम रहे तो फिर इलाज के लिए रोगी थाईलैंड, सिंगापुर, चीन और जापान जैसे देशों का ही रुख करने लगेंगे। ये सभी देश विदेशी रोगियों को अपनी तरफ खींचने की चेष्टा तो कर ही रहे हैं। मेडिकल टूरिज्म सालाना अरबों डॉलर का कारोबार है। इस पर भारत को अपनी पकड़ मजबूत बनानी होगी। इस क्षेत्र में भारत के सामने तमाम संभावनाएं हैं। पर संभावनाएं उसी स्थिति में हैं जब हम इन इलाजों के लिए आने वाले पर्यटकों को अलग तरह की बेहतरीन सुविधाएं भी दें।
फिलहाल भारत में इलाज की अमेरिका, जापान, यूरोप या सिंगापुर की तुलना में बेहद कम लागत, उत्तम चिकित्सा तकनीकों और उपकरणों की उपलब्धता के चलते विदेशी यहां पर इलाज के लिए आते हैं। उन्हें यहां पर भाषा की समस्या से भी जूझना नहीं पड़ता। यहां पर अंग्रेजी बोलने वाले हर जगह मिल ही जाते हैं । सभी देशों के लोग अब कामचलाऊ हिंदी भी बोलने लगे हैं। यहां के अस्पतालों में डाक्टर, नर्स और बाकी स्टाफ भी अंग्रेजी बोल लेता है। यानी  विदेशों से आए रोगियों के लिए भारत एक मुफीद स्थान है।  बीते कुछ सालों से इन्हीं विदेशियों की वजह से मुंबई, चेन्नई दिल्ली, एनसीआर, चंडीगढ़ और बेंगलुरु और पुणे के निजी अस्पतालों के कारोबार में तगड़ा इजाफा हुआ है। आप राजधानी के किसी भी प्रतिष्ठित अस्पताल में खुद जाकर देख लें। वहां आपको अनेकों विदेशी रोगी और उनके परिजन बैठे मिल जाएंगे।
भारत में साल 2015 में 2.34 लाख और 2016 में 4.27 लाख विदेशों से रोगी इलाज के लिए आए। इनमें बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले रोगियों का आंकड़ा सर्वाधिक हैं। अरब की खाड़ी देशों के शेखों के लिय भी मुंबई पसंदीदा जगह है। यह जानकारी संसद में दी गई। अफगानिस्तान से साल 2017 में 55,681 रोगी इलाज के लिए भारत आए। इन दोनों पड़ोसी देशों के साथ-साथ, भारत में ओमन,इराक, मालदीव,यमन, उज्बेकिस्तान, सूडान वगैरह से भी रोगी आ रहे हैं। अगर भारत-पाकिस्तान के संबंध सुधर जाएँ तो हर साल सरहद के उस पार से भी हजारों रोगी हमारे यहां इलाज के लिए आने लगेंगे। कुछ तो अब भी आते हैं। कहना नहीं  होगा कि इन रोगियों के भारत में आने से देश को अमूल्य विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। जब भी एक रोगी भारत आता है तो न्यूनतम दो और किसी-किसी संपन्न रोगी के साथ आठ-दस तक परिवार के सदस्य और रोगी की देखभाल के लिए सहयोगी भी आते हैं। ये महीनों होटलों में रहते है और कुछ न कुछ शापिंग भी करते हैं।
पर बड़ा सवाल यह है कि क्या हम मेडिकल टूरिज्म को और गति दे सकते हैं जबकि हमारे यहां के निजी अस्पतालों में मेडिकल लापरवाही और दुर्व्यवहार के केस बढ़ते ही जा रहे हैं? यही नहीं, निजी अस्पतालों में इलाज भी तेजी से क्रमशः महंगा होता जा रहा है। अमरीकी डालर के मुकाबले रूपये का कमजोर पड़ते जाना भी कम भरी समस्या नहीं है। अभी कुछ दिन पहले की बात है कि मुझे एक परिचित बता रहे थे कि फलां-फलां शख्स के इलाज में राजधानी के ही एक निजी अस्पताल ने एक करोड़ रुपये से अधिक का बिल बनाकर थमा दिया। फिर भी रोगी को बचाया नहीं जा सका। अब लगभग हर दूसरे दिन किसी अस्पताल में रोगियों के परिजनों और डॉक्टरों में मारपीट के समाचार भी मिलते रहते हैं। डॉक्टरों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा कर्मी भी रखने चालू कर दिए हैं। डाक्टर और रोगी के संबंध अब पहले जैसे मधुर और सौहार्दपूर्ण नहीं रहे है। अब दोनों के रिश्तों में अविश्वास की दरार खड़ी हो गई है। यह लंबी ही होती जा रही है। डॉक्टरों को लेकर समाज भी अब मानने लगा है कि ये (डॉक्टर) तो उन्हें लूटेंगे ही और ये निर्दयी हो गए हैं। ये सारे आरोप वैसे सच नहीं हो सकते। आखिर अब भी आपको हर शहर, गांव और महानगर में निष्ठावान और ईमानदार डॉक्टर मिलते ही हैं। पर यह भी उतना ही बड़ा और भयानक सच है कि मेडिकल पेशे से जुड़े बहुत बड़ी संख्या में डॉक्टर अपनी जेबें भरने के लिए सारी नैतिकताओं को ताक पर रखने लगे हैं। ये रोगी को एक मजबूर ग्राहक से अधिक कुछ नहीं समझते। इनका एक मात्र लक्ष्य रोगी की जेब से उसकी एक-एक पाई निकाल लेना हो गया है। क्या इन परिस्थितियों में देश का मेडिकल टूरिज्म कभी फल-फूल सकता है? जब डॉक्टर और निजी अस्पताल अपने ही देश के मरीजों का खून चूस लेते हैं, तो क्या वे विदेशों से आने वाले रोगियों को छोड़ते होंगे? इस तरह से सोचने का भी कोई मतलब नहीं है।इस मसले का एक पहलू यह भी है कि विदेशी रोगी डाक्टरों की लापरवाही (मेडिकल नेगलिजेंस) की स्थिति में किसके सामने अपनी व्यथा रखे? विदेश और गृह मंत्रालय को इस बाबत सोचना होगा। वे अधिक से अधिक अपनी यहां पर स्थित एंबेसी से संपर्क भर साधते होंगे। पर एंबेसी की भी अपनी सीमाएं हैं। अगर भारतीय रोगियों के साथ मेडिकल नेगलिजेंस के केस बढ़ रहे हैं, तो विदेशियों के साथ भी होने वाले लापरवाही के केस बढ़ ही रहे होंगे। सरकार को इस दिशा में विचार करके एक इस तरह की एजेंसी स्थापित करनी होगी जो इन विदेशी रोगियों के हितों का ख्याल रख सके। वे इस एजेंसी के पास ठगे जाने और दुर्व्यवहार की स्थिति में संपर्क कर सकें। देश को इनसे से प्राप्त होने वाली विदेशी मुद्रा को लेने भर से आगे भी सोचना होगा। चूंकि, यहां पर मामला मानवीय भी है। कुल मिलाकर मतलब यह है कि विदेशी मेडिकल टूरिज्म के लिए या अपने या परिजनों के इलाज के लिए आये पर्यटकों को न्याय मिले। यह किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि भारत में चिकित्सीय लापरवाही के कारण ना जाने कितने लोगों की जान हर साल चली जाती है। इसके बावजूद उन डाक्टरों के खिलाफ कार्रवाई न के बराबर होती है जो इन मामलों में लिप्त होते हैं। मेरा स्वयं का किडनी की बीमारी के सिलसिले में नई दिल्ली और सिंगापुर के अस्पतालों में महीनों भर्ती रहने का अनुभव है । सिंगापुर जैसे छोटे से देश में मेडिकल सुविधा और रोगियों का देखभाल भारत से कहीं बेहतर है ।  भारत में हृदय रोग, अस्थि रोग, किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट और आंखों के इलाज के लिए सबसे अधिक विदेशी रोगी आते हैं। दुनियाभर में बसे भारतवंशी भी अब यहां पर इलाज के लिए आने लगे हैं। देश के मेडिकल टूरिज्म में नई जान फूंकने के लिए केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य, विदेश और पर्यटन मंत्रालयों को मिल-जुलकर पहल करनी होगी। विदेशी रोगियों को तुरंत वीजा सुविधा देने के साथ-साथ यहां पर उन अस्पतालों पर भी नजर रखने की आवश्यकता है, जहां पर ये इलाज के लिए आते हैं। इन्हें इलाज के लिए तुरंत वीजा देना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
सबसे बदतर हालत नर्सिंग की है। जब आप भारतीय नर्सों को ही सिंगापुर में काम  करते देखन तो उनकी विनम्रता, तत्परता, कर्तव्यनिष्ठा और प्रोफेसनल जानकारी की तारीफ किये बिना नहीं रह सकते। आखिर जब भारतीय नर्सें सिंगापुर जाकर ऐसा व्यवहार कर सकतीं हैं तो अपने देश में क्यों नहीं। बदतमीज और क्रुर व्यवहार करने वाली नर्सों और स्टाफ से छुट्टी तो पाना ही होगा।
मुझे तो एक बात यह भी लगती है कि विदेशी रोगियों का इलाज सरकारी अस्पतालों में ही करने के लिए अलग विंग भी शुरू किया जा सकता है। दिल्ली के एम्स या  राम मनोहर लोहिया जैसे अस्पतालों में भी विदेशी रोगियों का इलाज क्यों नहीं बेहतर ढंग से हो सकता है? इनसे इलाज के बदले में मार्केट दर से पैसा लिया जाए। इस तरह के कदम उठाकर यह सरकारी अस्पताल अपने को आत्म निर्भर बनाने की स्थिति में भी होंगे। और देश की आय भी बढ़ायेंगे और नाम भी ऊँचा करेंगे।
आर के  सिन्हा
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