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महागठबंधन का डूबता जहाज…अखिलेश के बाद ये बड़ी पार्टी हुई अलग

नई दिल्ली। कॉंग्रेस वो पार्टी है जिसने भारत की राजनीति में सबसे ज्यादा राज किया है। कांग्रेस का कद क्या है इस बात का अंदाजा हर किसी को है। कुछ कांग्रेस के समर्थक कांग्रेस की तुलना भगवान ब्रह्मा से करते है वो कहते हैं जिस प्रकार सभी देवी- देवताओं का वास ब्रह्मा में हैं औऱ ब्रह्मा तीनों देवो के प्रमुख है उसी प्रकार लोकतांत्रिक भारत में सर्वोत्तम कांग्रेस है। भारत की राजनीति में कांग्रेस से ही आज की वर्तमान पार्टियां निकली हैं। कांग्रेस कभी खत्म नहीं हो सकती।
जब हिल गयी कांग्रेस पार्टी की नीवं
दशकों से भारतीय राजनीति में राज करने वाली पार्टी की नीवं 2014 में तब हिल गई जब देश की जनता ने नया इतिहास रचा। देश में पहली बार कांग्रेस के अलावा किसी और राजनीतिक दल को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला था। वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था और मोदी ने देश के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। देश भर में मोदी की लहर दौड़ रही थी। ये कहना मुश्किल है कि देश भर में मोदी लोकप्रिय थे या कांग्रेस से लोग परेशान थे लेकिन चुनावी नतीजों ने ये स्पष्ट कर दिया दी कि कांग्रेस के प्रति जनता कुछ भी सोचती हो लेकिन मोदी को जनता ने बहुत प्यार दिया और उन पर विश्वास किया। और 5 सालों के लिए देख के सिंहासन पर बिठा दिया देश की सेवा करने के लिए। 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने देश को कांग्रेस मुक्त करने का अभियान चलाया और मोदी की लहर के दम पर बीजेपी ने देश के 85 प्रतिशन राज्यों में अपनी सरकार बनाई। आज देश के 29 राज्यों में से बीजेपी की सरकर 19 राज्य में है। और बचे हुए राज्यों में कांग्रेस का हालात अच्छे नहीं हैं।
बीजेपी के बढ़ते कद को रोकने के लिए महागठबंधन
2019 के आम चुनावों से पहले मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन का रूप तैयार किया गया। देशभर की विपक्षी पर्टियों ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में साथ फोटो खिचवाकर मोदी को ललकारा। कांग्रेस ने कर्नाटक में अपनी लाज बचाई और मोदी को चेताया कि उनकी 2019 के लोकसभा चुनाव की राह आसान नहीं है। कर्नाटक का यह चुनाव सिर्फ एक राज्य भर का मसला नहीं रहा। इस चुनाव और उसके बाद हुए घटनाक्रम ने देश को अगले आम चुनावों की एक तस्वीर दिखाने की कोशिश की।
एक- एक कर के छोड़ रहै महागठबंधन साथ
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस ज्यादा की उम्मीद न करे। अखिलेश यादव ने सीटों के बंटवारे पर अपना रुख स्पष्ट किया। अखिलेश ने कहा, यूपी में फिलहाल एसपी, बीएसपी और आरएलडी एक साथ हैं। जो सीटें बचेंगी उसमें से कांग्रेस को भी सीटें मिलेंगी।’ ऐसे में सवाल ये है कि यूपी में राहुल और अखिलेश के बीच आखिर क्यों सहमति नहीं बन पा रही। क्या अखिलेश यादव को राहुल गांधी का साथ पसंद नहीं है या फिर वो अपने बयानों से यूपी में कांग्रेस की सियासी हैसियत याद दिला रहे हैं?
फिलहाल यूपी में अखिलेश यादव और राहुल के बीच किस बात का कोल्ड वार चल रहा है ये तो आने वाले वक्त में साफ हो जाएगा। और देखा जाए तो कई हद तक ये साफ दिखाई दे रहा है कि आने वाले चुनाव में अखिलेश यादव महागठबंधन का हिस्सा न भी रहे क्योंकि जिस तरह वो राहुल गांधी के राजनीतिक चाल-चलन पर उंगली उठा रहे है उससे यही साबित हो रहा है कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं और इसी बात का फायदा बीजेपी को आने वाले चुनावों में मिल सकता हैं।
दरअसल, इस समय सच्चाई तो यही है कि मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी इस स्थिति में नहीं दिख रहे हैं कि उनके नेतृत्व में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का मुकाबला किया जा सके। 2014 के लोकसभा चुनावों से लेकर अब तक सिर्फ पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है। कांग्रेस सिर्फ अमेठी और रायबरेली के अपने गढ़ में सिमटी हुई है, इसलिए अखिलेश यादव उसे ज्यादा तवज्जो नहीं देना चाहते।
राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब टूटा
राहुल गांधी अपनी विरासत में मिली कांगेस पार्टी के दम पर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे लेकिन 2014 में उनका ये ख्वाब चखनाचूर हो गया। लेकिन राहुल गांधी का टूटे हुए सपनों ने एक बार फिर दम भरा लेकिन इस बार कांग्रेस के दम पर नहीं महागठबंधन के दम पर। लेकिन समय के साथ साथ ये ख्वाब भी टूटता दिखाई दे रहा है क्योंकि कांग्रेस पर न सिर्फ सपा प्रमुख अखिलेश यादव दबाव बनाते दिख रहे हैं बल्कि अन्य छोटी-छोटी पार्टियों ने भी इसी तरह की प्रेक्टिस शुरू कर दी है। लगातार चुनाव हारती कांग्रेस अब यूपी में तो छोटी पार्टियों के सामने भी बौनी नजर आ रही है। सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के साथ आने से बीजेपी के घोर विरोधी दल भी परहेज करने लगे हैं। ममता बनर्जी, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू, अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेता थर्ड फ्रंट को मजबूती से आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं और कांग्रेस को इग्नोर कर रहे हैं।

केजरीवाल ने भी छोड़ा महागठबंधन का साथ
केजरीवाल ने महागठबंधन को बड़ा झटका दिया है। कर्नाटक में फोटो खिंचानें के बाद अब जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे है वैसे -वैसे पार्टियां उनका साथ छोड़ रही हैं। केजरीवाल ने ये साफ कर दिया की उनकी पार्टी अकेले ही लड़ेगी। वह बीजेपी के खिलाफ बनी संभावित महागठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी। केजरीवाल ने कहा कि जो पार्टियां संभावित महागठबंधन में शामिल हो रही हैं, उनकी देश के विकास में कोई भूमिका नहीं रही है। हालांकि केजरीवाल का यह ऐलान राजनीतिक गलियारे के लिए थोड़ा अप्रत्याशित जरूर है। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर AAP ने खुद को एनडीए के खिलाफ विपक्षी एकजुटता के साथ दिखाने की कोशिश की है।
कांग्रेस और राहुल की छवि का सवाल! 
कांग्रेस के साथ पार्टी और पार्टी अध्यक्ष की इमेज से भी जुड़े सवाल हैं। दरअसल, बीजेपी सबसे ज्यादा कांग्रेस को टारगेट करती है तो इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है। भाजपा में ही कुछ लोग यह मानते हैं कि जब तक कांग्रेस के पास राहुल गांधी जैसा नेतृत्व रहेगा, तब तक हमारे लिए कांग्रेस का मुकाबला करना बेहद आसान रहेगा। राजनीति के कई जानकार नरेंद्र मोदी की इतनी बड़ी छवि के लिए राजनीतिक तौर पर उनके सामने खड़े राहुल गांधी की कमजोर छवि को जिम्मेदार बताते हैं। बीजेपी अन्य पार्टियों के मुकाबले बहुत आसानी से भ्रष्टाचार एवं अन्य मसलों पर कांग्रेस को घेर लेती है। बीजेपी ने राहुल गांधी की इमेज अभी नौसिखिए की बनाई हुई है। इसलिए कांग्रेस से दूरी बनाकर मोदी के सामने खड़े होने की कोशिश हो रही है।
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