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बिजली आपूर्ति: ज़ोर का झटका जो धीरे से लगे

भारतवर्ष में विद्युत की शुरुआत का इतिहास वैसे तो 24 जुलाई 1879 में कोलकता से संबंधित बताया जाता है जबकि बिजली से होने वाले चमत्कारों अथवा उपयोगों का प्रदर्शन मुंबई में 1882 में हुआ। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भारत में विद्युत का विस्तार कितनी गति से हुआ इसका अंदाज़ा केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की स्वतंत्रता के समय अर्था्त् 1947 में पूरे भारतवर्ष में मात्र 1500 गांवों तक ही बिजली पहुंच सकी थी। आज यही भारतवर्ष न केवल देश के अधिकांश गांवों में बिजली पहुंचा चुका है बल्कि अपने पड़ोसी देशों को भी बड़ी मात्रा में विद्युत की आपूर्ति कर रहा है। देश में इस समय विभिन्न प्रकार के बड़े से बड़े पॉवर प्रोजेक्ट स्थापित किए जा चुके हैं। विद्युत आपूर्ति की निरंतरता में भी आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है। बिहार,मध्यप्रदेश व उड़ीसा जैसे कई राज्य जो बिजली की अत्यधिक कमी से जूझ रहे थे वहां भी बिजली अब अपनी पहुंच बना चुकी है। पिछले कुछ दिनों से देश के कई राज्यों में विद्युत विभाग अथवा विद्युत निगम या विद्युत मंडल आदि राज्य सरकारों के अधीन चलने वाले उपक्रम बिजली की चोरी रोकने तथा निर्बाध रूप से जनता को बिजली आपूर्ति करते रहने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। बिजली की चोरी को रोकने के उद्देश्य से देश के कई राज्यों में बिजली के मीटर घरों की चाहरदीवारी से बाहर निकालकर लगाए जा रहे हैं। कई जगहों पर तो यह मीटर मकान के बाहरी हिस्से की दीवार या गेट पर ही लगा दिए गए हैं तो हरियाणा जैसे कई राज्यों में बिजली के इन मीटरों को बिजली के खंभों पर लगाया गया है। मकानों की संख्या के मुताबिक एक-एक पोल पर दो से लेकर 12-16-18 और 20 मीटर तक लगा दिए गए हैं। इन मीटरों के बॉक्स के रूप में प्लास्टिक के एक बड़े डिब्बे का इस्तेमाल किया गया है और इस डिब्बे को लोहे की हल्की पत्ती व पतले से नट-बोल्ट के साथ लटका दिया गया है। गत् लगभग 4 वर्षों से चल रहे इस मीटर बाहर निकाल अभियान का नतीजा क्या सामने आ रहा है यह शहरों में बिजली के खंभों पर लगे मीटरों को देखकर स्वयं पता चलता है। जहां देखिए मीटर के बॉक्स लटके पड़े हैं। दिन-रात धूप व बारिश का सामना करने की वजह से उनका प्लास्टिक भी कमज़ोर हो गया है और लोहे की पत्तियां व बोल्ट ज़ंग खाकर कमज़ोर हो गए है। उधर सोने में सुहागा यह कि गली-मोहल्लों में घूमने वाले आवारा पशु खासतौर पर गाय व सांड प्राय: इन्हीं बिजली के खंभों से अपनी पीठ रगड़ते दिखाई देते हैं। कई बार इन्हें अपनी सींग से मीटर के साथ कुश्ती लड़ते भी देखा जा चुका है। क्या बाहर खंभों पर सरकार द्वारा लगाए गए इन लावारिस मीटरों को सांड व गाए के सींग से बचाने की कोई व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है। यह स्थिति कितने बड़े हादसे को जन्म दे सकती है। इन हालात में गाय व सांड की जान जाने के अलावा एक साथ कई घरों की बिजली $खराब होने व सप्लाई केबल जलने का खतरा बना रहता है।
सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश विद्युत मंडल द्वारा घर के बाहर लगाए जाने वाले मीटरों को लेकर वहां की जनता में भारी रोष व्याप्त है। मध्यप्रदेश की जनता की शिकायत है कि उनके मीटर घर से बाहर लगते ही कई गुना ज़्यादा रीडिंग बताने लगे। इसका कारण यह भी बताया जा रहा है कि जो मीटर बाहर लगाए गए उनपर साफतौर पर कंपनी द्वारा यह अंकित किया गया है कि इस मीटर का प्रयोग 27 डिग्री सेल्सियस तक के अधिकतम तापमान पर ही किया जाना चाहिए। जबकि देश के पर्वतीय क्षेत्रों को छोडक़र शेष भारत में 27 डिग्री तापमान तो केवल शरद ऋतु में ही रहता है। ऐसे में यदि यही मीटर धूप में खंभों पर या दीवारों पर लगाए गए हैं और 27 डिग्री से ऊपर 48 व 50 डिग्री तक के तापमान का सामना कर रहे हैं ऐसे में बिजली मीटर निर्माता कंपनी के अनुसार ही उनकी रीडिंग भरोसेमंद नहीं कही जा सकती। क्या सरकार को नहीं चाहिए कि वह मीटर निर्माता के निर्देश के अनुसार ही मीटरों को स्थापित करवाने की व्यवस्था करे। मध्यप्रदेश के ही संदर्भ में एक बात और काबिल-ए-जि़क्र है कि इस राज्य में शिवराज सरकार ने मीटर घर के बाहर लगवाने का जि़म्मा जिस कंपनी को सौंपा है वह कंपनी विश्व बैंक की काली सूची में दर्ज है। फिर एक ब्लैकलिस्ट कंपनी को काम देने के आखिर क्या मायने हैं। इससे भी दर्दनाक बात यह है कि इन बढ़े हुए बिजली के बिल की वजह से अब तक मध्यप्रदेश के कई गरीब,मज़दूर आत्महत्या तक कर चुके हैं।
इस संदर्भ में एक बात और बेहद काबिल-ए-गौर है। देश में विभिन्न राज्यों में बिजली के बिल की वसूली के अलग-अलग नियम बनाए गए हैं। कुछ राज्यों में यह बिल प्रतिमाह आता है तो कुछ राज्यों में दो महीने के अंतराल पर बिजली का बिल दिया जाता है। जबकि बिहार जैसे राज्य में सबसे आधुनिक तरीके से बिजली का बिल वसूल किया जाता है। बिहार में मीटर रीडिंग करने वाला व्यक्ति प्रत्येक माह जब मीटर रीडिंग करने आता है उस समय वह मीटर की फोटो खींच लेता है। उसके बाद ताज़ातरीन मीटर रीडिंग तक का पूरा बिल उसी समय वह अपने साथ रखी छोटी सी मशीन से निकाल कर उपभोक्ता को दे देता है। परंतु हरियाणा में जिस प्रकार दो महीने के बिल की वसूली की जाती है उससे यहां की जनता खुद को ठगा हुआ सा महसूस करती है। इसका कारण यह है कि हरियाणा में बिजली की दर की जो श्रेणियां बनाई गई हैं उन्हें पांच अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी 0 से 150 यूनिट तक की है जिसका भुगतान 4 रुपये 50 पैसे प्रति यूनिट के हिसाब से करना होता है। दूसरी श्रेणी 151 से 250 यूनिट की है जिसकी दर पांच रूपये 25 पैसे प्रति यूनिट है। तीसरी श्रेणी 251-500 के मध्य की खपत की है जिसका मूल्य 6 रुपये 30 पैसे प्रति यूनिट है। चौथी श्रेणी 501-800 यूनिट की है। जिसकी दर 7 रुपये दस पैसे प्रति यूनिट है।
सवाल यह है यदि बिजली का बिल प्रतिमाह उपभोक्ताओं को दिया जाए तो निश्चित रूप से उनकी मीटर रीडिंग दो महीने के बाद दिए जाने वाले बिजली के बिल की तुलना में आधी ही आएगी। परंतु हरियाणा की तरह और भी कई राज्य ऐसे हैं जो उपभोक्ताओं को दो माह के बाद बिजली का बिल प्रेषित करते हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं की मीटर रिडिंग का मंहगी श्रेणी की ओर बढऩा स्वाभाविक है। क्या दो माह बाद बिजली का बिल वसूलने का फरमान जनता की जेब हल्की करने का कारक नहीं है। इस मामले में एक बार फिर बिहार की व्यवस्था प्रशंसा के योग्य है। वहां राज्य सरकार ने उपभोक्ताओं को इतनी अधिक सुविधा दे रखी है कि वे अपने बिल का भुगतान अपनी सुविधा के अनुसार जब और जितना चाहें अपने निकटस्थ फ्रेंचाईज़ी के पास जाकर कर सकते हैं या फिर ऑन लाईन भी अपनी मज़बूर की रकम जमा कर सकते हैं। जबकि हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों में या तो पूरा बिल जमा करना पड़ता है या फिर बिल को दो हिस्सों में जमा कराने के लिए एसडीओ महोदय के द्वार पर गिड़गिड़ाना पड़ता है और यह उनकी मजबूरी पर है कि वह ग्राहक को दो बार में बिजली के बिल का भुगतान करने की सुविधा दें अथवा न दें। इसके अतिरिक्त बिल के बक़ाया भाग पर बाकायदा सरकार ग्राहक से ब्याज भी वसूलती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बिजली का निरंतर होता विस्तार देश के नागरिकों की सुख-सुविधा के लिए किया जा रहा है तथा देश को प्रकाशमय करने व विकास की राह पर तेज़ी से दौड़ाने की गरज़ से किया जा रहा है या इसका मकसद देश की जनता को झटके देना है। सरकार को अपनी नीतियों के द्वारा यह बात स्पष्ट करनी चाहिए।
निर्मल रानी
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