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दुनिया के देशों में कहां हमारे उच्च शिक्षण संस्थान

टाइम्स हायर एजुकेशन वल्र्ड यूनिवर्सिटी की इसी माह जारी रिपोर्ट भारतीय उच्च शिक्षण संस्थाओं की पोल खोलने के लिए काफी है। हांलाकि संतोष इस बात पर किया जा सकता है कि इस रिपोर्ट में भविष्य के लिए आशा की किरण भी दिखाई दे रही है। दुनिया के एक हजार शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता को लेकर जारी इस रिपोर्ट में सबसे निराशाजनक यह है कि एक ओर तो भारतीय शिक्षण संस्थाओं के स्तर में गिरावट देखी गई है वहीं दुनिया के शीर्ष 250 शिक्षण संस्थानों में देश का एक भी विश्वविद्यालय अपना नाम दर्ज नहीं करा पाया है। मजे की बात यह है कि जिन आईआईटी और आईआईएम पर हमें गर्व है वे भी अपनी रेंकिंग बचा नहीं पाए हैं। इण्डियन इंस्टीट्यूट आॅफ सांइस 201 से 250 की श्रेणी से बाहर होकर 250 से 300 की श्रेणी में चला गया। कानपुर की बात करे या दिल्ली-मद्रास आईआईटी की तीनों ही 500 से 600 की श्रेणी मेें चले गए हैं। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय 601 से 800 की श्रेणी मेें आ गया है। आखिर यह सब क्या हो रहा है? यह सही है कि इस सबके लिए केवल सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
दुनिया मंे विश्व गुरू के नाम से जाने जाने वाले हमारे देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर गिरावट होना बास्तव मंे चिंता का विषय है। दुनिया के श्रेष्ठ पहले छह विश्वविद्यालयों में आॅक्सफोर्ड जहां पहले स्थान पर काबिज है वहीं बिट्र्ेन के ही कैंब्रिज और शेष चार स्थान पर अमेरिका के कैलिफोर्निया, स्टेनफोर्ड, मैसाच्युसेट्स और हावर्ड कायम है। ऐसे में प्रय6श्न यह उठता है कि हमारे विश्वविद्यालय दुनिया के प्रमुख शिक्षण संस्थानों के सामने बौने क्यों साबित हो रहे हैं? आखिर क्या कारण है कि सवा सौ करोड़ से अधिक जनशक्ति वाले देश और जिसमें भी अब सबसे अधिक युवा शक्ति का वर्चस्व है, ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा?
दरअसल हमारें संस्थान धीरे-धीरे राजनीति और केवल और केवल केरियर बेस अध्ययन केन्द्र बनते जा रहे हैं। एक और विश्वविद्यालय राजनीति के अड्डे बनते जा रहे हैं तो दूसरी और सामाजिक बदलाव के चलते केवल पैसा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य होने की मान्यता के चलते स्थितियों मेें काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। यह सही है कि देश में उच्च शिक्षण संस्थाओं की काफी कमी है। जनसंख्या के हिसाब से जितने विश्वविद्यालय होने चाहिए उतने विश्वविद्यालय नहीं है, दूसरी और विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के रिक्त रहने वाले पदो ंके कारण भी शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होती है। केवल एक प्रतिशत ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। यह भी सही है कि दुनिया के विश्वविद्यालयों में हमारे देश नीचे से 15 विश्वविद्यालयों में आता है। दूसरी देश में ही तस्वीर यह भी उभर रही है कि इंजीनियरिंग काॅलेजों व एमबीए के पास आउट्स को पर्याप्त संख्या में रोजगार भी नहीं मिल पाने से निराशा साफ सामने आने लगी है। हांलाकि पासआउट्स शिक्षा देखा जाए तो शिक्षण संस्थानांे खासतौर से उच्च शिक्षा केन्द्रों में मुख्य तौर से शिक्षण, शोध और नवाचार पर बल दिया जाना चाहिए। हांलाकि इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि हालिया रिपोर्ट में आशा व्यक्त की गई है कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में शोध और गुणवत्ता के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों का परिणाम आने वाले दिनों में दिखाई देगा।
भारत को विश्व गुरु माना जाता रहा है। ज्ञान-विज्ञान में हम अपने आप को श्रेष्ठ मानते भी रहे हैं। आदि काल से ही शिक्षण प्रशिक्षण हमारी परंपरा रही है। तक्षशिला और नालंदा जैसे ख्यातनाम विश्वविद्यालयों को ज्ञान का केन्द्र माना जाता रहा है। शिकागों में ज्ञान का विगुल बजाने वाले विवेकानन्द के देश का आज एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के प्रमुख 250 विश्वविद्यालयांे की सूची में नहीं होना शर्मसार करता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे युवा विदेशों में अध्ययन के लिए जा रहे हैं। विदेशी डिग्रीयों को महत्व दिया जा रहा है। एक जमाना था जब चीन व अन्य देशों से हमारे यहां अध्ययन के लिए आते थे। फाहियान, व्हेनसांग आदि चीनी यात्री दरअसल अध्ययन के लिए भारत आए। आज देश में शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। काॅलेज और विश्वविद्यालयों की संख्या में दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है। शिक्षा में निजी क्षेत्र का प्रवेश हुआ है। पर इस विस्तार में शिक्षा के मायने कहीं खोते जा रहे हैं। एक समय था जब निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों की अपनी विशिष्ठ पहचान होती थी, पिलानी का तकनीकी अध्ययन केन्द्र, बनस्थली विद्यापीठ आदि ऐसे केन्द्र रहे हैं जिनकी आज समूचे देश में पहचान है। आईआईएम व आईआईटी केन्द्रों की आज भी पहचान है पर कहीं अन्तरराष्ट्रीय मानकों पर हम पिछड गए लगते हैं। परचूनी की दुकानों की तरह प्रतिदिन नए खुल रहे विश्वविद्यालयों और काॅलेजों में शिक्षा के स्तर को बनाए रखने के प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इंजीनियरिंग और प्रबंधन जैसे विषयों में प्रवेश के लिए बच्चे नही मिल रहे है। सीटे खाली रह जाती हैं और इन कालेजों में ऐनकेन प्रकारेण सीटे भरने के प्रयास किए जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। शिक्षा विदों और नीति निर्माताओं को इसके कारण खोजने होंगे। शिक्षा के स्तर को विश्वस्तरीय बनाने के प्रयास करने होंगे नहीं तो सवा अरब के देश में दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में स्थान नहीं बनाना हमारे लिए शर्मनाक ही है। लगता है मानव संसाधन विकास मंत्रालय शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधार व शिक्षण संस्थानों मेें अन्तरराष्ट्रीय स्तर की आधारभूत सुविधाओं के लिए कारगर प्रयास करेगा जिससे भारत अपनी खोई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सके। आधुनिक प्रोद्योगिकी और ज्ञान की तकनीक को अपनाते हुए शिक्षा के स्तर को शीर्ष पर ले जाने के लिए जुटना होगा ताकि हमारी भी शिक्षण संस्थानों को विश्व के प्रमुख शिक्षा केन्द्रों के रुप में पहचान हो सके।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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