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कर्ज के मकड़़जाल में दम तोड़ती जिंदगियां

आजादी के सात दशक बाद भी देश में कर्ज की अंतिम परिणती मौत को गले लगाना ही हो तो इससे अधिक दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक क्या हो सकता है। पिछले दिनों ही कर्ज के बोझ तले डूबे जयपुर में एक ही परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सामूहिक आत्म हत्या या दो दिन पहले ही एक बिल्डर द्वारा नींद की गोलियां खाकर आत्म हत्या का प्रयास के संकेत साफ है। देश का शायद ही कोई कोना होगा जहां कर्ज के बोझ तले डूबे लोगों में से आए दिन किसी ना किसी द्वारा इहलीला समाप्त करने के साथ ही सुसाइड नोट में कर्ज के दर्द की दास्तां देखने को ना मिलती हो। अब तो स्थिति यहां तक होने लगी है कि लोग दूसरी जगह होटलों आदि में जाकर आत्म हत्याएं करने लगे हैं। देश में इस तरह की घटनाएं आम है। इस सबका का एक बड़ा कारण बाजार में अत्यधिक पैसे का आना, लोगों का रातोंरात रईश बनने का सपना, उंचे ख्हाब देखना ही तो है। मजे की बात यह है कि देश में बैंकिंग क्षेत्र में इतने विकास और आसान शर्तों पर कर्जें की सरकारी घोषणाओं के बावजूद सूदखोरों को जाल फैला हुआ है तो यह सरकार और समाज दोनों के लिए शर्मनाक स्थिति है। आजादी के पहले के आंचलिक साहित्य और आजादी के बाद के जमाने की गोदान, दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों के माध्यम से सूदखोरों के चंगुल में एक बार फंसने के बाद उनकी ज्यादतियों और कर्ज के जाल में पीढ़ी दर पीढ़ी फसंने की रोंगटे खड़ी करने वाली दास्तानें यदि आज भी देखने को मिलती है तो फिर आजादी का कोई मायना नहीं हो सकता। हांलाकि इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता बल्कि ज्यादा दोष तो समाज के बदलते मानकों को जाता है। एक समय था जब समाज में ईज्जत ही सबकुछ होती थी ठीक इसके विपरीत आज पैसा ही सबकुछ होने लगा है। ऐसे में लोगों का ज्यादा से ज्यादा धन जल्दी से जल्दी बटोरने की धुन सवार होती है और इसके लिए उल्टे सीधे कामों के साथ ही कर्ज के जाल में फंस कर जीवन दुभर करना भी शामिल है।
कर्ज के जाल में फंसकर आत्म हत्या की घटनाओं से जुडे़ लोग मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग के रहे हैं। पर देश दुनिया में सूदखोरों के चंगुल से बचाकर गरीब और साधनहील लोगों की रुपए पैसे की जरुरतों को पूरा करने के लिए सारी दुनिया चिंतित रही है। बांग्लादेश में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से माइक्रो फायनेंस का प्रयोग एक सीमा तक सफल रहा और समूहों का बैंक तक संचालित होने लगा। हमारे देश में भी 90 के दशक में स्वयं सहायता समूहों का कंस्पेट तेजी से उभरा और आंध्रप्रदेश व बंगाल में इसी गरीबी के विरुद्ध लड़ाई का सशक्त हथियार माना जाने लगा। आंध्रपदेश को इसका रोलमाॅडल भी माना गया। इसके बाद नाबार्ड ने भी स्वयं सहायता समूहों के गठन कर वित्तीय समावेशन के काम को गति देने का प्रयास किया। स्वयं सहायता समूहों का बैकां से जोड़ा गया। यह भी माना गया कि स्वयं सहायता समूहों में चूंकि सामाजिक सरोकार जुड़े होते हैं इसलिए इनकी वसूली भी लगभग शतप्रतिशत तक हो जाती है। वैसे भी यह माना जाता है और सत्य भी है कि गरीब आदमी का सोच यही होता है कि वह कर्ज में नहीं मरे और दूसरा यह कि बच्चोें पर कर्ज का बोझ ड़ाल कर ना जाए। यह भी एक कारण रहा कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वित्तीय समावेशन का सपना देखा गया हांलाकि समय के बदलाव के साथ स्वयं सहायता समूहों द्वारा वितरित ऋणों की वसूली के स्तर में भी आज तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है और अब तो यह माॅडल भी अपने उद्देश्यों में विफल होता दिखने लगा है।
प्रश्न यह उठता है कि देश में गरीब और साधनहीन लोगों के साथ ही कारोबारियों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की सरकारी गैरसरकारी बैंकों की योजनाओं के बावजूद सूदखोरों का रेकेट देश के सभी इलाकों में जारी है। गांवों में ही नहीं शहरों में भी खासतौर से निम्न व मध्यमवर्गीय इलाकों में इस तरह के रेकेट जारी है। यह रेकेट लोगों की उंची ब्याजदर का सपना दिखाकर खासतौर से इन वर्ग के लोगों की बचत को ले जाते हैं और फिर रातों रात अपनी दुकान बंद कर चूना लगा देते हैं। सब्जी मंडियों, गलियों के छोटे वेंडर्स के इलाकों में इस तरह के सूदखोरों के रेकेट सक्रिय रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इनसे कोई अंजान हो पर सहज उपलब्धता और तत्काल पैसा उपलब्ध कराना ही इनकी ताकत है। दूसरी और सरकार द्वारा विभिन्न विभागों व बैंकों के माध्यम से आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराने की योजनाएं घोषित की जाती है। लक्ष्य जारी होते हैं लक्ष्य पूरे भी दिखाए जाते हैं पर उसके बाद भी सूदखोरों की दुकाने मजे से चल रही है।
उदारीकरण के बाद से ही रोजगारपरक कार्यों के लिए ऋण वितरण की बहुत से योजनाएं आई है। मोदी सरकार ने मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री रोजगार गांरटी योजना, स्टार्ट अप आदि योजनाएं लाकर बैंकों का मुंह जरुरतंद लोगों की और मोड़ा है पर कर्ज देने वालों की दुकाने आज भी वैसे ही चल रही है। यह सब तो तब है जब बैंक लोन मेले लगाते हैं, योजनाओं की जानकारी देते हैं उसके बाद भी सबकी ऋण जरुरते पूरी नहीं हो पाती है।
आजादी के बाद भी कर्जदारी के इस मकड़जाल को नहीं तोड़ पाना जहां हमारी व्यवस्था के लिए चुनौती है वहीं कहीं ना कही बैंकिंग व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह उभारती है। बैंकिंग संस्थाओं द्वारा ऋण, साख सीमा, वर्किंग केपिटल आदि के लिए ऋण, माइक्रो फायनेंस के बावजूद सूदखोरों की दुकान चलने का साफ साफ अर्थ यह है कि लक्षित वर्ग या योें कहें कि जरुरतमंद लोगों की इन संस्थाओं तक सहज पहुंच नहीं हो पा रही है। वित्तदायी संस्थाओं को अपनी प्रक्रिया मेें बदलाव लाना होगा ताकि लोगों तक आसानी से ऋण सुविधा पहंुच सके। आसानी से ऋण-साख सुविधा मिलेगी तो इसका लाभ जहां बैंकों को ऋण विविधिकरण के रुप में होगा वहीं यह साफ है कि इस वर्ग को वितरित ऋण कम से कम डूबने की संभावना भी लगभग शून्य स्तर पर ही होगी। वैसे भी इस पोर्टफोलियों में वितरित होने वाले ़ऋण की मात्रा कम ही होती है ऐसे में लाखों करोड़ों रुपए की एनपीए में डूबत खातों में पड़े ऋण की तुलना में यह ऋण सुविधा नीचले स्तर पर रोजगार सृजन, वित्तीय समावेशन और नीचले स्तर तक आर्थिक विकास की राह को प्रशस्त करने में सहायक होगा। सरकार को सूदखोरों के रेकेट को समाप्त करने के लिए बैंकिंग व्यवस्था को सहज और सरल बनाना की दिशा में कुछ ठोस प्रयास करने ही हांेगे।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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