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बीच चैराहे युवाओं का बढ़ता आक्रोश

बीच चैराहे युवाओं का बढ़ता आक्रोश राजधानी दिल्ली में एक युवक का सिगरेट की धुआं के छल्ले के लिए टोकना इतना भारी पड़ गया कि उसे अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। आज की पीढ़ी में बढ़ रही असहिष्णुता का यह कोई इकलोता उदाहरण नहीं है। जनवरी से अब तक राजधानी दिल्ली में ही टैटू का मजाक उड़ाने, गोल गप्पे नहीं खिलाने, आपसी कहासुनी या रास्ते में हल्की कहासुनी की अंतिम परिणती मौत के रुप में देखने को मिली। यानी की जरा सी बात पर मौत के घाट उतारना आज आम होता जा रहा है। यह तो केवल राजधानी के उदाहरण है। इस तरह के उदाहरण आपको आए दिन देश के किसी भी शहर में देखने को मिल जाएंगे। आखिर इतना संवेदन क्यों होता जा रहा है आज का युवा? आज देश का कोई भी हिस्सा इस तरह की घटनाओं से अछूता नहीं हैं। बीच चैराहों पर रोड़रोज की घटनाएं ना केवल चिंतनीय है बल्कि आज के युवाओं की मानसिकता व गिरती संवेदनशीलता को दर्शाती है। जरा सी बात पर एक दूसरे की जान तक ले लेना आम होता जा रहा है। आखिर यह सब हो क्या रहा है? क्या किसी की जान की कोई कीमत ही नहीं हैं? सवाल यह है कि आखिर आज का युवा छोटी सी बात पर ही इतना भड़क क्यो जाता है? गुस्से में उसे आगे-पीछे का भी ध्यान नहीं रहता और सामने वाले की जान लेने तक आमादा हो जाना सवाल उठाता है कि आज की युवा पीढ़ी आखिर जा कहां रही है? गाड़ी को साइड़ नहीं देने, मामूली से टच हो जाने, सड़क पर जाम लगे होने के कारण आगे वाले द्वारा गाड़ी को जल्दी नहीं निकालने, गाड़ी आगे कैसे चल रही है, हाॅर्न कैसे बजा दिया, जल्दी जाने का तनाव और ऐसे छोटे-छोटे कारणों से आज के युवा पर गुस्सा इस कदर हाबी हो जाता है कि बात लड़ाई-झगडे, गाली-गलोच तक ही सीमित नहीं रहती, बल्की गुस्से में टक्कर मारने, हाथा-पाई करने, जान लेवा हमला करने तक बढ़ने लगी है। दूसरे की जान तक ले लेना आम होता जा रहा है। आखिर यह सब हो क्या रहा है, आज के युवाओं को? सड़क पर रोडरेज की घटनाएं बढ़ती जा रही है। हालात यह हो गए है कि देश में होने वाले कुल सडक हादसों में 60 फीसदी मौते रोड रेज के कारण होती है। यह कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है और ना ही यह केवल हमारे देश की समस्या है, पर जिस तरह से रोडरेज की घटनाएं बढ़ रही है वह बेहद चिंतनीय है।  वैसे तो देश-विदेश के हर कोने में रोडरेज की घटनाएं हो रही है। इस शब्द का ईजाद भी मीडिया ने ही किया है। 1980 के दशक में यूएसए के लाॅस एंजिल्स व केलिफोर्निया के टीवी समाचार वाचकों ने सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग शुरु किया। रोड रेज का सीधा-सीधा अर्थ सड़क पर आक्रोशित होकर आक्रामक व्यवहार करना या अनावश्यक रुप से गुस्से का इजहार करना है। वाहन को असामान्य तरीके से चलाना, एकाएक ब्रेक लगाना, दूसरे वाहन के पीछे झटके से गाड़ी को रोकना, असामान्य तरीके से हाॅर्न बजाना, अनावश्यक रुप से आगे जाने की होड़, दूसरे के वाहन को टच करना, तेज रोशनी कर गाड़ी चलाना, सड़क पर स्टंट करना या इसी तरह की गतिविधियां करते हुए सामने वाले से लड़ने को तत्पर रहना रोडरेज की श्रेणी में आता है। वैसे तो रोडरेज की घटनाएं सामान्य है पर अब दिल्ली सहित महानगरों में तो इस तरह की घटनाएं आम होती जा रही है। एक मोटे अनुमान के अनुसार सड़क हादसों में 60 प्रतिशत मौते रोडरेज के कारण होती है। 42 फीसदी मामलांे में दो वाहनों के चालक छोटी सी बात पर आपस में भी़ड़ जाते हैं। 33 फीसदी मामलों में कार चालक दुपहिया चालक से लड़ने पर आमादा हो जाते हैं। यह भी सही है कि रोडरेज के 70 फीसदी मामलें तो दर्ज ही नहीं होते। लड़ते-झगड़ते वाहन चालकों को उनका गुबार निकालने के बाद आपसी समझाइश से उस जगह से रवाना कर दिया जाता है। यह दूसरी बात है कि जाते-जाते भी एक दूसरे को देख लेने की धमकी देना नहीं भूलते।  2014 में दिल्ली के एम्स व लेडी हाॅर्डिंग द्वारा कराए गए एक सर्वे में यह सामने आया है कि वाहन चलाते समय युवाओं में गुस्से की मात्रा अधिक हो जाती है। यही नहीं सड़क पर यातायात जाम होने, बेतरतीब यातायात, गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर काॅल आना, खराब सड़के, बारबार लाल बत्ती से सामना, तेज हाॅर्न, गलत तरीके से पार्किग, काम का दबाव, समय पर पहंुचने का दबाव व निजी कारणो से व्यक्ति तनाव में आ जाता है और यह रोडरेज का कारण बन जाता है। इन सबसे परे पैसे और सत्ता का मद भी ऐसा है जो युवाओं को रोडरेज के लिए प्रेरित करता है। रोडरेज के अधिकांश मामलें जो सामने आते हैं या जिनके कारण रोडरेज मीडिया में प्रमुखता पाता है वह कारण सत्ता या पैसे के मद में किए जाने वाले रोडरेज के प्रकरण ही होते हैं। जरा सी बात पर सामने वाले को गाड़ी से कुचल देना आम होता जा रहा है। देश में रन और हिट के मामलें भी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। रोडरेज की समस्या से सरकार गंभीर होने के बावजूद इस पर अंकुश लगाने का कानून अभी धरातल पर नहीं आ पाया है। 2014 से यह कानून पाइप लाईन में है। इस कानून में सड़क चलते अपराध करने की स्थिति में 3 लाख तक जुर्माना और सात साल की सजा का प्रावधान प्रस्तावित है। आज की तारीख में लोगों को कानून का ड़र नहीं है। पहली बात तो ले देकर या सिफारिश से मामलें रफा-दफा हो जाते हैं । यदि ऐसा नहीं भी हो तो अधिकतर यातायात नियमों के उल्लंघन का जुर्माना लगाकर इतिश्री हो जाती है। इसके अलावा न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि वर्षों तक फैसला नहीं हो पाता। अपील दर अपील का सिलसिला भी दोषियों को बचाने में सहायक होता है। रोडरेज की आए दिन व बढ़ती घटनाओं पर अकुश लगाने के लिए सरकार को सख्त कानूनी प्रावधान करने के साथ ही यातायात नियमों की पालना भी सख्ती से कराने पर ध्यान देना होगा, नहीं तो यह सिलसिला थमने वाला नहीं लगता है। हांलाकि सरकार ने यातायात नियमों की पालना में सख्ती की दिशा में कदम बढ़ाए हैं पर जब तक इनकी सख्ती से पालना नहीं होती तब तक यह सब बेमानी है। वैसे भी आज के युवाआंे की सहनशीलता और संवेदनशीलता जगजाहिर है। ऐसे में रोडरेज की घटनाओं पर कारगर रोक लगाया जाना आज की आवश्यकता है। मजे की बात यह है कि आज बड़े शहरों में तो सीसीटीवी लग गए हैं और फुटेज के आधार पर आसानी से पहचान हो जाती है फिर भी अधिकांश मामलों में बचने का जुगाड़ हो ही जाता है। यातायात पुलिस, पुलिस प्रशासन और न्यायालय को भी इस तरह के मामलों में सख्ती से पेश आना होगा तभी इस तरह की घटनाआंे को रोका जा सकता है।डाॅ.

राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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