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क्यों नहीं दिखती कश्मीरी पंडितों की पीड़ा

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों आए संकट और पलायन के बाद पूरी दुनिया में एक बार फिर शरणार्थी समस्या बहस का मसला बन गयी है। पलायनवाद एक समुदाय विशेष की समस्या के बजाय एक वैश्विक विभीषिका के रुप में उभरा है। संयुक्तराष्ट संघ भी इस पर गहरी चिंता जता चुका है। लेकिन आतंरिक गृहयुद्ध, जातिय हिंसा के साथ आतंकवाद की वजह से सबसे अधिक लोगों का पलायन हुआ है। शरणार्थी समस्या मानवीयता से जुड़ा मसला है। इसे धर्म और जाति, समुदाय से जोड़ना गलत होगा। दुनिया भर के मुल्कों का जरिया शरणार्थी समस्या पर उदार रहा है। भारत का मानवीय नजरिया सबसे अलग है। संयुक्तराष्ट संघ ने भारत के प्रयासों की प्रशंसा कर चुका है। लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों पर भारत के कदम को कुछ लोग गलत बता रहे हैं और घड़ियाली विलाप का मंचन कर रहे हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंकी आका म्यांनमार और भारत को ताबह करने की धमकी दे रहा है और दुनिया के मुसलमानों से एक जुट होने की अपील कर रहा है। इस तरह की अपीलों से समस्या का हल निकलने वाला नहीं है।
संयुक्तराष्ट की तरफ से 2015 में यूएनएचसीआर की तरफ से जारी ग्लोबल रिपोर्ट में बताया गया कि सिर्फ एक साल में 6.53 करोड़ दुनिया भर में पलायित हुए। जबकि एक साल पूर्व 2014 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जीतने लोग पलायित नहीं हुए थे उससे कहीं अधिक शरणार्थी शिविरों में शरण को मजबूर हुए। इस आंकड़े के मुताबित हर मिनट 24 लोग जबकि एक दिन में 34,000 लोगों ने पलायन किया। जबकि 12 साल पूर्व यानी 2010 यह स्थिति एक मिनट सिर्फ 06 लोगों की थी। दुनिया में विस्थापन की समस्या सबसे अधिक सीरिया युद्ध के बाद शुरु हुई। उस दौरान पलायन में 50 फीसदी तक का इजाफा हुआ। जिसमें आधे से अधिक सीरिया, अफगानिस्तान और सोमालिया के लोग हैं। संयुक्तराष्ट संघ में 2015 में शरण लेने के लिए जिन देशों के लोगों ने आवेदन किया था उसमें आने वाले कुल आवेदनों में 20 फीसदी सीरिया, दूसरे पायदान पर कोसोवो थे जो सर्विया से अलग हुए थे। यहां से 66 हजार लोगों ने शरण लेने के लिए आवेदन किया। अफगानिस्तान से 63 हजार लोगों ने यूरोप के लिए आवेदन किया। अल्बानिया से 43, इराक से 34, आस्टिया से 27, सर्विया से 22 पाकिस्तान से 20, सोमालिया और यूक्रेन से 13 हजार लोगों ने देश छोड़ कर दूसरी जगह पलायन के लिए आवेदन किया। जबकि जारी आंकड़ों में चार करोड़ से अधिक वे लोग थे जो अपने ही देश में शरणार्थी बनने को मजबूर हुए। रिपोर्ट में सबसे अधिक चैंकाने वाली बात यह है थी कि 2015 में विस्थापितों में आधे से अधिक मासूम बच्चे थे। यूएन में शरण लेने के लिए 98 लाख से अधिक बच्चों ने आवेदन किया था। जिनके सिर मां-बाप का साया उठ गया था वे आतंरिक, जातिय या फिर आतंकवाद जैसी हिंसा में अनाथ हुए थे।
शरणार्थी समस्या पर निश्चित तौर पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है। संयुक्तराष्ट संघ लोगों को संवैधानिक अधिकार भी दिए हैं। कोई भी व्यक्ति अगर किसी देश में शरण लेता है तो उसके मानवीय अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन अगर वह मानवीयता की आड़ में जीवन यापन की मांग करे और उसी देश के खिलाफ आतंकी साजिश में शामिल हो कर षड़यंत्र रचे फिर यह कहां का न्याय है। जिस तरह रोहिंग्या मुसलमानों ने म्ंयानमार की सेना और बौ़द्धों को निशाना बनाया जिसके बाद पलायित होने को मजबूर हुए। भारत में 40 हजार से अधिक रोहिंग्या मुसलमान शरण लिए हुए हैं। भारत सराकर ने साफ कर दिया है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को शरण नहीं देना चाहती है। देश की सर्वोच्च अदालत में इसकी सुनवाई भी चल रही है। सरकार के इस रुख पर राजनीति की जा रही है। पाकिस्तान में बैठे आतंकी आका अजहर मूसद दुनिया के मुसलमानों को एकजुट होने की अपील कर रहा है। उसे पाकिस्तान और बंग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू नहीं दिखाई दे रहे हैं जिनकी बहू बेटियों से खुले आम बलात्कार किए जाते हैं। जबरन धर्म परिर्वन कर शादियां की जाती हैं। हिंदू मंदिरों को तोड़ा जाता है। पाकिस्तान में भी तीन लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमान शरण लिए हैं, फिर पाकिस्तान उन्हें मुसलमान और इस्लाम के नाम पर ही क्यों नहीं नागरिकता प्रदान करता। शरणार्थी शिविरों में रहने को रोहिंग्या क्यों मजबूर हैं। दुनिया भर में 56 से अधिक मुस्लिम देश हैं। क्यों नहीं राहिंग्या को शरण के लिए आमंत्रित करते। एक भी इस्लामिक देश इस समस्या पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है। कश्मीर से आतंकवाद की वजह से लाखों पंड़ित दिल्ली और दूसरे राज्यों में शरण लिए हुए हैं। अपने ही देश में वह पलायित होने को मजबूर हुए। रोहिंग्या की पीड़ा उन्हें चुभती है लेकिन कश्मीरी पंड़ित नहीं दिखते। पाकिस्तान में बठै आतंकी आंका और अलगाववादी अलग कश्मीर की मांग कर रहे हैं। वह भारत के संविधान और कानून को मानने के लिए तैयार नहीं है। वह तिरंगा नहीं लहराना चाहते। वह धारा 34 ए को जिंदा रखना चाहते हैं। फिर रोहिंग्या पर सरकार हमदर्दी दिखा देश एक और विभाजन की आवाज क्यों बुलंद करवाए। आतंकी आका और पाकिस्तान रोहिंग्या की आंड़ में पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन का बदलना लेना चाहते हैं। जिसे भारत कभी कामयाब नहीं होने देगा। भारत रोहिंग्या मुसलमानों को निकालना भी एक समस्या है। आखिर उन्हें कहां और किस देश में भेजा जाएगा। यह भी एक बड़ा सवाल है।

प्रभुनाथ शुक्ल

लेखकः स्वतंत्र पत्रकार हैं

 

 

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