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भगवान भरोसे लोकसभा चुनाव जीतने का सपना देख रही है कांग्रेस 

कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद, कांग्रेस के नेता अति उत्साहित हैं। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अहमद पटेल, डॉ मनमोहन सिंह, एके एंटोनी, मलिकार्जुन खड़गे, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता यह मानकर चल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव वह भारी बहुमत से जीतेंगे। कांग्रेस का यह भी मानना है, कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ जो आक्रमकता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनाई है, उसका असर सारे देश में हो रहा है। लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के पक्ष में एक आंधी चलेगी। जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को चक्रवाती हवा की तरह उड़ा देगी। कांग्रेस के नेता यह मान कर चलने लगे हैं, कि जिस तरह 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दो तिहाई बहुमत से ज्यादा की जीत हासिल की थी। वहीं स्थिति अब फिर बन गई है। कांग्रेसी नेताओं का व्यवहार और उनकी आक्रमकता यही संदेश दे रही है, जिसके कारण विपक्षी दलों के बीच में भी कोई अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ जो विपक्षी दल एकजुट होना चाहते थे, वह भी कांग्रेस के इस बदले हुए तेवर को देखते हुए छिटक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव ,पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जैसे स्थापित राजनीतिक दल और राजनेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कांग्रेस और उनके अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में, भाजपा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति सांगठनिक क्षमता और संसाधनों का मुकाबला किस तरह कर पाएंगे।
पिछले 20 वर्षों में कांग्रेस संगठन पूरी तरह से लगभग सभी राज्यों में छिन्न भिन्न हो चुका है।हिंदी भाषी राज्यों में भी जहां पर कांग्रेस की सरकारें थीं, संगठन नाम की वर्तमान में कोई चीज नहीं है। हाल ही में 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को जो जीत हासिल हुई है, वह जनता की भाजपा के प्रति नाराजगी और भाजपा नेताओं के अहंकार के कारण संभव हो सकी है। कांग्रेस के पास अभी भी संगठन नाम की कोई चीज नहीं है। कांग्रेस के नेता आपस में ही झगड़ रहे हैं। 3 राज्यों में सरकार के गठन में जिस तरह कांग्रेस के नेताओं ने मुख्यमंत्री और मंत्री पद हथियाने के लिए शक्ति प्रदर्शन किया, उससे कांग्रेस के बारे में कोई अच्छी राय आम जनता के बीच नहीं गई। लोकसभा चुनाव के लिए 2 माह का समय कांग्रेस के पास शेष है। निश्चित रूप से 2014 की तुलना में भाजपा के लिए चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा कांग्रेस की नाकामियों को बताकर और जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाकर, सत्ता में आई थी। 30 साल बाद केंद्र में भाजपा की सरकार को स्पष्ट बहुमत मिला। स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद भारतीय जनता पार्टी की जवाबदेही भी काफी बढ़ गई है। 1996 से 2004 के बीच केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में साझा सरकार थी। उस समय गठबंधन की सरकार होने से आम जनता के बीच में यह संदेश था, कि यह पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं है। जिसके कारण भाजपा अपने वादों को पूरा नहीं कर पाई। किंतु नरेंद्र मोदी की सरकार पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। आम जनता ने लोकसभा चुनाव के बाद लगभग 4 वर्ष तक जितने भी राज्यों के चुनाव हुए, सभी में भाजपा अथवा भाजपा गठबंधन की सरकारें बनाकर, भाजपा को मजबूत किया था। उसके बाद भी 2014 में किए गए वादे पूर्ण करने में भाजपा और नरेंद्र मोदी असफल होते हैं, तो इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना ही पड़ेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि आम जनता कांग्रेस के पक्ष में सारे देश भर में मतदान करेगी। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के लिए ठोस रणनीति बनाना होगी। विपक्षी दलों को साथ लेकर चलना होगा। कांग्रेस, लोकसभा चुनाव के लिए यदि सपा-बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन नहीं करती है, तो वोटों के बंटवारे से उसे लोकसभा चुनाव के दौरान बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बन चुकी हैं, उन राज्यों में भी कांग्रेस को भाजपा से मुकाबला कर पाना मुश्किल होगा। मध्य प्रदेश एवं राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हठधर्मिता और क्षेत्रीय नेताओं के आपसी विवाद के कारण जिस तरह टिकट बांटे गए, उसके बाद मध्यप्रदेश और राजस्थान में समर्थन के बल पर सरकार बनाने को विवश होना पड़ा। विधानसभा में तो जैसे-तैसे सरकारें बन गई। लेकिन लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने गंभीरता, चातुर्यता, एवं कूटनीति का परिचय नहीं दिया, तो कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका लग सकता है। भारतीय जनता पार्टी इस समय सत्ता के मद में मदमस्त होकर,वह सब कर रही है,जो नैतिक या अनैतिक की श्रेणी में आता है। लोकसभा चुनाव जीतने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार खड़ी है। भारत सरकार का खजाना पूरी तरह से लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वोटों को कबाड़ने में खर्च किया जा रहा है। जातीय आधार पर पहले ही समुदायों को बांट दिया गया है। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। विपक्षी दलों को नेस्तनाबूद करने के लिए सीबीआई, आयकर व प्रवर्तन निदेशालय का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। चुनाव के दौरान भी भाजपा के धनबल और बाहुबल का सामना करने की स्थिति किसी भी राजनीतिक दल की नहीं है। ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों का बिखराव भाजपा को लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत बना रहा है। 3 राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस का अहंकार भी अब सामने दिखने लगा है। यदि यही स्थिति अगले 2 महीने और चली, तो राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है, कि नरेंद्र मोदी को हरा पाना कांग्रेस और विपक्षी दलों के गठबंधन के लिए संभव नहीं होगा। येन- केन-प्रकारेण नरेंद्र मोदी 2019 में एक बार फिर सरकार बनाने में सफल हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में राहुल गांधी और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को अपनी रणनीति और कूटनीति पर विचार करते हुए जिम्मेदारी और बड़प्पन का परिचय देते हुए लोकसभा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी करना चाहिए। यहां यह उल्लेख करना जरुरी है कि राहुल गांधी की लहर देश में चल रही है और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है। ऐसी स्थिति में उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कोई रोक भी नहीं सकता है। वर्तमान में कांग्रेस को सभी विपक्षी दलों को राष्ट्रीय स्तर की राजनीति को ध्यान में रखकर गठबंधन बनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए। अन्यथा भाजपा और नरेंद्र मोदी को हरा पाना संभव नहीं होगा।

सनत जैन

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