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मुबंई हादसा-समझ से परे है भीड़ का मनोविज्ञान

एक अफबाह कैसे अफरातफरी फैला कर लोगों का मौत का सबब बन जाती है इसका जीता जागता उदाहरण है मुंबई रेल्वे स्टेशन का हादसा। देश में यह पहला मौका नहीं है जब अफबाह के कारण भगदड़ मची हो और एक के बाद एक लोग भगदड़ के कारण मौत के शिकार होत जा रहे हैं। मुबई के एलफिंस्टन ओवरब्रीज के हादसे ने एक बार फिर हमारे प्रशासनिक तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। इसे दुर्भाग्यजनक ही माना जाएगा कि एक बार फिर प्रशासन भीड़ के मनोविज्ञान को समझने में नाकाम रहा है। भले ही राजनीतिक दल ऐसी घटनाएं होने के बाद अपने अपने तरीके से आरोप प्रत्यारोप में उलझ जाते हो पर कारण की तह में जाने की कोई ठोस कोशिश नहीं होती। इसी घटना पर शिवसेना पुल के पुराना होने और छोटा होने का आरोप लगाकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है। पर असली कारण देखा जाए तो अफबाह के मनोविज्ञान को समझना ज्यादा जरुरी है। कुछ सालों पहले मुंबई में ही अफबाह के चलते अफरातफरी के कारण मेट्र्ो के नीचे आकर लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हांलाकि इससे यह साफ हो गया है और स्पष्ट भी है कि देश के किसी भी कोने में भीड़ भाड़ वाले स्थान पर छोटी सी अफबाह की छुर्री छोड़ कर कई निर्दोष लोगोे को मौत के मुंह में धखेला जा सकता है। देश में किसी ना किसी स्थान पर साल में एकाध मौतों का कारण भगदड़ बनती जा रही है। पिछले साल सबरीमाला में भगदड़ के कारण मौत देख चुके हैं हालंाकि शबरी माला की यह पहली घटना नहीं थी इससे पहले 14 जनवरी 2011 को सबरीमाला मंदिर में पूजा के दौरान मची भगदड़ में 106 श्रृद्धालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा वहीं करीब 100 लोग घायल हो गए। सबरीमाला मंदिर में सालाना आयोजन और इस अवसर पर उपस्थित होने वाले संभावित श्रृद्धालुओं की जानकारी प्रशासन के पास पहले से होती है उसके बावजूद इस दौरान इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति क्षम्य नहीं मानी जा सकती। 41 दिवसीय मंडला पूजन के समापन की पूर्व संध्या व रविवार होने के कारण मंदिर में श्रृद्धालुओं का तांता लगा हुआ था, ऐसे में प्रशासन की यह सामान्य समझ होना जरुरी है कि एक छोटी घटना व अफवाह किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। हुआ भी यही, भीड़ की खींच-तान में बेरिकेड़ टूट गया और फिर भगदड़ मचने से 40 से अधिक लोग घायल हो गए। आरंभिक सूचना से यह तो संतोष की बात है कि भगदड़ में किसी की मौत तो नहीं हुई,हांलाकि कुछ घायलों की हालत गंभीर होने की जानकारी है।  सबरीमाला मंदिर वैसे भी महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को लेकर पिछले दिनों चर्चा में रहा है और सर्वोच्च न्यायालय की दखल से महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिल सकी है। वैसे भी हमारा देश धर्मप्रधान देश है। धार्मिक आस्था हमारे यहां चरम में हैं। तीज- त्यौहारों व मेलों में पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं। यही नहीं धर्मगुरुओं के समागम तक में अनुयायियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। पिछले दिनांे वाराणसी में राजघाट पर बाबा जयगुरुदेव के अनुयायियों द्वारा आयोजित समागम व शोभा यात्रा इसका उदाहरण है जब एक छोटी सी अफवाह के चलते भगदड़ क्या मची की 24 लोगों की जान ले गई। बाबा जयगुरुदेव के इस कार्यक्रम में आयोजकों ने प्रशासन से 4 से 5 हजार लोगों के एकत्रित होने की अनुमति ली थी जबकि इस समागम में 3 लाख से अधिक लोग जुटे। समागम के दौरान राजघाट पुल पर एक तो समागम में आए पैदल यात्रियों का दबाव दूसरी और रेल की आवाज की गड़गड़ाहट को पुल टूटने की अफवाह के चलते इतना बड़ा हादसा हो गया और प्रशाासन की लाचारी कहो या ओर कुछ की वह मूक दर्शक बन कर रह गया।  अभी पिछले दिनों ही तमिलनाडू सहित दक्षिण के कुछ राज्यों में चक्रवाती तूफान से प्रशासनिक तैयारियों के चलते जनहानि को कम से कम स्तर पर होने दी गई। वहीं 2013 में एक ओर हम भयावह चक्रवाती तूफान पाइलिन से जनहानि बचाने में कामयाब हो जाते हैं पर धार्मिक स्थ्लों पर आयोजित समारोहों में एक अफवाह से सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है और हम देखते रह जाते हैं। दोनों ही स्थितियां इस मायने में समान है कि हमें पहले से पता है कि क्या होने वाला है। तूफान की भयावहता का पता होने से हमनें पूरी तैयारी की और जनहानि को न्यूनतम स्तर पर लाने में सफल रहे और इसका लोहा सारी दुनिया के लोगों ने माना। दूसरी और मेलों व समागमों व इस तरह के आयोजनों में आने वाले श्रृद्धालुओं की संभावित संख्या का पता होने के बाद भी हम समुचित व्यवस्था करने में विफल रह जाते हैं और धार्मिक श्रृद्धा लाख प्रयासों के कारण मौत का सैलाब बन जाती है। ऐसा नहीं है कि धार्मिक अवसरों पर इस तरह की घटना पहली बार हो रही हो। इसे दुर्भाग्य जनक ही माना जाना चाहिए कि अब तक जितनी भी इस तरह की दुर्घटनाएं हुई है वह भगदड़ के कारण हुई है। इससे पूर्व 1 अक्टूबर, 2006 में दतिया में रतनगढ़ स्थित देवी मंदिर मंे पुल टूटने की अफवाह ने करीब 109 श्रृद्धालुओं की जान ले ली। यह अकेले उदाहरण नहीं हैं। पिछले सालों का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक अफवाह किस तरह से विकराल रुप ले लेती है और परिणाम स्वरुप होने वाली भगदड़ लोगों के मौत का कारण बन जाती है। इस तरह की घटनाएं बार-बार होने के बावजूद हम ऐसा प्रशासनिक तंत्र विकसित नहीं कर पाए, जिससे इस तरह की घटनाआंे की पुनरावृति को रोका जा सके। 2003 में नासिक के कुंभ में भगदड़ मचने से 40 लोगों की जान गई, 2005 में महाराष्ट्र् के सतारा के मंधेरी देवी मंदिर में भगदड़ के कारण सैकड़ों लोग मारे गए। 2008 में जोधपुर के चामुण्डा मंदिर में भगदड़ मची और 224 लोग दब कर मर गए। इसी तरह से 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैनादेवी मंदिर, 2011 में केरल के सबरीमाला मंदिर, 2011 में ही हरिद्वार में गंगाघाट, 2012 में छठ पूजन के दौरान और 2013 में इलाहाबाद कुंभ के दौरान रेल्वे स्टेशन पर मची भगदड़ से बेकसूर श्रृद्धालुओं को जान से हाथ धोना पड़ा। 3 अक्टूबर, 14 को पटना के गांधी मैदान में रावण दहन समारोह में 32 मौत, 18 जनवरी 14 को बोहरा समाज धर्मगुरु के यहां भगद़ड़ में 19 लोग, 14 जुलाई 15 को आंध्रप्रदेश, 10 अगस्त 15 को देवधर मंदिर में पूजा के दौरान भगदड़ और इसी साल 10 अगस्त 16 को कोट्टयम में समारोह के दौरान पटाखा विस्फोट के कारण भगदड़ में 111 की मोत की घटनाएं हो चुकी है। यह घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यहां सबसे महमत्वपूर्ण यह है कि रेल्वे स्टेशनोें पर माइक से अनाउंसमेंट की सुविधा होती है। अनाउंसर भी होता है। रेल्वे पुलिस का लवाजमा भी होता है, ऐसे में यदि लोगों को आश्वस्त करने के लिए तत्काल अनाउंसमेंट किए जाते तो शायद इतनी भगदड़ नहीं मचती। वैसे भी मुंबई के लोग तेज बरसात आते ही दहसत में आ जाते हैं। इस कारण प्रयास जल्दी से जल्दी घर जाने का होता है। इससे में भीड़ बढ़ना स्वाभाविक है। फिर भीड़ में कब कौन सी अफबाह फैला दे कहा नही जा सकता। ऐसे में प्रशासन को मुस्तेद रहना जरुरी हो जाता है। ऐसी स्थितियों में ही डिजास्टर मैनेजमेंट की आवश्यकता होती है। इस तरह की घटनाएं होना दुर्भाग्य जनक ही कही जाएगी। दरअसल ऐसी दुर्घटनाओं से निपटने का तंत्र अभी तक विकसित करने में विफल रहे हैं। दुर्घटनाएं होती है, संवेदनाएं प्रकट कर दी जाती है, मृतकों के आश्रितों का मुआबजा दे दिया जाता है। जांच बैठा दी जाती है। दोषियों के खिलाफ कार्यवाही का आश्वासन आ जाता है पर अभी तक इतनी दुर्घटनाओं के बावजूद किसी जांच रिपोर्ट में प्राप्त उपायों को गंभीरता से लेते हुए कोई हल नहीं खोजा जा सका है और अफवाह के नाम पर भगदड़ मचने का कारण बताते हुए इतिश्री हो जाती है। सरकार का अपना सूचना तंत्र भी होता है, पर इस सबके बावजूद इस तरह की घटनाएं साल दर साल होती जा रही हैं और इस तरह की घटनाओं और खासतौर से भीड़ के मनोविज्ञान को समझने की भूल हो रही हैं। ऐसे मेें आपदा प्रबंधन तकनीक विकसित होनी चाहिए जिससे घटना की संभावना होने मात्र पर ही तत्काल राहत व वैकल्पिक उपाय किए जा सके, अफवाहों पर तत्काल रोक लग सके ताकि जनहानि को रोका जा सके। और वेकल्पिक रास्तों को भी चिन्हित करना होगा। जब एक ही परिस्थिति में एक ही तरह की घटना घटित होती है तो उसे रोकने के उपाय कहीं ना कही समय रहते खोजे जाने चाहिए। 

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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