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संयुक्तराष्ट्र उत्तर कोरिया पर साफ करे नीति

उत्तर कोरिया की परमाणु प्रसार नीति ने अमेरिका को हिला कर रख दिया है । सनकी तानाशाह किम जोन की हठता से शांतप्रिय देशों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो चली है । किम की यह मुहिम अमेरिका को डराने के लिए है या फ़िर चौथे विश्वयुद्ध की दस्तक कहना मुश्किल है । क्योंकि अमेरिका की लाख कोशिश और धमकी के बाद भी उत्तर कोरिया पर कोई असर दिखता नहीँ पड़ता ।
उत्तर कोरिया की आणविक प्रयोगवाद की जिद उसे कहां ले जाएगी । वह परमाणु सम्पन्नता से क्या हासिल करना चाहत है । वैश्विक युध्द की स्थित में क्या वह अपने परमाणु हथियारों को सुरक्षित रखा पाएगा ? वह परमाणु अस्त्र का प्रयोग कर क्या अपने को सुरक्षित रख पाएगा । परमाणु अस्त्रों के विस्फोट के बाद उसका विकिरण और इंसानी जीवन पर पड़नेवाला दुष्परिणाम किसे झेलना पड़ेगा। उसकी यह मुहिम सिर्फ एक सनकी शासक की जिद है या फ़िर मानवीयता को जमींदोज करने एक साजिश। कोरिया पढ़ बढ़ती वैश्विक चिंता के बाद भी दुनिया इस मसले पर गम्भीर नहीँ दिखती। जिसकी वजह है अमेरिका कि चिंता काफी गहरी होती जा रहीं है । राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की कड़ी सैन्य चेतावनियों के बाद भी किम की सेहत पर कोई असर फिलहाल नहीँ दिख रहा । इस मसले पर चीन और रूस की भूमिका साफ नहीँ है । किम की दहाड़ से यह साबित होता है कि रूस और चीन आणविक प्रसार को लेकर सम्वेदनशील नहीँ हैं । उत्तर कोरिया लगातर परमाणु परीक्षण जारी रखें है । संयुक्त राष्ट्रसंघ की चेतावनी के बाद भी यूएन के सभी स्थाई सदस्य चुप हैं। जिसकी वजह है कि सनकी शासक पर कोई असर नहीँ दिखता है और वह मिशन पर लगा है । किम हाइड्रोजन बम का भी परीक्षण कर चुका है । जिसका कबूलनामा और तस्वीरें दुनिया के सामने आ चुकी हैं । यही वजह है कि अमेरिका साथ जापान को भी पसीने छूट रहें हैं । क्योंकि उत्तर कोरिया बार- बार ट्रम्प कि धमकियों को नज़र अंदाज़ कर मुंहतोड़ जवाब देने की बात कह रहा है ।

यह बात साफ होने के बाद कि कोरिया को पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर ने यह तकनीक पाकिस्तानी सरकार के कहने पर उपलब्ध कराई, जिसकी वजह से अमेरिकी सरकार और चिढ़ गई है । यही कारण हैं कि पाक की नीतियों को संरक्षण देनेवाला अमेरिका उसे अब आतंकियों के संरक्षण का सबसे सुरक्षित पनाहगार मानता है । दूसरी अंतर्राष्टीय बात है कि अमेरिका , भारत और जापान कि बढ़ती नजदीकियों से चीन और पाकिस्तान जल उठे हैं । जिसकी वजह है कि रूस , चीन और पाकिस्तान कि तरफ़ से उत्तर कोरिया को मौन समर्थ मिल रहा है । हालांकि वैश्विक युध्द की फिलहाल सम्भावना नहीँ दिखती है , लेकिन अगर ऐसा हुआ तो रूस , चीन और पाकिस्तान उत्तर कोरिया के साथ खड़े दिख सकते हैं । जबकि भारत , जापान और अमेरिका एक साथ आ सकते हैं । क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ ट्रम्प सरकार ने जिस तरह वैश्विक मंच पर भारत का साथ दिया है , जिसकी वजह से भारत आतंकवाद को वैश्विक देशों के सामने रखने में कामयाब हुआ है । यूएन ने भी भारत के इस प्रयास कि सराहना की है । दक्षिण सागर और डोकलाम पर भारत की अडिगता चीन को खल रहीं है । जिससे कोरिया पर चुप्पी साध रखी है । रूस ने एक बार फ़िर साफ कर दिया है कि उत्तर कोरिया पुनः मिसाइल परीक्षण की तैयारी में जुटा है जिसकी ज़द में अमेरिका का पश्चिम भाग होगा । वैसे अमेरिका कोरिया पर लगातर दबाव बनाए रखे है । वह आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध भी लगा चुका है। जबकि रुस और चीन की तरफ़ से कोई ठोस पहल नहीँ की गई ।

हालांकि अमेरिका किसी भी चुनौती के लिए तैयार खड़ा है । अमेरिका , कोरिया पर हमला करता है तो उस स्थिति में रूस और चीन की क्या भूमिका होगी जब यह देखना होगा । दोनों तटस्थ नीति अपनाते हैं या फ़िर कोरिया के साथ युध्द मैदान में उतर चौथे विश्वयुध्द के भगीदार बनते हैं। क्योंकि यह बात करीब साफ हो चली है कि अमेरिका और उत्तर कोरिया में शीतयुद्ध के बाद की स्थिति आणविक जंग की होगी ! क्योंकि किम को यह अच्छी तरह मालूम है कि सीधी जंग में वह अमेरिका का मुकाबला कभी नही कर सकता है । सैन्य तागत के सामने किम कि सेना और हथियार कहीँ से भी टिकते नहीँ दिखते। उस स्थिति में उत्तर कोरिया के सामने अमरीका को बंदर घुडकी देने के शिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीँ बचता। युध्द कि स्थिति में कोरिया लम्बे वक्त तक नहीँ टिक पाएगा । उस हालात में सब से अधिक बुरा परिणाम सनकी शासक किम को भुगतान पड़ेगा। इसके अलावा सबसे बूरा असर समूची मनवता पर पड़ेगा । परमाणु अस्त्रों के प्रयोग से विकिरण फैलेगा। दुनिया में अजीब किस्म कि बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा। विकिरण कि वजह से लोग विकलांग पैदा होंगे। धरती पर तापमान बढ़ेगा और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । आणविक युध्द कि पीड़ा कोई जापान से पूँछ सकता है । 1945 में विश्व युध्द के दौरान अमेंरिका ने आणविक हमले किए थे । जिसका नतीजा है कि 70 साल बाद भी लोग विकलांग पैदा होते हैं और उसका डंस पीढियों को भुगतना पड़ रहा है । कोरिया के खिलाफ दुनिया को एक मंच पर आना चाहिए और उसकी आणविक दादागिरी पर रोक लगनी चाहिए । वरना मानवीय हित संरक्षक संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी संस्था को कड़े क़दम उठाने चाहिए ।

उत्तर कोरिया की तानाशाही पर वैश्विक देश एक मंच पर नहीं आते तो स्थिति विकट होगी । फ़िर दूसरे देशों पर भी लगाम कसनी मुश्किल होगी और दुनिया में आणविक प्रसार की होड़मच जाएगी । उत्तर कोरिया की बढ़ती तानाशाही की वजह से अमेरिका ने साफ तौर पर कह दिया है कि आणविक प्रसार प्रतिबंध की बातें बेईमानी हो रहीं हैं। परमाणु अप्रसार संधि का कोई मतलब नहीं रह गया है । अमेरिका कि इस बात साफ जाहिर हो गया है कि अब वह इस संधि पर अधिक भरोसा नहीं रह गया है । दुनिया भर में आंतरिक सुरक्षा को लेकर संकट खड़ा हो गया है । स्थिति यह साफ संकेत दे रहीं है कि अगला विश्व युध्द परमाणु अस्त्रों का होगा ।

प्रभुनाथ शुक्ल
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
prabhu nath shukla
utter Pradesh
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