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व्यंग्य : नाम में बहुत कुछ रखा है

वैसे तो विलियम शेक्सपीयर ने कहा है – नाम में क्या रखा है। लेकिन अपनी जब आंखे खुली तो जाना कि नाम में बहुत कुछ रखा है। इसलिए भी कि अपन ने जब जब अपनी रचनाएं प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में प्रकाशन हेतु प्रेषित की तो रचनाएं सहर्ष प्रकाशित तो हुई लेकिन अपन का नाम प्रकाशित नहीं हुआ। अपन के नाम के स्थान पर किसी दूसरे का नाम छाप दिया गया। शायद ! अपन के नाम में ही खराबी है। तब लगा कि नाम में कुछ रखा है। कई दफा रचनाएं वापस आयी। तब अपन ने अपने नाम के स्थान पर किसी देवीजी का नाम लिखकर पुनः रचना को भेंजा तो वापस रचना की जगह उसी लिफाफे में मानदेय के साथ आभार पत्र आया। तब मेरा यह विश्वास सुदृढ़ हुआ कि नाम में कुछ नहीं बहुत कुछ रखा है। यदि नाम किसी स्त्री का हो तो काम जल्दी होता है। अब भी आपको यकीन नही हो तो एक बार अपना नाम आसाराम, रामपाल या फिर रामरहीम रखकर देखो ! यकीकन गली के कुत्ते भी आपको नहीं छोंडेगे। नाम में यदि आप सलमान खान है या शाहरुख खान है तो फिर आपको अदब के साथ बुलाया जाता है। आप ऐश्वर्या है या मल्लिका शेरावत है तो हर आदमी आपको आसाराम की निगाहों से देखेगा। यही कारण है कि हमारे समाज में नाम को बड़े सोच समझकर रखा जाता है। बड़े दिमागी घोड़े दौड़ाये जाते। यहां तक नामकरण की रस्म अदायगी के लिए बतौर समारोह आयोजित किये जाते है। फिर भले नाम के अनुसार आचरण नहीं हो तो भी दुनिया आपको नही पूछेगी। अब यदि थोड़ा दिमाग लगाये तो दिमाग में आयेगा कि अग्रलिखित जितने रामों का जिक्र किया गया है उन लोगों ने सीताहरण करने में कोई कमी नहीं रखी है। तभी तो कहा जाता है – राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। और राम से बड़ा तो राम का नाम है। किसी बड़े आदमी का नाम लेने से बडे से बडा काम हो चुटकियों में जाता है। यहीं कारण है कि दुनिया में नाम के लिए आदमी ताउम्र हर अपराध को अंजाम देने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। यदि नाम में कुछ नही रखा होता तो लोग बेवजह नाम के पीछे नहीं भागते। अपने नाम को चमकाने के लिए करोड़ों के भवन बनवाने के बाद सप्रेम भेंट की प्लेट नहीं खुदवाते। बेशक ! नाम में बहुत कुछ रखा है। तभी तो नाम यदि तैमूर रख दिया जाये तो बवाल मच जाता है। बहस शुरू हो जाती है। हमारे गांव में एक आदमी रहता था जिसका नाम तहसीलदार था। सिर्फ नाम ही तहसीलदार था। लेकिन शादी के लिए सबसे पहले रिश्ता उसके लिए आता था। नाम का प्रताप जो था। और हमारे एक शिक्षक भी थे जिनका नाम बी. शुक्ला था। पूरा नाम भिखारीदास शुक्ला था। लेकिन पूरा नाम कहने से हमेशा कतराते थे। आजकल लोग नाम देखते है। छोटी-सी चीज भी नाम यानि ब्रांड की लेना पसंद करते है। फिर भले उसकी गुणवक्ता के गुणधर्म कुछ भी हो। हालात इतने डाउन हो चुके है कि आज काम देखकर न तो नौकरी मिलती है और न ही छोकरी । सब नाम के दीवाने है। सब नाम का जलवा है।

देवेंद्रराज सुथार

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