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व्यंग्य : विटामिन एम की सबको जरूरत

गरीब, अमीर, दलित, वंचित, शोषित, पीड़ित, अंधा, काना, बैरा, गूंगा, लंगडा, लूला, स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, नपुंसकलिंग, बच्चे, बूढे, जवान सबको विटामिन एम की जरूरत है। इस विटामिन के बगैर सारे विटामिनों का काम अधूरा है। यह विटामिन जितना भी इंसान लेता है, वह उसे कम ही लगता है। इस विटामिन की सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसान प्रजाति को ही जरूरत है। जानवर को इस विटामिन से कोई लेना-देना नहीं है। सुबह हो या शाम, रात हो या दिन, हर वक्त आदमी इस विटामिन को एकत्रित करने की मशक्त में लगा रहता है। यहां तक आदमी का बच्चा पैदा होते ही अब रोने की जगह विटामिन एम विटामिन एम कहता है। ताउम्र विटामिन एम के पीछे इंसान दौडता है। आखिर विटामिन एम ही तो सारी कठिनाईयों का हल जो है। विटामिन एम इंसान के पास आते ही सारे विटामिनों की कमी से होने वाले रोगों का उपचार हो जाता है। यूं समझिये कि विटामिन एम जीवन की कुंजी है। जिस तरह विटामिन डी सूरज की धूप से हमें मिलता है। उसी तरह विटामिन एम मेहनत से हमें मिलता है। लेकिन इस विटामिन एम को पाने के लिए कई ओर भी तरीके है। कुछ चोरी करके, लूट-खसोट करके, डाका डालने जैसे आडे-टेढ़े हथकंधे अपनाकर भी इस विटामिन को प्राप्त कर ही लेते है। और लोग इन तरीकों से आवश्यकता से अधिक विटामिन एम को प्राप्त कर रहे है। जितना जिसके पास विटामिन एम होंगा उसका शरीर उतना ही वजनी व हृष्ट-पुष्ट होगा। गरीब को तो सख्त से सख्त विटामिन एम की जरूरत है। पर उनके हिस्से का विटामिन तो उनके चुने जनप्रतिनिधि निगल लेते है। आखिरकार इन्हें विटामिन एम मिले तो मिले कैसे ? इस जीवन रक्षक विटामिन एम को पाने के लिए हमारे देश में एक से बढकर एक घोटाले घटित होते आ रहे है। घोटालों का इतिहास रच डाला है घोटाला नायकों ने। कुछ महापुरूषों ने तो विटामिन एम को गलत तरीकों से संग्रहित करके विदेशों में छिपा दिया है। सात समंदर पार पडे विटामिन एम को देश में लाने के लिए एक लंबे बाल और दाढी वाले बाबा ने और एक दुबले-पतले गांघी टोपी पहनने वाले बुजुर्गे ने हुंकार भरी थी, लेकिन आधे रास्ते में उनकी सांसे फूलने लग गई। खैर ! मंजिल भले ही न मिली हो पर कोशिश सराहनीय थी। लेकिन परिणामस्वरूप अवैध तरीकों से अर्जित विटामिन एम के भारत आने की योजना काल के भेंट चढ गई। विटामिन एम जब पास हो तो सारे काम आसान हो जाते है। जितना विटामिन एम होगा जिंदगी का मजा उतना बढ जायेगा। पर ये विटामिन एम को जो सीधे रास्ते से हासिल करने जाता है उसे उल्टे मुंह की खानी पडती है। ओर जो उल्टे रास्ते से होकर जाता है वो सीधे मुंह मलाई खाता है। सच तो यह है कि विटामिन एम बोलता है। यह विटामिन एम ही जो नचाता है, गवाता है, हंसाता और रूलाता है। आदमी इस विटामिन एम के खूंटे से बंधा है। इसके मोह में पूरी तरह दिल तो पागल है। इस विटामिन की आड में अच्छे-अच्छे रंग बदल देते है। अपने पराये हो जाते है और पराये अपने हो जाते है। यदि यह विटामिन एम किसी गधे के पास भी थोडा अधिक आ जाये तो दुनिया उसके तलवे चाटने लग जाती है।

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