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व्यंग्य : राजनीति के खेल में जनता की चोटी

वैसे तो भारत देश में अनेक खेल समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं लेकिन इसमें “राजनीति का खेल” सबसे अलग हैं। इस खेल को एकाग्रचित होकर पुरे पाँच वर्ष तक सरकार द्वारा सहर्ष मनाया जाता हैं। मैं भी जमाने भर में कई खेल देख चुका था मगर यह खेल औरो की भाँति पूरी तरह से अलग था। इस खेल का दांव ऐसा था कि हर मानव के मस्तिष्क तक पहुँचना, हिमालय पर तपस्या करने जैसा था। इस खेल में खिलाड़ियों की कोई निश्चितता नहीं होती हैं। जो भी आया! जनता को झूठे वादों का प्रवचन सुनाकर सिंहासन हड़पने की मशक्कत में रहते थे। ज़नाब को यदि चिंता खलती हैं तो भी खुद की! बड़े-बड़े भाषणों में लोगों को हँसाकर अपना काम निकाल लेते हैं और नेताजी का मुकुट धारण करने के बाद तो किसी की सुनना तो अपराध सा समझते हैं। सारी जनता की चोटी कट जाए मगर ज़नाब सिर्फ अपनी चोटी का ध्यान रखते हैं। कई वर्षों से मेरे गाँव में कोई व्यक्ति इतना पढ़ा-लिखा नहीं था इसीलिए रामू काका मेरे पास राजनीतिक समस्याओ से जुड़े प्रश्न लेकर आ जाते थे। उनको हल करना बड़ी मुश्किल का काम था। सच बताऊँ तो अपने खाते से बाहर! लेकिन हाँ रामू काका का कलेजा ठण्डा करने के लिए थोड़ा बहुत सरकार को बुरा-भला कह देता हूँ और हाँ में हाँ भी मिला लेता हूँ। चिंतक मुद्दा तो यह हैं साहब ! कि मैं रोज ही अनेक समाचार पत्रों में राजनितिक चर्चाएँ देखता-सुनता रहता हूँ लेकिन इनका हल सदैव आर्यभट्ट जी के शून्य की तरह ही आता हैं। जब इतने सारे साहित्यकार कटाक्ष अपनी तलवार के सहारे करते रहते हैं लेकिन इस दिमागी कसरत का हल सदैव ही विपरीत रहा! अब इतने सारे कवि,लेखक लोग भी इस खेल को नहीं समझ पा रहे थे तो मैं किस खेत की मूली हैं? अब यदि इनका पुरजोर विरोध कर भी लूँ तो अपनी चोटी का भी तो ध्यान रखना पड़ता हैं। बीवी और बच्चों का क्या होगा? घर परिवार सब देखना पड़ता हैं,जवानी का इकलौता लट्ठ कब टूट जाए! क्या मालूम? फिर भी आँखे क़ानूनी कारीगरी तो देखती ही हैं जो मोटे-ताजे लोग करते हैं जिसमें राजनीति के अणु-परमाणु कूट-कूट करके भरे होते हैं। मानता हूँ कि राजनीति खराब वस्तु न थी और न हैं लेकिन जनता की चोटी का ध्यान रखें तो! फिर देखना अवश्य ही राजनीति का खेल भी महत्वपूर्ण पायदान के शीर्ष स्थान पर सुशोभित होगा वरना उजड़ी फसल की तरह विनाश तो हैं ही साथ में राजनीति की खूबसूरत चोटी भी जड़ों से कट जाएगी।

जालाराम चौधरी, बाड़मेर (राज.)
(स्वंतत्र लेखक, लेखन में बेहद सक्रिय)

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