ब्रेकिंग न्यूज़

हिमाचल विधानसभा चुनाव : भाजपा ने वीरभद्र सिंह के लिए पेश की एवरेस्ट सरीखी चुनौती

हिमाचल विधानसभा चुनाव
भाजपा ने वीरभद्र सिंह के लिए पेश की एवरेस्ट सरीखी चुनौती
अपनी और बेटे की सीट के लिए करनी पड़ रही है जदोजहद

हिमाचल विधानसभा चुनाव में अब मुकाबला रोचक हो गया है. भाजपा पहले सामूहिक नेतृत्व में पार्टी और नरेन्द्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही थी और कांग्रेस के लिए यह सहज स्थिति थी. कांग्रेस ने तुरूप चाल चलते हुए अपने एकमात्र सधे और अजमाए हुए मोहरे को दांव पर लगाकर भाजपा नेतृत्व के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी. पहले हिमाचल भाजपा के तीन वरिष्ठ नेताओं सर्वश्री शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और जे पी नडडा में प्रदेश संगठन द्वारा सुझाये गए नामों पर टिकट बंटवारे को लेकर पांच दिनों तक रस्साकशी चलती रही और अंत में धूमल द्वारा सुझाये गये नामों पर सहमति की मोहर लगी लेकिन पार्टी चुनाव के एक सप्ताह पहले तक मुख्यमंत्री घोषित करने से बचती रही. हालांकि पोस्टरों, बैंनरों और प्रचार सामग्री में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को खास तवज्जो दी गई थी और वह पूरे प्रदेश में प्रचार भी कर रहे थे प्रदेश नेतृत्व आलाकमान के दबाव के चलते कुछ भी बोलने की हालत में नहीं था. कार्यकर्ताओं समेत तमाम नेता उलझन में थे और मतदाताओं तथा समर्थकों को सामने नेतृत्व को लेकर निरूत्तर थे. नेतृत्व के अभाव में कांग्रेस तंज कस रही थी कि दुल्हा कौन है? कांग्रेस नेता और स्वयं मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपनी सभाओं में रणनीति के तहत केन्द्र सरकार पर मंहगाई, बेरोजगारी, नोटबंदी और जीएसटी को लेकर हमला बोल रहे थे और ऐसा लग रहा था कि भाजपा का प्रादेशिक नेतृत्व उनके सामने बौना हो गया है. चुनावों से दो सप्ताह पहले तक स्थिति यह बन गई थी कि भाजपा के तमाम केन्द्रीय नेताओं पर अकेले वीरभद्र सिंह भारी पड़ते दिखाई दे रहे थे और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि प्रदेश की जनता अपने लोकप्रिय और व्यापक जनाधार वाले नेता प्रेम कुमार धूमल को दरकिनार करने पर असहमत थी. भाजपा नेतृत्व ने आंतरिक सर्वेक्षणों और मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए अप्रत्याशित रूप से सिरमौर की रैली में धूमल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया जबकि पिछले दिन कई केन्द्रीय नेताओं सहित जे पी नडडा बयान देते रहे कि चुनावों से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं होगा. धूमल के मुख्यमंत्री घोषित होते ही कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में नई चेतना जागी है और कांग्रेस मायूस है. वीरभद्र सिंह पहले जहां मुकाबले को आसान समझ रहे थे अब वह उनके लिए एवरेस्ट सरीखा हो गया है. वीरभद्र सिंह के लिए वैसे भी इस बार दोहरी चुनौती है. पिछले कई चुनावी पारियों में कांग्रेस और भाजपा बारी-बारी से सरकार बनाती रही है और इस लिहाज से भाजपा की बारी है लेकिन 83 वर्ष की उम्र में भी वीरभद्र सिंह खूब पसीना बहा रहे हैं. वह पूरा दम लगाकर अपने बेटे विक्रमादित्य को स्थापित करना चाहते हैं. सोलन की अर्की विधानसभा सीट पिछली दो बार से भाजपा जीतती आयी है और अब इस सीट से वीरभद्र सिंह चुनाव लड़ रहे हैं और भाजपा उन्हें घेर रही है. वीरभद्र सिंह को अपनी तथा बेटे की सीट जीतने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है. इन सीटों पर कांग्रेस की नहीं बल्कि वीरभद्र सिंह और उनके परिवार की प्रतिष्ठा ही दांव पर ही नहीं है बल्कि अस्तित्व बचाये रखने की भी चुनौती है.
पिछले चुनावों में कई प्रादेशिक संगठन एवं पार्टियां तीसरे मोर्चे का ऐलान कर चुनाव लड़ती रही हैं लेकिन इस बार मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच आमने-सामने है और कांग्रेस ने ज्यादातर अपने पुराने धुरंधरों को ही मैदान में उतारा है जबकि कुछ पारिवारिक वंशजों को भी उम्मीदवार बनाया है जो विरासत की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि भाजपा ने कई प्रयोग किये हैं और कुछ नए उम्मीदवारों और महिलाओं को मैदान में उतारा है. हैरानी की बात यह है कि भाजपा के प्रचार के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, हिमाचल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय मंत्री प्रदेश में डेरा डाले हुए हैं वहीं कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह को अकेला छोड़ दिया है. हालांकि उत्तराखंड और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और भूपेन्द्र सिंह हुडडा प्रचार कर रहे हैं लेकिन प्रदेश में उनका कोई आधार नहीं है. अब पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंन्द्र सिंह रिश्तेदारी निभाने आ रहे हैं और राहुल गांधी भी हिमाचल पहुंच रहे हैं लेकिन अब तक की लड़ाई से साफ हो गया है कि कांग्रेस आलाकमान के लिए प्रदेश में वीरभद्र सिंह सर्वशक्तिमान हैं. कांग्रेस आलाकमान जानता है कि वीरभद्र सिंह हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि हार का ठीकरा राहुल गांधी पर फूटे, इसलिए वीरभद्र सिंह को पूरी आजादी दी गई है. जीत और हार जो भी होगी, वीरभद्र सिंह की होगी.
तीसरी पार्टी बनने के लिए कई पार्टियां प्रदेश में बड़े-बड़े दावों के साथ उतरती रही हैं लेकिन सबको यहां से बोरिया-बिस्तर समेट कर जाना पड़ा है. 1998 में पूर्व संचार मंत्री सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस बड़े दावे के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी. पार्टी प्रदेश की सभी 68 विधानसभा सीटों पर लड़ी थी. पार्टी के चार उम्मीदवार जीतकर विधायक बने थे, लेकिन करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर पार्टी ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को हराने में अहम रोल अदा किया था.इस बार पंडित सुखराम परिवार सहित भाजपा में शामिल हो गये हैं और उनका बेटा अनिल शर्मा मंडी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहा है. 1997 में हिमाचल विकास कांग्रेस के सहयोग से ही प्रेम कुमार धूमल पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. पार्टी नेताओं की बगावत के बावजूद उनकी सरकार पूरे पांच साल तक चली थी. लेकिन बागी नेताओं ने मित्र मंडल के बैनर तले प्रदेश में चुनाव लड़ा और भाजपा के उम्मीदवारों को चुनौती दी जिसके फलस्वरूप भाजपा 2003 का चुनाव हार गई थी. कांग्रेस को फायदा हुआ और वह 43 सीटें जीतने में कामयाब हुई और भाजपा को केवल 16 सीटों पर ही सफलता मिली थी. सुखराम की पार्टी को भी मतदाताओं ने नकार दिया था और उसके सारे उम्मीदवार धराशायी हो गये थे.

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस और प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व वाली भाजपा के बीच हुआ लेकिन इस बार बहुजन समाज पार्टी ने तीसरी शक्ति के रूप में दावा ठोका और सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही रहा लेकिन बसपा एक सीट पर जीत गई. तीन निर्दलीय उम्मीदवार भी जीतकर विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो गये थे. 2008 तक प्रेम कुमार धूमल बड़े नेता बनकर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हो गये थे और धूमल के नेतृत्व में भाजपा ने पहली बार 41 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया था और उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 43.78 तक पहुंच गया था. इस चुनाव में यह बात साफ हो गई कि हिमाचल में तीसरी पार्टी का उदय असंभव है. 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस फिर आमने-सामने थी. कांग्रेस की तरफ से वीरभद्र सिंह और भाजपा की तरफ से धूमल सामने थे. 2012 के चुनावों से पहले प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी.
वीरभद्र सिंह कांग्रेस की सरकार में केन्द्रीय इस्पात मंत्री थे और उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. कांग्रेस कशमकश में थी और नए चेहरे की तलाश में थी. लेकिन चुनाव वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में ही लड़ा गया. हालांकि पार्टी ने उन्हें इस बार की तरह मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया था, इसलिए संभावना थी कि किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. हालांकि सरकार बनने की संभावना दिखाई नहीं दे रही थी क्योंकि धूमल सरकार के खिलाफ कोई विशेष नाराजगी नहीं थी और सत्ता विरोधी लहर भी नहीं थी. उल्टा कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के खिलाफ नाराजगी थी और स्वयं वीरभद्र सिंह को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफा देना पड़ा था. 2012 में भाजपा की हार पार्टी की अंदरूनी खींचतान का नतीजा था. कांगड़ा और आसपास की करीब 20 विधानसभाओं की ज्यादातर सीटों के टिकट बंटवारे में धूमल का बजाय शांता कुमार समर्थकों को अधिक तरजीह मिली थी, फलस्वरूप जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई थी और बड़ी संख्या में भाजपा के बागी चुनाव मैदान में उतर आये थे जिन्होंने वीरभद्र सिंह और कांग्रेस की राह आसान बना दी थी. हारी हुई कांग्रेस जीत गई थी और कांग्रेस हाईकमान ने इसे वीरभद्र सिंह का करिश्मा मानते हुए उन्हें प्रदेश की गद्दी सौंप दी थी. 2012 के चुनावों में भाजपा की हार की दूसरा कारण पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेश्वर सिंह बने, जिनके नेतृत्व वाली हिमाचल लोकहित पार्टी कुल्लू की एक सीट पर जीत गई लेकिन कई सीटों पर वह भाजपा उम्मीदवारों की हार का कारण बने. लेकिन इस बार कोई तीसरा दल मैदान में नहीं है और न ही ज्यादा बागी प्रत्याशी मैदान में हैं. कांग्रेस के ज्यादा बागी मैदान में हैं लेकिन कांग्रेस ने कोई नया प्रयोग नहीं किया है. ज्यादातर अपने पुराने प्रत्याशी या उनके रिश्तेदार मैदान में हैं. कांग्रेस की राह कठिन है. वीरभद्र सिंह को सत्ता विरोध, पार्टी की अंदरूनी लड़ाई और भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व से दो-दो हाथ करने के साथ-साथ प्रेम कुमार धूमल के भी निपटना होगा. अब तक वीरभद्र सिंह खुद को सहज स्थिति में पा रहे थे लेकिन धूमल के सामने खुद को पस्त महसूस कर रहे हैं. भाजपा ने यकीनन वीरभद्र सिंह के सामने एवरेस्ट सरीखी चुनौती पेश की है और अब उन्हें अपनी, अपने बेटे की तथा पार्टी के लिए सम्मानजनक सीटें जीतने की चुनौती है. वह सम्मानजनक सीटें जीतते हैं तो उनका जलवा बरकरार रहेगा अन्यथा वह हरीश रावत की तरह नेपथ्य में चले जाएंगे.
68 सदस्यों वाली हिमाचल विधानसभा के चुनाव में इस बार 62 मौजूदा विधायक फिर से अपना भाग्य आजमा रहे हैं. इनमें मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ-साथ उनके 10 मंत्री, 8 मुख्य संसदीय सचिव और एक विधानसभा उपाध्यक्ष शामिल हैं. पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ-साथ एक दर्जन से ज्यादा पूर्व मंत्री भी चुनाव लड़ रहे हैं. मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य, स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह ठाकुर की बेटी चंपा ठाकुर और विधानसभा अध्यक्ष बृजबिहारी लाल बुटेल के बेटे आशीष कुमार को कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतारा है. 68 विधानसभा सीटों के लिए कुल 338 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. इनमें 19 महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं. भाजपा की ओर से 6 और कांग्रेस की ओर से 3 महिला उम्मीदवार हैं. भाजपा ने वंशवाद पर इस बार कड़ा रूख अपनाया है जबकि कांग्रेस ने पुरानी परिपाटी का ही पालन किया है. वीरभद्र सिंह 6 बार राज्य के मुख्यमंत्री और तीन बार केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं.
प्रेम कुमार धूमल हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से तीन बार सांसद, दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री और दो बार ही विपक्ष के नेता रह चुके हैं. धूमल हिमाचल भाजपा के कद्दावर नेता हैं. धूमल 1998 से 2003 और 2007 से 2012 तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वह गैर कांग्रेस सरकार के ऐसे पहले मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने दोनों बार अपना कार्यकाल पूरा किया है. अपने व्यापक जनाधार के कारण भाजपा का कोई दूसरा नेता उनके करीब भी नहीं ठहरता है.

विजय शर्मा

 

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Reply

Translate »
Skip to toolbar