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कुपोषण से नाटापन और मोटापे से मधमेह बढा

नयी दिल्ली. देश में जागरुकता के अभाव और पौष्टिक खानपान नहीं मिलने से बच्चों में कुपोषण की गंभीर समस्या है जिसके कारण बच्चे कमजोर और नाटेकद के रह रहे हैं वहीं शहरी क्षेत्रों में अनुचित खानपान से लोग मोटापे के कारण मधुमेह और कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं ।
पिछले एक दशक के दौरान नवजात शिशुओं तथा एक से पांच साल के बच्चों की मौत की दर में लगातार कमी होने के बावजूद ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या बनी हुयी है । वणिज्य एवं व्यापार मंडल एसोचेम के अध्ययन में कहा गया है वर्ष 2015 के अंत तक देश में 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे ।
इसके अनुसार पांच साल तक के लगभग 37 प्रतिशत बच्चे कम वजन के थे , 39 प्रतिशत नाटेकद के , 21 प्रतिशत कमजोर तथा आठ प्रतिशत बच्चे गंभीर रुप से कुपोषण कें शिकार थे । वर्ष 2005-2006 के दौरान पांच साल तक के 48 प्रतिशत बच्चे नाटे कद के थे जो 2015-2016 में घटकर 39 प्रतिशत रह गये थे । इस दौरान कमजोर बच्चों का प्रतिशत 19.8 प्रतिशत से बढकर 21 प्रतिशत हो गया । अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्र में 38 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम था जबकि शहरी क्षेत्र में यह संख्या 29 प्रतिशत थी । छह से 23 माह के करीब 10 प्रतिशत बच्चों को ही पूरी खुराक मिल रही थी । झारखंड में एक से पांच साल के 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के पाये गये जबकि बिहार में 37 प्रतिशत , मध्य प्रदेश में 36 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 34.1 प्रतिशत ऐसे बच्चे थे । उत्तर प्रदेश में जहां 50.4 प्रतिशत नाटे कद के बच्चे थे वहीं केरल में यह संख्या 19.4 प्रतिशत थी ।
ग्रामीण क्षेत्र जहां कुपोषण से जूझ रहा है वही शहरी क्षेत्र अनियमित खानपान के कारण मोटापे की समस्या का सामना कर रहा है । अमेरिका और चीन के बाद भारत में सबसे अधिक मोटापे की समस्या है । भारत को मधुमेह की राजधानी भी कहा जाता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2015 के आकड़ों के अनुसार देश में छह करोड़ 92 लाख लोग ‘राजरोग’ मधुमेह से पीड़ित थे ।
वर्ष 2005 से 2015 के दौरान मोटापे से ग्रस्त पुरुषों की संख्या 9 से बढकर 19 प्रतिशत हो गयी जबकि महिलाओं में यह आकड़ा 13 से बढकर 21 प्रतिशत पर पहुंच गया ।
सरकार खाद्यान्न फसलों के माध्यम से ही लोगों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिए अनुसंधान की अनेक परियोजनाएं चला रही है । कृषि वैज्ञानिको ने अनुसंधान के बाद चावल , मक्का और अन्य फसलों एवं सब्जियों की कई ऐसी किस्में विकसित की है जिनमें प्रोटीन , खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व परम्परागत फसलों की तुलना में काफी अधिक है ।

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