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व्यंग्य: इंटरनेट का जमाना!

आज सोनू ने आकर कहा,”भैया क्या करें! आजकल इंटरनेट का जमाना है मैं इतनी सी बात में भला सन्न रह गया। मुझे एकाएक लगा जैसे सोनू के सामने पहाड़ खड़ा हो गया हों और उन जटिल समस्या का कोई समाधान नहीं हैं। वाकई में मानना पड़ेगा,इंटरनेट भी क्या चीज है,साहब! घन्टो बैठे रहने पर भी गजब की थकान नहीं होती।
इंटरनेट तो भैया कलयुग का गिफ्ट है जो तैतीस करोड़ देवी-देवताओं द्वारा भी इस मिसाइल का परीक्षण नहीं हुआ,वह एक मानव ने कर दिखाया। यदि पहले के जमाने में भी इंटरनेट होता तो मर्यादा पुरोषतम् को अलग-थलग जगहों पर सीता मैया की खोज में भटकना न पड़ता।
अब सोनू ने धीरे से मेरे कान में कहा-भैया मेरा बेटा सुरेश तो नेट ‘धनाधन’ चलाता है फिर मैं कैसे नहीं? सवाल तो हल्का लग रहा था मगर कोई प्रत्युत्तर मेरे पास में भी नहीं था आखिर कहे तो क्या कहे। कुछ समय सोचने के बाद कहा -मेरे मित्र तुम आदिम जमाने से हों!तेरा लाड़ला मॉडर्न है। उसने बत्तीसी दिखाकर मेरी हाँ में हाँ मिलाकर गहरी साँस ली,यह हुई ना बात! मै भी दिलासा के शब्दों को नींबू की तरह निचोड़ रहा था,भाई चिंता मत कर। इंटरनेट से लगा की जहाँ इंसान पहली बार उनको जानने में जितना रोता है,उतना ही वहाँ से आखिरी में निकलने पर दुःखी होता हैं। अब तो साहब 4G का जमाना है जिनका तो पूछो भी मत! आज हर चौराहे पर इंटरनेट का डेरा है,इस डेरे में प्रमुख प्रतिभागी कॉलेज के युवा दिखते है,मगर उनकी छाया में साथ देने वाली युवतियों का रोल भी कम नहीं है। वो तो नेट ऐसे चलाती है जैसे नगरपरिषद का कोई आदमी कूड़ा-दान! इंटरनेट के जमाने में कुछ लोग हमारे समीप बैठे हुए होते है मगर उनकी बजाय वो समीप लगने लगते है जिससे अनेकों माध्यमों से घण्टों बतियाते है! और पास के बैठे हुए मानवों को अनदेखा कर देते है यह सब इंटरनेट का वरदान कहो या अभिशाप! इसमें बुड्ढे और बच्चे भी कभी कभी चोरी-चुपके छोटी सी आहुति लगा देते है,कुछ मिनटों में नेट का कार्यक्रम कर देते है! बच्चे कभी कभी बड़ो के द्वारा चलाने पर देखते है अवसर पाकर प्रैक्टिकल करने की इच्छा रहती है वो भी गैर-हाजिरी में दुनिया की सैर कर देते है।
मगर राजनीति में इनका प्रकोप अलग है। राजनेता ट्वीट करते है और उन पर बहस होना!आम बात हो गई है। अब नेताजी भी समझ रहें है कि आखिर कई घण्टों के भाषण को संक्षिप्त सूत्रों में ढाला जाए तो इंटरनेट हमारे भगवान के समान है और इनके सहारे ही कोई अलग से एप्स हों तो संसद में जाने का काम ही न रहें। इंटरनेट जी जैसे महापुरुष के सहारे से ही विपक्ष की हड्डी पसली एक कर दें।
इतनी बातों बातों में,मैं आर्टिकल लिख रहा था सोनू को कुछ समझ में नहीं आया और दिल-ए-सुकून होता भी कैसे? आखिर में होंठ फड़काते और निराश होते हुए कहा-कि तुम इंटरनेट को भला कैसे चलाते हों? मैने हँस कर कह दिया-भाई इंटरनेट का जमाना जो है!

लेखक :  जालाराम चौधरी, बाड़मेर, राजस्थान

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