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बाल दिवस कितना सार्थक

हमारे देश के बच्चों को बाल दिवस के मौके पर खुश होना चाहिए, लेकिन सच्चाई यह है कि देश के बच्चे तनावपूर्ण माहौल में है, क्योंकि हमने ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर दिया है, जिनका हमारे पास ही नियंत्रण नहीं है। बच्चों को सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा भी नहीं है, जिस कारण उन्हें मास्क लगाकर स्कूल जाना पड़ता है। स्मोक के कारण बच्चे अपने घरों में कैद हो गए हैं और खेलने के लिए पार्क में भी नहीं जा सकते हैं। यह बहुत चिंता जनक बात है कि बच्चों का स्वच्छ हवा का अधिकार भी छिन गया है। वहीं कुपोषण, अशिक्षा तथा बाल मजदूरी जैसी समस्यायें भी बच्चों के विकास में बाधक बन गयीं हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015 – 16 के अनुसार देश में बाल मृत्यु दर 50% से भी अधिक है तथा आधे से ज्यादा बच्चे 5 वर्ष की उम्र से पहले ही मर जाते हैं। यहां भारत की तुलना दूसरे देशों से करें तो समझ आता है कि भारत की हालत कितनी शर्मनाक और गंभीर है। नेपाल में बाल मृत्यु दर 34.5 फीसदी, बांग्लादेश में 34.2 फीसदी तथा चीन में 9.9 फीसदी है। यानी इस मामले में हमारी स्थिति नेपाल और बांग्लादेश से भी खराब है। अगर बच्चों में कुपोषण की बात करें तो भारत में 4 करोड़ 82 लाख बच्चे कुपोषित हैं। भारत के 38 फ़ीसदी बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के हिसाब से कम है तथा देश के 36 फिसदी बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम है और 1 करोड़ 44 लाख बच्चे मोटापे की समस्या से ग्रसित है। यानी एक तरफ तो वह बच्चे हैं, जिनका वजन बहुत ज्यादा है, तथा एक तरफ वह बच्चे हैं जिनका वजन बहुत कम है तथा हेल्दी बच्चों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। बर्ष 2016 में देश के 57 फीसदी बच्चों को एनीमिया की बीमारी थी। अगर पड़ोसी देशों से तुलना करें तो श्रीलंका में 25 फीसदी बच्चे एनिमिक, नेपाल में 42 फीसदी तथा बांग्लादेश में 40 फीसदी बच्चों को एनीमिया हैं इस मापदंड में भी हम अपने पड़ोसी देशों से बहुत पीछे हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा बाल मजदूर भी हमारे देश में हैं । देश में लगभग तीन करोड़ बाल मजदूर हैं। इन समस्याओं के बावजूद भी हम बाल दिवस मनाते हैं। हम आजादी के 70 वर्षों में भी बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाए। बच्चे देश का भविष्य है तथा इनके विकास की जिम्मेदारी समाज और सरकार की है। बदलते परिवेश में इसके लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अगर माँ बाप भीख मांग रहे हैं तो बच्चे भी मांग रहे हैं।क्या ये बाल दिवस का अर्थ जानते हैं। कभी ये कोशिश की गयी कि इन भीख माँगने वाले बच्चों के लिए सरकार कुछ करेगी। जो कूड़ा बीन रहे हैं वो इसलिए क्योंकि उनके घर को चलने के लिए उनको पैसे की जरूरत है।कहीं बाप का साया नहीं है, कहीं बाप है तो शराबी जुआरी है, माँ बीमार है, छोटे-छोटे भाई बहन भूख से बिलख रहे हैं। कभी उनकी मजबूरी को जाने बिना हम कैसे कह सकते हैं कि माँ बाप बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते हैं।अगर सरकार उनके पेट भरने की व्यवस्था करे तो वे पढ़ें लेकिन क्या यह कभी हो सकता है? क्या इन बाल दिवस से अनभिज्ञ बच्चों का बचपन इसी तरह चलता रहेगा?

बीके आरती
ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय
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