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हिमाचल में उच्च शिक्षा का व्यापार गुणवत्ता पर खड़ा कर रहा है बड़ा सवाल!

प्रदेश में उच्च शिक्षा के निजीकरण ने देशभर के निजी विश्वविद्यालयों को जहां अपनी ओर आकर्षित किया है, वहीं अब इन विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं. देश का शायद ही कोई ऐसा निजी विश्वविद्यालय या तकनीकी शिक्षा संस्थान होगा जो यहां न हो. हिमाचल अब उच्च शिक्षा का हब बन गया है. हैरत की बात यह है कि तमाम ढांचागत सुविधाओं के अभाव के बावजूद इन विश्वविद्यालयों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता मिल चुकी है और अब यहां धड़ल्ले से शिक्षा का व्यापार फल-फूल रहा है. इन विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली इतनी गुप्त है कि प्रदेश का निजी विश्वविद्यालय रेगुलेटरी आयोग भी इससे अनभिज्ञ है. इनकी कार्यप्रणाली की एक झलक हाल ही में देखने को मिली जब किसी परिचित ने दिल्ली से फोन पर किसी डिग्री का सत्यापन कराने का आग्रह किया. पूछताछ करने पर पता चला कि उनकी एक रिश्तेदार गुजरात में रहती है और किसी सेंटर के माध्यम से उसने हिमाचल के निजी विश्वविद्यालय से एम.एससी की डिग्री हासिल की है और विश्वविद्यालय ने सत्यापित किया है कि उसने विश्वविद्यालय से रेगुलर पढ़ाई करके डिग्री ली है. आज जब हम डिजीटल इंडिया की बात कर रहे हैं तब भी इन निजी विश्वविद्यालयों ने डिग्री सत्यापन के लिए विशेष व्यवस्था की है और अभ्यर्थी स्वयं अपने पहचान पत्र के साथ 1500 रूपए जमा कराकर ही अपनी डिग्री सत्यापित करा सकता है. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कोई उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल ही न उठा पाए. खैर डिग्री का सत्यापन हो गया लेकिन ऐसे अभ्यर्थियों का कहना है कि वे कभी विश्वविद्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुए. पता चला है कि यह विश्वविद्यालय इसी प्रकार देशभर के सेंटरों के जरिए शिक्षा का व्यापार और रहे हैं और खूब फल-फूल रहे हैं. यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि समय-समय पर यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों का सत्यापन हो सके, इसलिए शिक्षा का व्यापार फल-फूल रहा है और प्रदेश में कार्यरत आयोग इन विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने में कामयाब नहीं हो पा रहा है. राजस्थान में भी कई निजी विश्वविद्यालय इस प्रकार के शिक्षा के व्यापार में संलिप्त पाये गये थे और राजस्थान उच्च न्यायलय के आदेश पर जांच हुई थी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई थी लेकिन अब वहां नियमित जांच की जाती है.
पिछले एक दशक में शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है. उदारीकरण और निजीकरण के दौर में शिक्षा का बाज़ारीकरण हो गया है और शिक्षा अब कोई पुण्य का काम नहीं रह गयी है. शिक्षा के व्यापारीकरण के कारण हिमाचल जैसे छोटे पहाड़ी राज्य में उच्च शिक्षण संस्थान खूब फल-फूल रहे हैं. 2010 से पहले हिमाचल में केवल सरकारी कॉलेज और विश्वविद्यालय थे, जिनके बदौलत पूरी शिक्षा व्यवस्था टिकी हुई थी और प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालय में प्रवेश न मिलने पर नवयुवक-युवतियाँ देश के दूसरे भागों से शिक्षा अर्जित करते थे लेकिन 2010-11 में उच्च शिक्षा में निजी संस्थानों को द्वार खोल देने से स्थिति बदल गयी है. यह निजी संस्थान यहां केवल ज्ञान बांटने नहीं आये हैं. हिमाचल इनका प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया है. उच्च शिक्षा और खासकर पेशेवर शिक्षा विशुद्ध रूप से लाभ का सौदा बन गयी है और इस बहती गंगा में हर कोई डुबकी लगा लेना चाहता है.
हिमाचल प्रदेश स्टेट रेगुलेटरी कमीशन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में आज 17 निजी विश्वविद्यालय, 17 इंजीनियरिंग कॉलेज, 68 बी.एड., 9 एम.एड., 20 पॉलिटेकनिक कॉलेज, 39 नर्सिंग, फार्मेंसी, आयुर्वेदिक कॉलेज, 58 संस्कृत, लॉ, बॉयोसाईंस कॉलेज कार्यरत हैं. 17 निजी विश्वविद्यालयों ने तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मान्यता प्राप्त कर ली है। लेकिन क्या सचमुच इन विश्वविद्यालयों में समुचित ढांचागत सुविधाएं एवं मानदंडों के अनुरूप शैक्षणिक योग्यता वाले प्राध्यापक हैं? देशभर से इस प्रकार की खबरें आती हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की टीम जब भी निरीक्षण के लिए जाती है तो तात्कालिक तौर पर किराये पर ढांचागत सुविधाएं जुटा ली जाती हैं और अनुबंध के आधार पर शिक्षकों का कोटा पूरा दिखा दिया जाता है और औपचारिकता पूरी होने के बाद स्थिति बदल जाती है. हालांकि हिमाचल प्रदेश में प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन बनाया गया है और उसकी गतिविधियों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि वह पूरी तरह सक्रिय है और अलग-अलग जिलों में जाकर कैंप कोर्ट आयोजित कर सुनवाई की प्रक्रिया भी अपनाती है तथा ऑनलाइन शिकायत प्रणाली के आधार पर भी शिकायतों की निपटारा करता है और स्वतः संज्ञान के आधार पर भी कार्रवाई करता है लेकिन बावजूद इसके प्रदेश के कई जिलों में ऐसे अनेकों संस्थान हैं, जो बिना किसी मान्यता के धड़ल्ले से अपना व्यापार कर रहे हैं. इसी वर्ष रेगुलेटरी कमीशन में कई मामलों में देखने में आया है कि कई ऐसे शिक्षण संस्थान पिछले 10-15 साल से सक्रिय थे और कोई किसी कम्पनी के फ्रेंचाइजी के तौर पर काम कर रहा था तो कोई देशभर के विभिन्न राज्यों से चलने वाले विश्वविद्यालयों के सेंटर चलाकर खूब धन बटोर रहे थे. इसी वर्ष रेगुलेटरी कमीशन ने प्रदेश के 6 से 8 संस्थानों को बंद कराया है जो बिना किसी मान्यता के वर्षों कैसे सक्रिय रहकर प्रदेश भर में अपने सेंटरों के माध्यम से सर्टिफिकेट बेचने का धंधा कर रहे थे, जिनकी कोई अहमियत नहीं होती थी लेकिन भोले-भाले नवयुवक इन सेंटरों से कोर्स करके नौकरी की आस में वर्षों भटकते थे। अभी भी प्रदेश में ऐसे सैंकड़ों संस्थान चल रहे हैं. ऐसे संस्थान बाकायदा स्टाम्प पेपर पर ऐग्रीमेंट करके झांसा देते हैं कि उनके संस्थान से कोर्स करने पर नौकरी देंगे और बेरोजगारी के दौर में आसानी से युवक-युवतियां इनके झांसा में आ रहे हैं. रेगुलेटरी कमीशन को चाहिए कि वह जिलाधिकारी एवं जिला पुलिस अधीक्षक के जरिए यह सुनिश्चित करे कि कोई भी गैर मान्यता प्राप्त संस्थान युवक-युवतियों को अपनी जालसाज़ी का शिकार न बना पाये. रेगुलेटरी कमीशन में कुल 8-10 स्टाफ है और एक सदस्यीय कमीशन शिकायतों की सुनवाई करता है व यहीं फीस से लेकर, कर्मचारियों की सेलरी व सहित कर्मचारियों व शिक्षा ग्रहण करने वाले युवक-युवतियों की शिकायतों का निपटारा किया जाता है और लेकिन इतने अधिक निजी उच्च शिक्षण संस्थानों की निगरानी करना उसके मुश्किल है. अत: उसे और अधिक चुस्त-दुरूस्त बनाये जाने की जरूरत है ताकि निजी शिक्षण संस्थान उच्च शिक्षा के नाम पर प्रदेश के युवाओं का दोहन न कर सकें.
उच्च शिक्षा का निजीकरण इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि सरकारी कॉलेज और विश्वविद्यालय उस अनुपात में नहीं खुल पाये हैं और न ही शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कर पाये हैं. नब्बे के दशक में शुरू हुआ शिक्षा का निजीकरण कहां से कहां पहुंच गया है कि यह भी सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है. देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 27 विश्वविद्यालय थे, आज इनकी संख्या बढकर 740 हो गई है. केंद्रीय विश्वविद्यालय की संख्या 46, निजी विश्वविद्यालय 227, राज्यों के अधीन विश्वविद्यालय 342 और डीम्ड विश्वविद्यालय की संख्या 125 है. केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्यों के अधीन विश्वविद्यालय या फिर निजी विश्वविद्यालय हों। कुछ को छोड़कर सभी को लेकर एक सा नजरिया है कि शिक्षा का स्तर बेहतर नहीं है.
निजी शिक्षण संस्थानों में कम फीस नहीं है. फीस के अलावा और कई प्रकार के शुल्क इन संस्थानों द्वारा वसूले जाते हैं। इन शिक्षण संस्थानों में वही शिक्षा ग्रहण कर पा रहा है, जिसके पास पर्याप्त धन है। हालांकि कई अभिभावक बैंकों तथा रिश्तेदारों से कर्ज लेकर भी अपने बच्चों को इस उम्मीद से पढ़ा रहे हैं कि अच्छी शिक्षा ग्रहण करके रोजगार हासिल कर पायेंगे. इन निजी संस्थानों को खुले हुए पांच साल से अधिक हो गये हैं लेकिन ऐसा कोई आंकड़ा सामने नहीं आ पाया है कि इन संस्थानों से कितने युवक-युवतियों ने शिक्षा ग्रहण की और कितने नौकरी हासिल कर पाये हैं. रेगुलेटरी कमीशन को इन निजी शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने वालों तथा इनमें से कितने रोजगार हासिल कर पाये हैं और कितने प्रयासरत हैं और नौकरी पाने वाले किस वेतनमान पर काम कर रहे हैं, इसके आंकड़े जुटाकर जारी करने चाहिए ताकि स्वयं यह शिक्षण संस्थान भी रोजगार जुटाने के लिए विभिन्न प्रयास करें.

विजय शर्मा

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