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महिलाओं के प्रति कट्टरता की छवि तोड़ने की और अरब देश

देर सबेर सउदी अरब में अब महिलाओं के प्रति कट्टरवादी सोच में बदलाव की बयार आने लगी है। हाल ही में सउदी महिलाओं को खेल के मैदान में जाकर वहां खेलों का लुत्फ उठाने की अनुमति दे दी है। अब सउदी अरब की महिलाएं भी खेल स्टेडियम में जाकर में खेल प्रतियोगिताओं का आनंद ले सकेगी। हांलाकि यह अनुमति चुने हुए स्टेडियमों में ही होगी पर देर आयद दुरस्त आयद शुरुआत तो होने ही जा रही है। हांलाकि सउदी अरब ने कट्टरता की छवि को तोड़ने के प्रयास 2015 से ही शुरु कर दिए थे। पहले स्थानीय निकाय के चुनावोें में महिलाओं को मतदान करने या चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई वहीं इसी साल सितंबर में महिलाओं को वाहन चलाने की अनुमति भी दी जा चुकी है। इसी माह सउदी अरब के खेल प्राधिकरण के अध्यक्ष तुर्की अल अशेख ने खेल क्षेत्र में बड़े बदलावों की घोषणा करते हुए रियाद, दम्मम और जेद्दा के खेल स्टेडियमों में महिलाओं और परिवार के साथ आने आने वाले दर्शकों को अनुमति देने का निर्णय किया है। हांलाकि यह अनुमति अगले साल से लागू होगी। अशेख ने पिछले दिनों ही राजकुमारी रीमा बिंत बंदार को सउदी फैडरेशन फाॅर कम्यूनिटी स्पोर्ट का अध्यक्ष नामित किया है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं और रीमा ने पहला कदम उठाते हुए जेद्दा में महिलाओं के लिए 5 स्टूडियों जिम खोले जा चुके हैं। रीमा का कहना है कि इससे महिलाओं को व्यायाम के प्रति प्रोत्साहित किया जा सकेगा।
21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति लेंगिक भेदभाव होना बेहद चिंतनीय है। आज दुनिया के देशों में महिलाओें की भागीदारी कहां से कहां पहुंच गई है। अतंरीक्ष तक में महिलाओं की उड़ान होने लगी है। लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों के समकक्ष होते हुए भागीदारी तय की है। प्रबंधन के क्षेत्र में तो महिलाओं का कोई सानी ही नहीं है। ऐसे में कुछ सउदी अरब जैसे कट्टर पंथी देशों मंे महिलाओं के प्रति दोयम दर्जें का व्यवहार चिंतनीय है। हांलाकि महिलाओं के प्रति अपराधों में भी तेजी आई है। यही कारण है कि महिला उत्पीडन के प्रति देश-दुनिया के लोग लामबंद होकर आवाज उठाने लगे हैं। यही कारण है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों खासतौर से नारी उत्पीडन के खिलाफ आवाज बुलंद हुई है। पर इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि नारी उत्पीडन के मामलें भी तेजी से बढ़े हैं। नारी उत्पीड़न के आंकड़े चैकाने वाले होने के साथ ही उत्पीडन में सबसे अधिक हाथ भी परिवारजनों या जानपहचान वालों का ही देखा जा रहा है। हांलाकि बीच चैराहे या यों कहें कि राह चलते उत्पीडन के मामलें भी बढ़े हैं। हमारे देश में भी करीब पांच साल पहले हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला के रख दिया था, उसके बाद कानून भी कड़े हुए पर दुर्भाग्य यह है कि दूध मुंही बच्चियों तक के साथ छेडछाड़ व दुराचार के समाचार आए दिन मीडिया की सक्रियता के चलते सामने आते जा रहे हैं। यह भी साफ हो जाना चाहिए कि यह हमारे देश की ही घटना नहीं है बल्कि अमेरिका व योरोपीय देश में भी इस बीमारी से बुरी तरह ग्रस्त है। ऐसे में पूरी तरह से महिला सशक्तिकरण की बात करना अभी बेमानी ही है।संयुक्त राष्ट्र् संघ के आंकडों के अनुसार दुनिया में हर तीन में से एक महिला का कभी ना कभी शारीरिक-मानसिक शोषण होता है। आंकड़ें वास्तव में चैकाने वाले हैं। दुनिया में 71 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक या यौन शोषण व हिंसा का शिकार होती है। अमेरिका मंे प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिचितों द्वारा ही मार दी जाती है। दक्षिण अफ्रिका मंे हर 6 घंटे में एक महिला को उसके साथी द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता है। हमारे देश में 53 मिनट में यौन शोषण व 28 मिनट में अपहरण के मामलें सामने आते हैं। अब तो रेप व छेडछाड के मामलों में भी लगतार बढ़ोतरी हो रही है। यह आंकड़े भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो पर इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि महिला अस्मिता को ठेस पहुंचाने के मामलें कम नहीं हो रहे हैं। तस्वीर का निराशाजनक पहलू यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद महिलाओं के अस्मत से खिलवाड, फब्तियां कसने, यौन शोषण, जबरन छूने, मानसिक कुंठा का इजहार करने के मामलें अधिक आए हैं। सबसे निराशाजनक यह कि टेलीविजन पर सर्वाधिक देखे जाने वाले सीरियलों में महिलाओं द्वारा महिलाओं के खिलाफ साजिशों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है जिससे मानसिकता प्रभावित हो रही है।
सउदी अरब ने महिलाओं के प्रति भेदभाव वाली छवि को सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाना सराहनीय है। हांलाकि सउदी अरब में आज भी महिलाएं पुरुष सदस्यों की मंजूरी के बिना कोई बड़े फैसले नहीं ले सकती। घर के बाहर नहीं जा सकती। शौहर, सगे भाई या पिता के अलावा किसी अनजान व्यक्ति से बात नहीं कर सकती। निर्धारित ड्र्ेस कोड में ही रहना पड़ता है ताकि महिलाओं की खूबसूरती औरों के सामने नहीं आ सके। हांलाकि महिलाओं को वाहन चलाने की अनुमति देकर बड़ा कदम उठाया जा चुका है।
इससे पहले महिलाओं को राष्ट्र्ीय दिवस में आमंत्रित कर अच्छा संकेत दिया जा चुका है। महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए जिस दिशा में सउदी अरब बढ़ रहा है वह निश्चित रुप से सराहनीय है। हांलाकि यह अभी शुरुआत ही मानकर चला जा सकता है। सउदी अरब ही नहीं दुनिया के अन्य कट्टरपंथी देशों को भी महिलाओं के प्रति अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। हांलाकि दुनिया के महिलाएं एकजुट होने लगी है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और सभ्य समाज की लिए शर्मनाक भी है महिलाओं के साथ ज्यादती या ज्यादती का प्रयास। इसे भी रोकने के लिए सभ्य समाज को आगे आना होगा। देखा जाए तो इसके लिए घर से ही शुरुआत करनी होगी क्योंकि यह सर्वमान्य सच सामने आ चुका है कि सबसे ज्यादा असुरक्षित घर परिवार या जान पहचान वाले कुंठित लोगों से ही है महिलाएं। महिलाआंे को भी खुले पन की आड़ नहीं लेनी होगी। इस सबमें सउदी अरब की कट्टरउ पंथी दायरें से बाहर निकलने के प्रयास निश्चित रुप से सराहनीय कहे जा सकते हैं। हांलाकि सुधारों में तेजी लानी होगी नहीं तो अरब देशों या कट्टरपंथी देशों की महिलाएं मुख्य धारा में नहीं आ पाएगी।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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