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गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा को खूब छका रहे हैं राहुल गांधी

गुजरात विधानसभा चुनावों के शुरूआती सर्वेक्षणों को दरकिनार कर राहुल गांधी कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करने में जुटे हैं. राहुल चुनाव से पूर्व अध्यक्ष बनने वाले हैं और अगर कांग्रेस गुजरात का चुनाव जीतने में सफल हो जाती है तो यह राहुल गांधी की बड़ी जीत होगी और कांग्रेस इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात मॉडल की असफलता बताते हुए 2019 के लोकसभा चुनावों का डंका पीटने लगेगी. गुजरात में राहुल गांधी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. उन्हें सिर्फ पाना है इसलिए वह फ्रंटफुट पर खेलते हुए भाजपा को खूब छका रहे हैं. गुजरात के पिछले चुनाव भले ही अलग रहे हों लेकिन इस बार का चुनाव जाति और धर्म के आधार पर लड़ा जा रहा है. गुजरात का अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा कांग्रेस के साथ खड़ा रहा है और जातीय संघर्ष पिछले दो साल से अपना रंग दिखा ही रहा है जिसमें तीन नए युवकों हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी को राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिला दी है. हार्दिक पटेल अपने पटेल समुदाय के लिए लड़ रहे हैं. जिग्नेश मेवाणी दलितों के नेता हैं और अल्पेश ठाकोर ओबीसी नेता हैं. राहुल गांधी को इन तीनों ने अपने-अपने समुदायों से समर्थन का ऐलान किया है. तीनों युवा नेता हैं और गुजरात में अपने समुदायों में इनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. इन तीनों के समर्थन से राहुल गदगद हैं और अब गुजरात में भाजपा और कांग्रेस में कांटे की लड़ाई बन गई है. राहुल गांधी ने भाजपा को बिहार की तर्ज पर जातीय संघर्ष के चक्रव्यूह में फंसाकर लड़ाई को रोचक बना दिया है
पिछले 22 सालों में पहली बार कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर देती हुई दिखाई दे रही है. राहुल गांधी भाजपा को जुमलों की पार्टी करार दे रहे हैं. नोटबंदी, जीएसटी से आहत व्यापारियों को ढांढस बंधा रहे हैं. भाजपा को रोजगार के झूठे वायदों पर घेर रहे हैं और भाजपा अपने ही गढ़ में घिर गई है. भाजपा के तमाम केन्द्रीय मंत्रियों सहित प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर अकेले राहुल गांधी भारी पड़ रहे हैं. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की कहना है कि कांग्रेस के पक्ष में यहां कई समीकरण काम कर रहे हैं. भाजपा यहां पिछले 22 सालों से सत्ता में है. गुजरात में सत्ता विरोधी लहर पूरे प्रदेश में फैल चुकी है. भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की लामबंदी बढ़ रही है. 23 वर्षीय हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के चुनाव प्रचारकों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है. हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा के नेता पुलिस संरक्षण में अपने क्षेत्र में प्रचार कर रहे हैं. 5,000 से ज्यादा गांवों में लोगों ने भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रवेश पर ही प्रतिबंध लगा दिया है, राहुल गांधी ने 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में 52 विधायकों वाले सौराष्ट्र में अच्छा-खासा प्रभाव जमाया है. यह क्षेत्र भाजपा का गढ़ माना जाता था लेकिन इस बार भाजपा यहां कमजोर दिखाई पड़ रही है. पाटीदार समुदाय के नेता हार्दिक पटेल से गठबंधन बनाकर कांग्रेस ने भाजपा की बांह मरोड़ने का काम किया है.
गुजरात में राहुल गांधी पूरी भाजपा पर भारी पड़ रहे हैं. इसका बड़ा कारण गुजरात में भाजपा के मतदाताओं का मोहभंग होना बताया जा रहा है. भाजपा प्रदेश में पिछले 22 वर्षों से सत्ता में है और केन्द्र में भी तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुकी है लेकिन कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है उल्टा नोटबंदी और जीएसटी से रोजगार एवं कामधंधे चौपट हो गये हैं. आर्थिक मंदी तथा ओ.बी.सी., पाटीदार एवं दलित समुदायों में असंतोष के साथ-साथ नोटबंदी एवं जी.एस.टी. से छोटे व्यापारियों एवं मध्य वर्ग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात भाजपा में कोई कद्दावर स्थानीय नेता नहीं उभर पाया है. विजय रूपाणी बहुत लोकप्रिय नेता नहीं हैं और माना जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल भी उन्हें ज्यादा पसंद नहीं करती थी लेकिन अमित शाह की नजदीकी के कारण उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली है लेकिन वह भी पटेल और पाटीदार समुदाय को आरक्षण की मांग को लेकर शांत नहीं कर पाये हैं. आंदोलन को प्रशासन और पुलिस के जरिए दबा दिया गया लेकिन वह समुदाय अब वोटों के जरिए भाजपा के हिसाब चुकता करना चाहता है. गत तीनों विधानसभा चुनावों दौरान दोनों पार्टियों के वोटों का अंतर करीब 11 प्रतिशत के आसपास ही रहा है. लेकिन भाजपा कांग्रेस के मुकाबले दोगुनी से अधिक सीटें जीतने में सफल होती रही है. लेकिन अब यदि पानीदार, पटेल, दलित, ओबीसी और मुस्लिम मतों का गणित यदि कांग्रेस के पक्ष में जाता है तो स्थिति उल्टी हो सकती है.

गुजरात का मुस्लिम मतदाता हमेशा कांग्रेस के साथ रहा है और गुजरात में इस पिछले डेढ साल से तीन युवा नेताओं हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर का दौर चल रहा है. हार्दिक पटेल पटेल समुदाय से हैं और उसे भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है लेकिन आरक्षण के मुद्दे पर पटेल समुदाय इतना उतेजित है कि वह भाजपा को हराने की बात कर रहा है. दरअसल पटेल आऱक्षण आंदोलन के दौरान कई युवा मारे गए थे और कई युवाओं तथा पटेल समुदाय के नेताओं पर मुकदमें बना दिये गये हैं जिसे लेकर पटेल समुदाय में रोष है. ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर बकायदा कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. पूरे गुजरात में ओबीसी 54 प्रतिशत के आस पास है. अल्पेश का कांग्रेस में जाना बीजेपी के लिए बड़ा खतरा रहा है. यहां ओबीसी वोटर भाजपा को वोट देते आ रहे थे लेकिन इस बार भाजपा से नाराज होकर कांग्रेस के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं.जिग्नेश मेवानी की करीब 7 फीसदी दलित वोटर पर अच्छी पकड़ है. जिग्नेश मेवानी सार्वजनिक तौर कई बार बीजेपी को हराने की बात कर चुके हैं. अगर गुजरात में हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी का जलवा चल गया तो करीब 122 सीटों पर भाजपा को लोहे के चने चबाने रहेंगे. यह नेता कांग्रेस के पक्ष में अपील कर द
रहे हैं और अब भाजपा हांफती हुई नजर आ रही है. कुछ चुनाव विश्लेषकों और निष्पक्ष पत्रकारों का आंकलन है कि यदि हार्दिक पटेल, अल्पेश और जिग्नेश की अपील पर समुदायों ने वोट किया तो भाजपा की हालत पिछले चुनावों से उल्ट हो जाएगी और विधायकों तथा मंत्रियों को अपनी जमानत बचाना मुश्किल होगी.
राहुल गांधी भी इस लड़ाई के आगे ले जा रहे हैं. सोशल मीडिया से लेकर जमीन पर और जाति – धर्म की सभी सीमाओं को लांघकर विधानसभा चुनावों के रण में भाजपा को चुनौती दे रहे हैं. राहुल गांधी ने पिछले 22 सालों से वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस में प्राण फूंक दिये हैं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश है तो भाजपा कार्यकर्ताओं के होश फाख्ता हैं. असल में राहुल गांधी के पास खोने के लिए कुछ है ही नहीं, इसलिए हासिल करना है और अगर पार्टी जीत जाती है तो उनके लिए 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ाई का अगला मंच होगा और इसके लिए पार्टी और कार्यकर्ताओं को अपने तरीके से तैयार करने के लिए उनके पास पूरा समय होगा. गुजरात चुनाव उनकी भविष्य की सफलता-असफलता का पैमाना भी बनेगा.

विजय शर्मा

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