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असाध्याय बीमारियों का ईलाज है तुलसी

प्राचीन भारतीय समाज में तुलसी को पवित्रा मानते हुए सुबह शाम जल चढाने के साथ ही दीपक जलाकर पूजन की परम्परा रही है। पंतजलि आयुर्वेदिक हरिद्वार के आचार्य बालकृष्ण जी के अनुसार तुलसी अनेक असाध्याय तथा जीवन शैली से जुड़े रोगों का अचूक ईलाज है। तुलसी सांस की बीमारी, मुंह के रोगों, बुखार, दमा, पफेपफड़ों की बीमारी, हृदय रोग तथा तनाव से छुटकारा पाने में रामबाण साबित होती है। तुलसी शरीर में प्रतिरोध्क क्षमता बढ़ाने में वायरल संक्रमण बालों तथा त्वचा के रोगों का भी कारगर उपाय है। पंतजलि आयुर्वेदिक हरिद्वार के आचार्य बालकृष्ण जी के अनुसार निम्नलिखित रोगों में तुलसी के प्रयोग से सस्ता तथा सुलभ तरीके से उपचार किया जा सकता है।

औषधीय प्रयोग विधि

 

शिरो रोग:

  • तुलसी की छाया शुष्क् मंजरी के 1-2 ग्राम चूर्ण को मधु के साथ खाने से शिरो रोग से लाभ होता है।
  • तुलसी के 5 पत्रों को प्रतिदिन पानी के साथ निगलने से बुद्धि, मेध तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है।
  • तुलसी तेल को 1-2 बूंद नाक में टपकाने से पुराना स्मि दर्द तथा अन्य सिर संबंधी रोग दूर होते है।
  • तुलसी के तेल को सिर में लगाने से जुएं व लीखें मर जाती है। तेल को मुंह पर मलने से चेहरे का रंग साफ हो जाता है।

कर्ण रोग:

  • कर्णशाल – तुलसी पत्रा स्वरस को गर्म करके 2-2 बून्द कान में टपकाने से कर्णशूल का शमन होता है।
  • तुलसी के पत्ते, एरंड की काॅपले और चुटकी भर नमक को पीसकर कान पर उसका गुनगुना लेप करने से कान के पीछे ; कर्णशूलद्ध की सूजन नष्ट होती है।

मुख रोग

  • दंतशूल- काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दन्त के नीचे रखने से दंतशूल दूर होता है।
  • तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से कंठ के रोगों में लाभ होता है।
  • तुलसी रस युक्त जल में हल्दी और संेध नमक मिलाकर कुल्ला करने से मुख, दांत तथा गले के विकार दूर हाते है।

वक्ष रोग:

  • सर्दी, खांसी, प्रतिश्चाय एंव जुकाम-तुलसी पत्रा ;मंजरी सहितद्ध 50 ग्राम, अदरक 25 ग्राम तथा काली मिर्च 15 ग्राम को 500 मिली जल में मिलाकर क्वाथ करें चैथाई शेष रहने पर छाने तथा इसमें 10 ग्राम छोटी इलायची के बीजों को महीन चूर्ण डालें व 200 ग्राम चीनी डालकर पकायें और एक बार की चाशनी हो जाने पर छानकर रख लें।
  • इस शर्बत का आधे डेढ़ चम्मच की मात्रा में बच्चों को तथा 2 से चार चम्मच तक बड़ों को सेवन कराने से खांसी, श्वास, काली खांसी, कुक्कर खांसी, गले की खराश आदि से पफायदा होता है।
  • इस शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम तथा दमा में बहुत लाभ होता है।
  • तुलसी की मंजरी, सोंठ, प्याज का रस और शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी और बच्चे के दमें में लाभ होता है।

उदर रोग

  • वमन: 10 मिली तुलसी पत्रा स्वरस में समभाग अदरक स्वरस तथा 500 मिग्रा इलायची चूर्ण मिलाकर लेने से छर्दि बंद हो जाती है।
  • अग्निमांद्य-तुलसी पत्रा के स्वरस अथवा पफाण्ट को दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से अजीर्ण अग्निमांद्य, बालकों की वकृत प्लीहा की विकृतियों में लाभ होता है।
  • अपच-तुलसी की 2 ग्राम मंजरी को पीसकर काले नमक के साथ दिन में 3 से 4 बार देने से लाभ होता है।

प्रजननसंस्थान संबधी रोग

  • स्तम्भन-2 से 4 ग्राम तुलसी मूल चूर्ण और जमीकन्द चूर्ण को मिलाकर 125-250 मिग्रा की मात्रा में पान में रखकर खाने से स्तम्भन दोष मिटता है
  • प्रसवोत्तर शूल- तुलसी पत्रा स्वरस में पुराना गुड़ तथा खांड मिलाकर प्रसव होने के बाद तुरन्त पिलाने से प्रसव के बाद का शुल नष्ट होता है।
  • नपुंसकता – समभाग तुलसी बीज चूर्ण अथवा मूल चूर्ण में बराकर की मात्रा में गुड़ मिलाकर 1 से 3 ग्राम की मात्रा में, गाय के दूध् के साथ लगातार लेते रहने से एक माह या छः सप्ताह में लाभ होता है।

अस्थिसंधि रोग :

  • वातव्याधि- 2 से 4 ग्राम तुलसी पन्चाड चूर्ण का सुबह-शाम दूध् के साथ सेवन करने से संध्शिोथ एवं गठिया के दर्द में लाभ होता है।

त्वचा रोग:

  • कुष्ठ रोग: 10-20 मिमली तुलसी पत्रा स्वरस को प्रतिदिन प्रातः काल पीने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
  • तुलसी के पत्रों को नींबू के रस में पीसकर, दाद, वातरक्त कुष्ठ आदि पर लेप करने से लाभ होता है।
  • सफेद दाग झांई : तुलसी पत्रास्वरस, नीबूं रस कंसौदी पत्रा स्वरस तीनों को बराबर-बराबर लेकर उसे तांबे के बरतन में डालकर चैबीस घंटे के लिए धूप में रख दें गाढा हो जाने पर रोगी को लेप करने से दाग तथा अन्य चर्म विकार सापफ होते है, इसे चेहरे पर भी लगााया जाता है।
  • नाड़ीव्रण: तुलसी बीजों को पीसकर लेप करने से दाह तथा नाड़ीव्रण का शमन होता है।
  • शीतपित्त: शरीर पर तुलसी स्वरस का लेप करने से शीतपित्त तथा उदर्द का शमन होता है।
  • शक्तिवृद्वि के लिये: 20 ग्राम तुलसी बीजचूर्ण में 40 ग्राम मिश्री मिलाकर महीन-महीन पीस लें, इस मिश्रण को 1 ग्राम की मात्रा में शीत तु में कुद दिन सेवन करने से वात-कफ रोगों से बचाव होता है। दुर्बलता दूर होती है शरीर की रोग-प्रतिरोध्क क्षमता बढ़ती है व वायु मंडल सशक्त होता है।

ज्वर रोग:

  • मलेरिया ज्वर: तुलसी का पोध मलेरिया प्रतिरोधि है। मलेरिया में तुलसी पत्रों का क्वाथ तीन-तीन घंटे के अन्तर से सेवन करें। तुलसी मूल क्वाथ को आधा औंस की मात्रा में दिन में दो बार देने से ज्वर तथा विषम ज्वर उतर जाता है।
  • कफप्रधन ज्वर: 21 नग तुलसी दल, 5 नग लवंग तथा अदरक रस 500 मिली को पीस छानकर गर्म करें पिफर इसमें 10 ग्राम मधु मिलाकर सेवन करें
  • आंत्रा ज्वर: 10 तुलसी पत्रा तथा डृ व 1 ग्राम जावित्राी को पीसकर शहद के साथ चटाने से लाभ होता है।
  • साधरण ज्वर: तुलसी पत्रा, श्वेत जीरा, छोटी पीपल तथा शक्कर, चारों को कूटकर प्रातः सायं देने से लाभ होता है।

विष चिकित्साः

  • सर्पविष: 5 से 10 मिली तुलसी पत्रा स्वरस को पिलाने से और इसकी मंजरी और जड़ो को बार-बार दंशित स्थान पर लेप करने से सर्पदंश की पीड़ा में लाभ मिलता है। अगर रोगी बेहोश हो गया हो, तो इसके रस को नाक में टपकाने रहना चाहिये।
  • शिरोगत विष: विष का प्रभाव यदि शिरः प्रदेश में प्रतीत हो तो बंधू, जीव, भारंगी तथा काली तुलसी मूल के स्वरस अथवा चूर्ण का नस्य देना चाहिए।

परमपूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का स्वानुभूत प्रयोग:
7 तुलसी के पत्रा तथा 5 लौंग लेकर एक गिलास पानी में पकायें। पानी पक्कर जब आधा शेष रह जायें तब थोड़ा सा सेंध नमक डालकर गर्म-गर्म पी जायें यह काढ़ा पीकर कुछ समय के लिय वस्त्रा ओढ़कर पसीना लें। इससे ज्वर तुरन्त उतर जाता है तथा सर्दी, जुकाम व खांसी भी ठीक हो जाती है। इस काढ़े को दिन में दो बार 2-3 दिन तक ले सकते है।

बाल रोग:

  • छोटे बच्चों को सर्दी जुकाम होने पर तुलसी व 5-7 बूंद अदरक रस को शहद में मिलाकर चटाने से बच्चों का कपफ, सर्दी, जुकाम ठीक हो जाता है। पर नवजात शिशु को यह मिश्रण अल्प मात्रा में ही दें।

आचार्य बाल कृष्ण

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