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आखिर कब मिलेगी देश के नौनिहालों को कुपोषण से मुक्ति !

वैश्विक शक्तियों से होड़ करते हुए यह भूल गये हैं कि भुखमरी और कुपोषण के मामले में हमारी गिनती सर्वाधिक पिछड़े राष्ट्रों में की जाती है. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषण के कारण भारत में करीब 10 लाख से ज्यादा मौतों होती हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भले ही हम विकसित राष्ट्र और वैश्विक शक्ति होने का दंभ भरते हों लेकिन सच्चाई यह है कि कुपोषण को मामले में भारत पिछड़े और छोटे देशों मसलन भूटान, बंग्ला देश, श्रीलंका और मालद्वीप से भी बहुत पीछे हैं. भारत अमेरिका, चीन, जापान, जर्मन, रूस, इजरायल आदि देशों के लिए हमेशा से एक बाजार रहा है और इन देशों की भारत के साथ निकटता व्यापारिक दृष्टिकोण के नजरिए से ज्यादा कुछ नहीं है. भारत में करीब 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की शिकार हैं. कुपोषण के कारण हिमाचल के 26 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 46 प्रतिशत बच्चे सामान्य कद से कम पाये गये हैं. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नडडा भी अपने गृह प्रदेश से कुपोषण की दाग मिटाने में सफल नहीं हो पाये हैं. भारत सरकार समेकित बाल विकास सेवा के माध्यम से आंगनवाड़ियों के एक विस्तृत नेटवर्क के जरिए कुपोषण निवारण का कार्यक्रम चलाती है. इसके अलावा देशभर में मिड डे मील परियोजना चालू की गई है लेकिन करोड़ों-अरबों के बजट के बावजूद बाल कुपोषण से छुटकारा पाने में हम सफल नहीं हो पा रहे हैं और इसका सबसे बड़ा कारण इन आँगनबाड़ियों के नेटवर्क में पर्याप्त भोजन और दवाइयों की अनुपलब्धता और जागरूकता का अभाव है. सेव द चिल्ड्रन की हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में 48.2 मिलियन बच्चे बौने हैं, यह संख्या आंध्र प्रदेश की पूरी आबादी के बराबर है.संयुक्त राष्ट्र के एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण मर जाते हैं. इतना ही नहीं भारत कुपोषण से मौत के मामले में पूरे दक्षिण एशिया में पहले स्थान पर है. केन्द्र सरकार ने 2022 तक पांच साल से कम उम्र के कुपोषित और कम वजन के बच्चों का प्रतिशत 20.7 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा है जो अभी करीब 35.7 प्रतिशत है. वहीं छह महीने से 59 महीने के एनीमिया के शिकार बच्चों का प्रतिशत 19.5 प्रतिशत पर लाने की लक्ष्य रखा गया है जो अभी 58.4 प्रतिशत है. नीति आयोग ने 2030 तक सभी प्रकार के कुपोषण को समाप्त करने का लक्ष्य रखा है और उम्मीद है कि 2030 तक भारत शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त कर लेगा.
भारत में पांच साल से कम उम्र के 20 फीसदी से ज्यादा बच्चे ‘कुपोषण’ (ऊंचाई के मुकाबले कम वजन) से ग्रसित हैं. भारत उन देशों की सूची में शामिल है जिन्होंने पिछले 20 सालों में इस मामले में कोई प्रगति नहीं की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हवाले से बताया गया है कि 1998-2002 के बीच जहां 17 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार थे वहीं, इनकी संख्या 2012-2016 के बीच बढ़कर 21 प्रतिशत हो चुकी है. भारत के अलावा दुनिया के सिर्फ तीन देशों जिबूती, श्रीलंका और दक्षिण सूडान में कुपोषित बच्चों की संख्या 20 फीसदी से ज्यादा है. बाल कुपोषण सामाजिक विकास के उत्थान में सबसे बड़ी बाधा है.
केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने हाल ही में राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनपीएसएस) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण (सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन- एसएएम) का शिकार हैं. भारत में 5 साल से कम उम्र के 20 फीसदी से ज्यादा बच्चे ‘कुपोषण’ (ऊंचाई के मुकाबले कम वजन) से ग्रसित हैं. यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक 5 वर्ष की आयु तक के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में हैं और उसका बड़ा हिस्सा झारखंड में है जबकि ‘द लैसेंट जर्नल’ ने अपने एक अध्ययन में रहस्योद्घाटन किया है कि भारत में 9.7 करोड़ बच्चे कम वजन से पीड़ित हैं और कुपोषण से ग्रसित हैं. अध्ययन में इस बात का विशेष उल्लेख है कि भारत में मध्यम और गंभीर रूप से कम वजन वाले बच्चों और किशोरों की संख्या सबसे विश्व में सर्वाधिक है. यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुपोषण के कारण 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है. बाल मृत्यु दर के मामले में उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे है. स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर कराए जाने वाले स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में 0 से 5 साल तक की आयु वर्ग के 46.3 प्रतिशत, बिहार में 48.3 प्रतिशत, जबकि हिमाचल प्रदेश में 20 प्रतिशत बच्चे अपनी आयु के हिसाब से कम वजन के हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन से पता चला है कि भारत में 24.4 प्रतिशत लड़कियों और 39.3 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार पाये गये हैं और यह अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के पाएं गए हैं.पांच वर्ष से कम आयु के 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. देश में बाल कुपोषण 1998-2002 के बीच 17.1 प्रतिशत था, जो 2012-16 के बीच बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 25 सालों से भारत ने इस आंकड़े पर ध्यान नहीं दिया और न ही इस स्थिति को ठीक करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति हुई है.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि इस वक्त भारत में पांच साल से कम उम्र के 35.7 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं और इस वजह से उनका वजन अपेक्षित औसत वजन से कम है. इतना ही नहीं 15 से 49 साल के बीच की 53 फीसदी से ज्यादा महिलाएं खून की कमी से ग्रसित हैं. जब बच्चों की जन्मदात्री ही खुद कुपोषण का शिकार होगी तो जन्म लेने वाले बच्चे कैसे स्वस्थ होंगे. पर्याप्त भोजन और पीने के साफ पानी के अभाव में बड़ी संख्या में बच्चे बचपन से ही शारीरिक और मानसिक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसके अलावा खाने-पीने की वस्तुएं घी, दूध, तेल, दही और सब्जियां तथा अनाज मिलावटी होने के चलते स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं. ग्लोबल हंगर रिपोर्ट के मुताबिक देश में मां बनने की उम्र वाली आधी महिलाएं खून की कमी (एनीमिया) से पीड़ित हैं. वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2017 में भारत सहित 140 देशों में कुपोषण की स्थिति पर गौर किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों में कुपोषण के तीन महत्वपूर्ण रूप हैं जिनमें बच्चों में विकास की कमी, मां बनने की उम्र वाली महिलाओं में खून की कमी और अधिक वजन वाली वयस्क महिलाएं शामिल हैं. ताजा आंकड़ों के अनुसार, 5 वर्ष से कम के 38 प्रतिशत बच्चे विकासहीनता से प्रभावित हैं जिसमें बच्चों की लंबाई पोषक तत्वों की कमी के कारण अपनी उम्र से कम रह जाती है और इससे उनकी मानसिक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है.
पांच वर्ष से कम के करीब 21 प्रतिशत बच्चे ऐसे विकार से ग्रस्त हैं जिसमें उनका वजन उनकी लंबाई के अनुपात से कम होता है. मां बनने की उम्र वाली करीब 51 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं. यह ऐसी समस्या है जिसमें दीर्घावधि में मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार, 22 प्रतिशत से अधिक वयस्क महिलाओं का वजन जरूरत से ज्यादा है. जीवन के पहले छह महीनों के दौरान कम वजनी बच्चों का प्रतिशत 17 से बढ़कर 21 हो चुका है. बाल चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पहले दो साल के दौरान मौत के मुख्य कारण अपर्याप्त स्तनपान से भूख, नवजात शिशुओं में संक्रमण, डायरिया (अतिसार) और न्यूमोनिया होते हैं. इन तीनों समस्याओं के समाधान के लिए सबसे जरूरी पर्याप्त स्तनपान (ऑप्टिमल ब्रेस्टफीडिंग) है. जन्म के एक घंटे के भीतर नवजात शिशु को स्तनपान शुरू कराना चाहिए और पहले छह महीनों तक उसे सिर्फ स्तनपान कराया जाना चाहिए. उसके बाद अगले 18 महीनों तक स्तनपान के साथ पर्याप्त मात्रा में घर का बना ठोस आहार देना चाहिए ताकि बड़े होते बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी हो सकें. जन्म से एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने पर नवजात शिशु को संक्रमण का खतरा 6 गुना कम हो जाता है. सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद भारत में सर्वाधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. हालांकि कुपोषण पर वैश्विक रिपोर्ट के तुरंत बाद केन्द्र सरकार ने संज्ञान लेते हुए अतिरिक्त 12 हजार करोड़ की राशि जारी की है लेकिन समुचित परियोजनाओं के माध्यम से कुपोषण का शिकार बच्चों व महिलाओं तक पहुंचनी चाहिए.

विजय शर्मा

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