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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भाजपा की बम्पर जीत गुजरात में करेगी राह आसान

उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा की बम्पर जीत ने सभी पार्टियों को चित कर दिया है. मेयर चुनाव की 16 सीटों में से भाजपा को 14 पर जीत मिली है और दो पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल हुए हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मेयर चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पायी है. दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्या के विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की हार हुई है लेकिन इतनी बड़ी जीत के आगे यह हार लुप्त हो गई है. कुल 652 निकाय सीटों में भाजपा 341, बसपा 116, सपा 81, कांग्रेस 19 और 95 पर निर्दलीय एवं अन्य जीते हैं. बसपा को जो लोग भूतकाल या मृतप्राय पार्टी समझ रहे थे उन्हें फिर से सोचना होगा. बसपा उन सभी सीटों पर अच्छा प्रदर्शन कर पाई है जहां मुस्लिम और दलित समुदाय की बहुतायत थी. मुस्लिम मतदाताओं ने सपा को छोड़कर बसपा को चुना है जिसके कारण वह सपा और कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीत पाई है. भाजपा की जीत में आम आदमी पार्टी का योगदान भी रहा है. मुकाबला चतुष्कोणीय होने के चलते भाजपा को इसका फायदा मिला है. आम आदमी पार्टी को दिल्ली में प्रादेशिक पार्टी का दर्जा हासिल है इसलिए इसके ज्यादातर उम्मीदवार निर्दलीय निर्दलीय माने गये हैं. अभी यह साफ नहीं हुआ है कि आम आदमी पार्टी के कितने उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल हुए हैं लेकिन यह साफ है कि बहुकोणीय मुकाबले में भाजपा का वोटर एकजुट रहा है जिससे भाजपा को बम्पर जीत मिली है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ अपनी सरकार के 8 माह के कार्यकाल प्रदेश की जनता द्वारा दिये गये जनादेश से गदगद नजर आये. उन्होंने प्रदेश के मतदाताओं का धन्यवाद करते हुए राहुल गांधी पर तंज कसा और कहाकि जो लोग गुजरात चुनाव में प्रश्न उठा रहे हैं वह अपने संसदीय क्षेत्र की नगर पालिका एवं पंचायतों तक का चुनाव हार गये हैं. योगी आदित्य नाथ ने उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में मिली प्रचंड जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देते हुए कहा कि यह 2019 के लोकसभा चुनावों के आगाज की आहट है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाई देते हुए कहा है कि प्रदेश की जनता ने विकास को चुना है.
नगर निगमों और निकायों के चुनाव स्थानीय मुद्दों गली, नाली, सड़क, खड़ंजे, सीवर तथा पानी आदि पर लड़े जाते हैं और इन्हीं के आधार पर जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है. लेकिन हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के मद्देनजर स्थानीय के साथ पार्टियां नोटबंदी, जीएसटी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भाजपा को घेरने का प्रयास कर रही थी लेकिन चुनाव नतीजों ने जहां योगी आदित्य नाथ के आठ माह के कामकाज पर मोहर लगाई है वहीं राष्ट्रीय मुद्दों पर मसलन नोटबंदी और जीएसटी पर भी उसकी नीतियों पर सहमति प्रकट की है. मंहगाई मुद्दा ही नहीं बन पाई है और जबकि पिछले दो माह से प्याज, टमाटर और सब्जियां आम आदमी की पहुंच से दूर हो गई हैं. मंहगाई से जनता त्रस्त है लेकिन विपक्ष मुद्दा बनाने में असफल रहा है. गुजरात में कांग्रेस बेरोजगारों को 3500 रूपए बेरोजगारी भत्ता देने और पटेल समुदाय को आरक्षण जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन जनता को भरोसा नहीं है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनावों में हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस ने बेरोजगारी भत्ता देने का ऐलान किया था लेकिन साढे चार साल की किन्तु परन्तु के बाद शर्तों के साथ 1000 रूपए देने का ऐलान किया था जो शायद ही किसी को मिला हो. राहुल गांधी नोटबंदी, जीएसटी और बेरोजगारी को मुद्दा बना रहे हैं. लेकिन जनता जानती है कि कांग्रेस के पास प्रदेश में ऐसा कोई नेता ही नहीं है जो मुख्यमंत्री बनने और भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम हो, इसलिए भाजपा यहां तमाम बाधाएं के बावजूद मजबूत है और कहा जा रहा है कि पटेलों का समर्थन पाने को लिए हिमाचल की तर्ज पर गुजरात में भी चुनावों से पहले नरेन्द्र मोदी के नजदीकी उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना सकती है.
भाजपा के कुछ उत्साही नेता इसे राम मंदिर निर्माण का जनादेश करार दे रहे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि इस बार के निकाय चुनावों में प्रदेश की जनता ने हिन्दू हित की बात करने वालों को चुना है और उन शक्तियों को ठुकरा दिया है जो तुष्टिकरण की नीति पर काम करते हुए संप्रदाय विशेष को खुश करने की राजनीति कर रहे थे. राहुल गांधी के नए सलाहकारों ने उन्हें हिन्दुओं का व्यापक समर्थन पाने और नरेन्द्र मोदी का मुकाबला करने के लिए भाजपा की ही तर्ज पर हिन्दुत्व को धार देने की सलाह दी है और वह मंदिर-मंदिर जाकर ऐसा कर भी रहे हैं लेकिन भाजपा ने उनके धर्म को लेकर ही सवाल उठा दिये हैं और ऐसे में गुजरात का चुनाव विकास के मुद्दों से हटकर जाति, धर्म और धारणा के बल पर लड़ा जा रहा है. उत्तर प्रदेश के चुनावों पर राहुल चुप हैं जबकि सारे राष्ट्रीय समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हो रही है.
गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले आये उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव नतीजों का असर गुजरात में पड़ना तय है. भाजपा जहां गुजरात चुनावों के कठिन मान रही थी, अब उसके कार्यकर्ता जोश से लबरेज होकर उत्तर प्रदेश जैसे परिणाम लाने के लिए दिन-रात अधिक उत्साह से काम करेंगे जबकि बदलाव का ख्वाब देख रही कांग्रेस को अपने ही कार्यकर्ताओं को समझाने में कठिनाई होगी. कांग्रेस जिन तीन युवाओं हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के भरोसे चुनावों को भाजपा को पटखनी देने की सोच रही है उनसे भी उनके समुदायों को कोई खास उम्मीद नहीं है. असल में गुजरात के यह तीनों ही उत्साही युवक अपने-अपने समुदायों के लिए आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत थे लेकिन किसी भी हालत में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता और ऐसा करना संविधान के खिलाफ है. राजस्थान और हरियाणा सरकारों ने कानून बनाकर ऐसा करने का प्रयास किया है जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है. इसका सीधा सा मतलब है कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जिससे उनके समाज का हित होने वाला नहीं है लेकिन निजी तौर पर वह सौदेबाजी करके कांग्रेस से कुछ न कुछ जरूर हासिल कर लेंगे. निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों से भाजपा की गुजरात फतह की राह आसान हो गई है और कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के नतीजे न सिर्फ गुजरात में उसकी बनाई हुई जमीन तो डुबोने का काम करेंगे बल्कि 2019 के लोकसभा चुनावों की पटकथा भी इन चुनाव नतीजों ने लिख दी है. उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए जहां आनंदित करने वाले हैं वहीं बसपा का उदय उसके लिए चिंता का सबब जरूर है क्योंकि भाजपा और आरएसएस की तमाम कोशिशें के बावजूद दलित वोट बैंक मायावती की पार्टी के साथ खड़ा नजर आ रहा है और उत्तर प्रदेश में बसपा वहां-वहां अच्छा प्रदर्शन कर पाई है जहां दलित और मुस्लिम समीकरण बहुमत के आंकड़े के आसपास रहा है. उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने सरा और कांग्रेस की अपेक्षा निकाय चुनावों में बसपा को चुना है जो इस बात का संकेत है कि भाजपा उत्तर प्रदेश के दलितों का मन जीतने में नाकामयाब हुई है.
राज्य के 16 नगर निगम, 198 नगर पालिका परिषद और 439 नगर पंचायतों में चुनाव तीन चरणों में कराया गया था. कुल मिलाकर तीन चरणों के मतदान का प्रतिशत औसतन 52.5 प्रतिशत रहा. यह 2012 के चुनाव के 46.2 से करीब छह प्रतिशत ज्यादा है. मतदान को लेकर सबसे ज्यादा उदासीनता शहरों में देखने को मिली. सबसे कम मतदान नगर निगमों में हुआ, वहीं नगर पंचायतों में अच्छा उत्साह देखने को मिला. नगर निगमों में जहां करीब 41.26 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, वहीं पालिका परिषद में 58 प्रतिशत और नगर पंचायतों में 68.30 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है.

विजय शर्मा

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